किसी भी परिस्थिति में यह तथ्य विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए कि प्रत्येक कालखंड में पुरस्कार और राजनीति के मध्य अन्योन्याश्रय संबंध रहा है। विभिन्न प्रकार के पुरस्कारों और सम्मानों के पीछे भिन्न-भिन्न प्रकार की राजनीति सक्रिय रहती आई है। कहना न होगा कि जब पुरस्कारों की परिकल्पना अस्तित्व में आई होगी, तभी से उनके साथ राजनीति भी अनिवार्य रूप से जुड़ गई होगी। दोनों का सम्बन्ध जितना सम्मानजनक प्रतीत होता है, उससे अधिक, कई बार प्रत्यक्ष और समकालीन दिखाई देता है। अन्ततः, पुरस्कार और राजनीति एक-दूसरे के पूरक कार्य करते रहे हैं।
इस संदर्भ में नरेन्द्र मोदी सरकार की भूमिका पूर्ववर्ती सरकारों की तुलना में कुछ अधिक तीव्र-सक्रिय भी रही है। मोदी सरकार की यह विशेष उपलब्धि रही है कि अभिजात्य के सीमित घेरे में बंद पद्म-पुरस्कारों को लोकधर्मी (जन-सरोकार) स्तर पर स्थापित किया। कहना न होगा कि पूर्व में पद्म-पुरस्कार एक अभिजात्य घेरे में सिमटे हुए थे, उन पर कला, संस्कृति और नौकरशाही का प्रभुत्व अधिक था। मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल से ही इस अभिजात्य दृष्टि या प्रवृत्ति में आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिला। सबको साथ लेने और सबको विकासोन्मुख करने के लिए सबका विश्वास जीतना भी आवश्यक था। स्वाभाविक रूप से, दृष्टि को बंद-बने फ्रेम से तोड़ने की दिशा में चलने की दृष्टि से समावेशी दृष्टि भी आवश्यक थी और उसे लागू करने के लिए साहस अपेक्षित था। नरेन्द्र मोदी में साहस और दूरदृष्टि दोनों का अद्भुत योग है।
नरेन्द्र मोदी के पहले ही कार्यकाल में इस दिशा में पहला दृष्टिगोचर परिवर्तन था—गुमनाम व विस्मृत नायकों की खोज। परिणामतः ग्रामीण शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, लोक कलाकारों, जनजातीय नायकों व नेताओं और सामाजिक काम-काज से दूर रहकर देश के लिए कार्य करने वाले व्यक्तियों तक सरकार की दृष्टि पहुँची, परिणामस्वरूप प्रतिष्ठा और निष्काम कर्म का सम्मान होने लगा।
इन पुरस्कारों के उत्सवों में ऐसे-ऐसे भारत-निर्माण देखने को मिले, जो कभी कल्पनातीत थे और राजनीति के लिए अनुपयुक्त ही थे। नरेन्द्र मोदी की इस पहल को अशोक की मनोवृत्ति के वैचारिकों ने सामान्य भारतीयों को लुभाने अथवा उन अल्पज्ञों को अपने वोटबैंक के साधन के रूप में देखा, किन्तु तथाकथित चिंतकों का एक प्रश्न भी उपस्थित हुआ कि इससे पूर्ववर्ती सरकारों ने इस तरह के प्रयास क्यों नहीं किए? अभिजात्य के घेरे की फौजदार मानसिकता और तंत्रगत दृष्टि-दोष प्रायः कोई नई दृष्टि स्वीकार नहीं करता और मौन रहकर उदासीनता प्रदर्शित करता है।
नरेन्द्र मोदी सरकार ने इन पुरस्कारों की चयन-प्रक्रिया में आमूलचूल परिवर्तन करते हुए इसे लोक-मुखी आधार प्रदान किया। इससे भी महत्वपूर्ण परिवर्तन यह देखने को मिला कि विचारधारात्मक फ्रेम से इतर ‘योगदान’ प्राथमिक मानदंड बना। इस पर नरेन्द्र मोदी की समावेशी राजनीतिक दृष्टि कहना अनुचित न होगा। कुल मिलाकर नरेन्द्र मोदी ने ‘करता जो कुछ है, कर दिखाता है’—इस उक्ति को अपने कार्यों के माध्यम से कर दिखाने का यथेष्ट प्रयास किया है। इस वर्ष भी नरेन्द्र मोदी ने अपनी परंपरागत रणनीति से कुछ को बौद्धिक असंतुलन में डालने का सतत काम किया है।
इसलिए इस बार घोषित पद्म-पुरस्कारों में राजनीतिक वैचारिक-विरोधियों के नामों को सादर्य देखकर भूल नहीं करनी चाहिए। यद्यपि वैचारिक दृष्टि से ध्रुवान्त पर खड़े होकर भी नरेन्द्र मोदी ने कर्नाटक वीरशैव लिंगायत आंदोलन और ‘झारखंड के गुरुजी’ कहलाने वाले शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म-पुरस्कार की घोषणा को लेकर राजनीतिक विमर्श में व्यापक चर्चा है। वास्तव में इन पुरस्कारों की घोषणा ने विचारधारा-आधारित राजनीति, अहंकार की बौद्धिक जकड़न एवं राजनीतिक समाज में वैचारिक असुविधा उत्पन्न कर दी है।
नरेन्द्र मोदी ने इससे पूर्व भी पश्चिम बंगाल के भूतपूर्व मुख्यमंत्री कामरेड बुद्धदेव भट्टाचार्य को मरणोपरांत तथा विपक्ष के नेता गुलाम नबी आज़ाद को पद्म-पुरस्कारों से सम्मानित कर सार्वजनिक विमर्श के द्वार खोल दिए थे। इस पर प्रसंग में इतना समझना आवश्यक है कि इसे केवल आगामी चुनावों व तत्काल राजनीति में संदर्भ उत्पन्न करने की दृष्टि से देखकर खारिज करना उचित नहीं होगा। इसे समावेशिता की व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।
नरेन्द्र मोदी सरकार ने केवल पुरस्कारों के स्तर पर ही नहीं, अपितु उच्च शिक्षा संस्थानों के क्षेत्र में भी इस उदारता और समावेशिता का परिचय दिया है। ऐसे कई उदाहरण हैं, जहाँ वैचारिक दृष्टि से ध्रुव-विरोधी रहे व्यक्तियों को उच्च शिक्षण संस्थानों के शीर्ष पदों पर आसीन किया गया। वे लोग, जो कल तक मार्क्सवादी-दृष्टि और उससे उत्पन्न अभिजात्यात्मक विषयों के मुखर पैरोकार रहे हैं।
यहाँ गंभीरतम आवश्यकता है कि आज का पाठक भ्रमित न हो। वह स्वयं देखता-समझता है और सुविधाजनक निष्कर्ष निकालने में सक्षम है। विचार यह नहीं है कि प्रत्येक विचारधारा के भीतर, हर कालखंड में, कुछ ऐसे अ-बुद्धि या कु-बुद्धि ग्रस्त लोग होते हैं, जो वैचारिक संकीर्णता में डूबे रहते हैं और अपने से भिन्न सोच पाने में असमर्थ होते हैं। वे अपनी बौद्धिक परिसीमा को ही अंतिम सत्य मान लेते हैं।
परिवेश ही ऐसा नहीं होता। ऐसे लोग विचारधारा की यांत्रिक रट में ‘इतर’ को स्वतः शत्रु मान लेते हैं और उसके प्रतिकार को ही अपना कर्तव्य समझ बैठते हैं। ऐसे में, पद्म-पुरस्कार और राजनीति के जंगल में वैचारिक आत्ममंथन की नितांत आवश्यकता है।
विचारधारा की यांत्रिक रट का परिणाम यह है कि कुछ अ-बुद्धि या कु-बुद्धि ग्रस्त लोग, जैसे ही अपनी सुविधा व पूर्वाग्रह अनुसार कुछ होता नहीं देखते, तत्काल विचार-विरोधी होने का दुष्प्रचार कर, व्यक्ति को गरिमा-हीन बनाते हैं। ऐसे तत्व सामाजिक माध्यमों से लेकर प्रत्यक्ष परिसरों तक सक्रिय रहते हैं। इनसे न तो विचार-उद्भव होता है और न ही वैचारिक परिपक्वता सम्भव होती है।
उलटे ऐसे तत्वों के कारण विचार के प्रति लोक-दृष्टि दुर्बलता: संकुचित व विकृत होती जाती है। असहमति की शक्ति बदल देना और संवाद के स्थान पर आरोप को प्रतिष्ठित कर देना, किसी भी जीवंत बौद्धिक परम्परा का लक्षण नहीं हो सकता। ऐसे में, सरकार द्वारा सम्मानित उच्च पदस्थ व्यक्तियों का यह दायित्व बनता है कि वे वैचारिक संकीर्णता के प्रसार को अनावश्यक महत्व न दें। वैचारिक प्रतिबद्धता अपनी जगह होनी चाहिए, किन्तु उसके साथ ‘इतर’ के सम्मान की क्षमता भी विकसित की जानी चाहिए।
भारतीय जन-मन के प्रवाह को परिवेश निर्माण करते हुए उसके मूल संस्कार—संवाद, सहिष्णुता और सम्मान—को कैसे विस्तृत किया जा सकता है? भारतीय ज्ञान-परम्परा यही सिखाती है कि अपने शत्रु का भी सम्मान करना सीखा जाए और सिखाया जाए। क्योंकि विचार की प्रवृत्ति वैचारिक नहीं, आत्मान्वेषण की होती है। सम्मानजनक ही राष्ट्र-उन्नति-पथ पर अग्रसर होता है, जबकि संकीर्णता अन्ततः केवल विघटन, वैमनस्य और बौद्धिक दरिद्रता को जन्म देती है।
(लेखक प्रो. आनंद पाटील अखिल भारतीय राष्ट्रवादी लेखक संघ के संरक्षक हैं)