राजनीति में कोई भी वक्तव्य निजी नहीं होता। हर वक्तव्य के अनेक अर्थ और मंतव्य निकाले जाते हैं। कब, क्या और कितना बोलना है, यह वक्ता की समझदारी और राजनीतिक परिपक्वता पर निर्भर करता है। सार्वजनिक जीवन में नेतृत्वकर्ता कभी पूरी तरह व्यक्तिगत नहीं होता। वह एक इंडिविजुअल जरूर होता है, लेकिन उसका जीवन और उसका हर कथन जन-सामान्य से जुड़ा होता है।
ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि नेता बहुत सोच-समझकर बोले। यदि उसमें यह विवेक नहीं है तो वह हर बार अपने विपक्ष के निशाने पर रहेगा। वैसे भी मौन की एक अलग भाषा होती है, जो बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह जाती है। समझने वाले मौन के अर्थ को आसानी से पकड़ लेते हैं। यही नहीं, मौन कई बार नेता की कमियों को ढंकने का काम भी करता है और सामने वाले को अर्थ निकालने के लिए विवश कर देता है।
एक मौन कई आने वाली समस्याओं और कठिनाइयों से भी बचा लेता है। बात-बात पर वक्तव्य देने वाला नेता अक्सर ज्यादा परेशान रहता है, जबकि उचित समय पर मौन धारण करना राजनीतिक संकटों से निजात दिला देता है। राजनीति में पक्ष और विपक्ष दो ध्रुव होते हैं और दोनों का अपना-अपना महत्व होता है। उपरोक्त सिद्धांत इन दोनों ही पक्षों पर समान रूप से लागू होता है।
मौन के महत्व को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बेहतर शायद ही कोई जानता हो। यदि गलत न हो तो अमेरिका और भारत के बीच हाल के दिनों में व्यापार को लेकर जो तनाव पैदा हुआ, उसमें ट्रंप लगातार बयान देते रहे, जबकि प्रधानमंत्री मोदी मौन रहे। परिणाम यह हुआ कि दुनियाभर में मोदी की सराहना हुई और ट्रंप की आलोचना देखने को मिली।
मोदी के इस मौन ने समस्याओं को सुलझाने के लिए स्वयं ट्रंप को बातचीत की मेज पर आने के लिए विवश कर दिया और अंततः भारत-अमेरिका ट्रेड डील हुई। कई बार विरोध में विपक्ष हड़बड़ी में ऐसा कदम उठा लेता है, जो अंततः उसी के लिए नुकसानदेह साबित होता है।
जब भारत ने अमेरिकी शर्तों पर व्यापार से इनकार किया, तभी ट्रंप ने टैरिफ को 25 और फिर 50 प्रतिशत तक बढ़ाया था। यदि भारत पहले ही अमेरिकी शर्तें मान लेता, तो उसे इस तरह की स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता। प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखते हुए अमेरिका की बात मानने से साफ इनकार कर दिया था।
उन्होंने स्पष्ट कहा था कि चाहे कुछ भी हो जाए, भारत अपने एग्रीकल्चर सेक्टर को अमेरिका के लिए नहीं खोलेगा, क्योंकि इससे भारतीय किसानों को नुकसान होगा। यही नहीं, सरकार ने यह भी तर्क दिया था कि अमेरिकी डेयरी उत्पाद भारत की सनातनी परंपराओं के अनुरूप नहीं हैं। वहां के पशुधन को मांसाहारी भोजन दिया जाता है, जो भारतीय हिंदू धार्मिक जीवन के लिए पूरी तरह निषिद्ध है।
इसके बावजूद विपक्ष बिना सिर-पैर की बातें कर रहा है कि मोदी ने सरेंडर कर दिया, कृषि क्षेत्र अमेरिका को खोल दिया गया है और इससे किसानों को नुकसान होगा, साथ ही डेयरी उत्पादों से भारतीय धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। बिना किसी ठोस प्रमाण के इस तरह का नैरेटिव खड़ा करना अंततः विपक्ष के लिए ही घातक सिद्ध होता है। राजनीति में नेता को कितनी समझदारी और संतुलन के साथ वक्तव्य देना चाहिए, यह उदाहरण उसी ओर इशारा करता है