अमेरिका-ईरान तनाव और भारत की चिंताएं

मेजर सरस् त्रिपाठी

Update: 2026-02-08 05:18 GMT

इराक पर आक्रमण से पहले अमेरिका का मन्तव्य स्पष्ट करते हुए वर्ष 2001 में तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री मैडलिन अलब्राइट ने कहा था- Oil is our civilization and we will not allow any devil to sit on it (खनिज तेल हमारी सभ्यता है और हम किसी शैतान को इस पर कब्जा करने नहीं देंगे)। यह वक्तव्य इतना महत्वपूर्ण था कि एक ही पंक्ति में उन्होंने अमेरिकी विदेश नीति के सबसे प्रमुख कारक को चिन्हित कर दिया।

1991 में इराक पर पहला और 2002 में दूसरा आक्रमण कर पूरे इराकी पेट्रोलियम पर कब्जा करने के बाद अमेरिका ने वहां के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को फांसी पर चढ़ा दिया। स्क्रिप्ट अमेरिका की थी और क्रियान्वयन कठपुतली इराकी सरकार के प्रमुख नूरी अल मालीकी ने किया। इसी प्रकार वेनेजुएला की विशाल खनिज तेल संपदा पर कब्जा करने के लिए अमेरिका ने वैसा ही अभियान चलाया और वहां के राष्ट्रपति मादुरो को बंधक बनाकर अमेरिका ले गया। परिणामस्वरूप वेनेजुएला वस्तुतः अमेरिका का उपनिवेश बनकर रह गया है।

वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वाणिज्य और व्यापार को रणनीतिक शस्त्र की तरह प्रयोग कर रहे हैं। भारत पर लगाए गए अव्यावहारिक और अभूतपूर्व टैरिफ भी इसी नीति का हिस्सा थे। हालांकि भारत और अमेरिका के बीच पिछले सप्ताह हुई ट्रेड डील इस कुप्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक राजनीति एक बार फिर बिगड़ते शक्ति-संतुलन, पेट्रोलियम पर नियंत्रण के लिए अमेरिकी सैन्य प्रदर्शन और रणनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। पश्चिम एशिया, विशेषकर फारस की खाड़ी, इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। इसी संदर्भ में अमेरिका द्वारा अपने परमाणु संचालित विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन (USS Abraham Lincoln) को खाड़ी क्षेत्र में तैनात करना केवल एक सैन्य कदम नहीं, बल्कि बहुस्तरीय कूटनीतिक संकेत भी है। इस तैनाती पर रूस और चीन की प्रतिक्रियाएं तथा इसके भारत पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण वर्तमान वैश्विक परिदृश्य को समझने के लिए आवश्यक है।

यूएसएस अब्राहम लिंकन अमेरिकी नौसेना के सबसे शक्तिशाली विमानवाहक पोतों में से एक है, जिस पर लगभग 70–80 लड़ाकू विमान और करीब 6000 सैन्यकर्मी तैनात रहते हैं। खाड़ी में इसकी उपस्थिति अमेरिका की उस दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह ऊर्जा-समृद्ध पश्चिम एशिया में अपने हितों की रक्षा करना, समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और अपने सहयोगी देशों विशेषकर सऊदी अरब, इजराइल तथा खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के अन्य सदस्यों को आश्वस्त करना चाहता है।

ध्यातव्य है कि विश्व के तेल का लगभग 25 प्रतिशत और एलएनजी का करीब 20 प्रतिशत आवागमन ईरान के आधिपत्य वाले होर्मुज जलडमरूमध्य से होता है। इसमें दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया तथा पूर्व एशिया की लगभग 85 प्रतिशत ऊर्जा आपूर्ति सम्मिलित है। हाल के वर्षों में ईरान-अमेरिका तनाव, लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य में नौवहन सुरक्षा की चुनौती तथा गाजा युद्ध के बाद क्षेत्रीय अस्थिरता ने अमेरिका को यह संदेश देने के लिए प्रेरित किया है कि वह अभी भी क्षेत्रीय संतुलन में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। यूएसएस अब्राहम लिंकन की तैनाती को इसी ‘डिटरेंस’ यानी प्रतिरोधक क्षमता के प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है।

रूस और चीन की प्रतिक्रिया

रूस ने अमेरिका के इस कदम को पारंपरिक ‘गनबोट डिप्लोमेसी’ की संज्ञा देते हुए इसकी आलोचना की है। मॉस्को का मानना है कि अमेरिका सैन्य दबाव के माध्यम से अपने हित थोपना चाहता है, जबकि वास्तविक समाधान कूटनीति और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच संवाद से निकल सकता है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पहले ही पश्चिम के साथ तीखे टकराव की स्थिति में है, ऐसे में खाड़ी में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों को वह वैश्विक अस्थिरता बढ़ाने वाला कदम मानता है।

रूस की रणनीति स्पष्ट है। वह बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वकालत करता है, जहां अमेरिका की एकाधिकारवादी भूमिका सीमित हो। इसी कारण रूस ईरान के साथ अपने रक्षा और ऊर्जा संबंधों को मजबूत कर रहा है और पश्चिम एशिया में स्वयं को एक वैकल्पिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा है। इसी दृष्टि से रूस ने ईरान को महत्वपूर्ण युद्धक उपकरण और सैन्य साजो-सामान उपलब्ध कराए हैं।

दूसरी ओर चीन सावधानीपूर्ण लेकिन रणनीतिक

दूसरी ओर चीन की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत संतुलित और कूटनीतिक रही है। बीजिंग ने सीधे तौर पर अमेरिका की आलोचना करने से बचते हुए ‘क्षेत्रीय शांति और स्थिरता’ पर जोर दिया है। चीन का पश्चिम एशिया से गहरा आर्थिक संबंध है, विशेषकर ऊर्जा आयात के संदर्भ में। खाड़ी क्षेत्र से चीन अपनी तेल आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा पूरा करता है, इसलिए किसी भी प्रकार की सैन्य अस्थिरता उसके आर्थिक हितों को प्रभावित कर सकती है। यूएसएस अब्राहम लिंकन की तैनाती को चीन इस रूप में देखता है कि अमेरिका अभी भी ‘हार्ड पावर’ पर निर्भर है, जबकि चीन ‘सॉफ्ट पावर’ और आर्थिक कूटनीति के जरिए अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। फिर भी चीन इस क्षेत्र में प्रत्यक्ष सैन्य टकराव से बचना चाहता है।

भारत पर प्रभाव: अवसर और चुनौतियां

भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र रणनीतिक, आर्थिक और सामाजिक तीनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का लगभग 60 प्रतिशत तेल खाड़ी देशों से आयात करता है और लाखों भारतीय नागरिक वहां कार्यरत हैं। ऐसे में किसी भी प्रकार की सैन्य तनातनी भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय बन जाती है।

इसके अतिरिक्त ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारत अब तक लगभग 120 मिलियन अमेरिकी डॉलर, यानी करीब 11 अरब रुपये का निवेश कर चुका है। इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) ने शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल का संचालन प्रारंभ कर दिया है, जहां अब तक 450 जहाजों से 87 लाख टन कार्गो का आवागमन हो चुका है।

यूएसएस अब्राहम लिंकन की तैनाती से भारत को दोहरे प्रभावों का सामना करना पड़ सकता है। एक ओर अमेरिका के साथ भारत के रणनीतिक संबंध, विशेषकर हिंद-प्रशांत और रक्षा सहयोग के संदर्भ में, और मजबूत हो सकते हैं। भारत-अमेरिका नौसैनिक अभ्यास और समुद्री सुरक्षा सहयोग को इससे बल मिल सकता है। दूसरी ओर भारत रूस और ईरान जैसे देशों के साथ भी अपने ऐतिहासिक और व्यावहारिक संबंध बनाए रखना चाहता है। रूस भारत का प्रमुख रक्षा साझेदार रहा है, जबकि ईरान चाबहार जैसे रणनीतिक प्रोजेक्ट्स में भारत का अहम सहयोगी है। ऐसे में खाड़ी में बढ़ती अमेरिकी सैन्य उपस्थिति भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति को जटिल बना सकती है।

भारत के लिए सबसे बड़ा जोखिम ऊर्जा आपूर्ति और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा से जुड़ा है। यदि खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, तो तेल कीमतों में उछाल और आपूर्ति बाधित होने की आशंका रहेगी, जिसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

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