यूजीसी विनियमन विवाद और सुप्रीम कोर्ट

मेजर सरस् त्रिपाठी

Update: 2026-02-01 05:36 GMT

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 को 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किया। इसका कथित उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव, विशेषकर जाति-आधारित भेदभाव को रोकना और समग्र समानता (Equity) सुनिश्चित करना था। इन नियमों के अंतर्गत सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में समान अधिकार केंद्र (EOC), समानता समिति (Equity 24x7 Committees), हेल्पलाइन, इक्विटी स्क्वॉड आदि स्थापित करना अनिवार्य किया गया, ताकि भेदभाव के विरुद्ध शिकायतों का त्वरित निवारण और निगरानी सुनिश्चित हो सके। UGC के अनुसार, यह बदलाव आवश्यक था ताकि इतिहास में गहराई से जड़ जमाए जातिगत भेदभाव को प्रभावी ढंग से रोका जा सके और शैक्षणिक संस्थानों को सुरक्षित एवं समावेशी वातावरण प्रदान किया जा सके।

विवादास्पद प्रावधान: क्या है मुख्य चिंता?

UGC Regulation 2026 के कुछ प्रावधान विवाद का मुख्य केंद्र बने हैं। शोध, मीडिया समीक्षा और सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियों के आधार पर प्रमुख विवादास्पद बिंदु इस प्रकार हैं

1. जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा

सबसे अधिक विवाद Regulation 3(c) को लेकर है, जिसमें ‘जाति-आधारित भेदभाव’ की परिभाषा दी गई है। इस पर सवाल उठे कि इसमें केवल SC/ST/OBC समुदायों को ही सुरक्षा प्रदान की गई है, जबकि सामान्य (जनरल) श्रेणी के छात्रों और कर्मचारियों को इससे बाहर रखा गया है। इससे सामान्य वर्ग के लोगों के लिए शिकायत दर्ज कराने या राहत पाने के अधिकार सीमित हो जाते हैं, जो संवैधानिक समानता के सिद्धांत के विपरीत हो सकता है। साथ ही, यह भी कहा गया कि ऐसे प्रावधान बिना अपराध किए ही किसी को ‘अपराधी’ के रूप में वर्गीकृत करने की स्थिति पैदा कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि किसी सामान्य वर्ग के छात्र को जाति-आधारित दुर्व्यवहार का सामना करना पड़े, तो उसके पास समान और तटस्थ समाधान के लिए कोई स्पष्ट संस्थागत उपाय नहीं होगा। इस संदर्भ में आलोचकों का कहना है कि नियम समावेशी दिखते हुए भी व्यवहार में पृथक करने वाले (exclusionary) साबित हो सकते हैं। न्यायालय ने माना कि परिभाषा और भेदभाव का दायरा सीमित है।

2. अस्पष्ट भाषा और दुरुपयोग की आशंका

सर्वोच्च न्यायालय ने नियमों की भाषा को ‘प्रथम दृष्टया अस्पष्ट और दुरुपयोग के लिए सक्षम’ (prima facie vague and capable of misuse) बताया। न्यायालय के अनुसार, नियमों की शब्दावली अत्यधिक व्यापक और अस्पष्ट है, जिससे उनका गलत अर्थ निकाला जा सकता है या दुरुपयोग की संभावना बनती है। यदि यह स्पष्ट नहीं होगा कि किन परिस्थितियों में शिकायत दर्ज की जा सकती है और जांच की प्रक्रिया क्या होगी, तो झूठे आरोपों या व्यक्तिगत विवादों को संस्थागत शिकायत के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। इससे संस्थानों में भय का माहौल, छात्रों और कर्मचारियों की प्रतिष्ठा को नुकसान तथा सामाजिक विभाजन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

3. सामाजिक विभाजन की आशंका

न्यायालय ने यह चिंता भी जताई कि यदि ऐसे नियम स्पष्ट ढांचे और संतुलन तंत्र (checks and balances) के बिना लागू किए गए, तो वे शिक्षा संस्थानों में विभिन्न समूहों के बीच विभाजन को बढ़ावा दे सकते हैं। इससे भेदभाव समाप्त करने के उद्देश्य के विपरीत परिणाम सामने आ सकते हैं और सामाजिक समरसता को नुकसान पहुंच सकता है। न्यायालय ने टिप्पणी की कि जब देश पिछले 75 वर्षों से ‘जातिहीन समाज’ की दिशा में प्रयास कर रहा है, तो ऐसे नियम सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देने वाले साबित हो सकते हैं।

4. शिकायत निवारण और दंड का अभाव

सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत निवारण प्रक्रिया और साक्ष्य-आधारित समीक्षा के लिए स्पष्ट नियमों की आवश्यकता पर जोर दिया। वर्तमान नियमों में झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के खिलाफ कोई स्पष्ट दंडात्मक प्रावधान नहीं है। प्रारंभिक मसौदे में यह प्रावधान था, लेकिन अंतिम नियमों में इसे हटा दिया गया। इसके अभाव में गलत शिकायतों की संख्या बढ़ने और निर्दोष लोगों को दंडित किए जाने की आशंका जताई गई है। यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के उल्लंघन का प्रश्न भी खड़ा कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट की रोक (Stay) के कानूनी आधार

29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने UGC Regulation 2026 पर अस्थायी रोक लगा दी और निर्देश दिया कि समीक्षा पूरी होने तक 2012 के पुराने नियम लागू रहेंगे। इस रोक के प्रमुख आधार इस प्रकार हैं-

1. संविधानिक समानता का सिद्धांत

न्यायालय ने परिभाषाओं की अस्पष्टता और संभावित भेदभावपूर्ण प्रभाव को देखते हुए यह जांच आवश्यक मानी कि क्या नए नियम संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के अनुरूप हैं।

2. सामाजिक जोखिम और विभाजन की आशंका

न्यायालय ने कहा कि यदि ये नियम बिना संशोधन लागू हुए, तो उनका सामाजिक प्रभाव खतरनाक हो सकता है और समाज में विभाजन उत्पन्न कर सकता है। इसलिए तत्काल अंतरिम रोक आवश्यक है।

3. संशोधन और विशेषज्ञ समिति का सुझाव

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि नियमों की विशेषज्ञों और विद्वानों की समिति द्वारा पुनः समीक्षा की जाए, ताकि उन्हें स्पष्ट, समावेशी और दुरुपयोग-रहित बनाया जा सके।

UGC Regulation 2026 का उद्देश्य भेदभाव-रहित शैक्षणिक वातावरण बनाना था, लेकिन इसके कुछ प्रावधानों के कारण गंभीर कानूनी, सामाजिक और संवैधानिक बहस खड़ी हो गई। भाषा की अस्पष्टता, समावेशिता को लेकर सवाल और सामाजिक विभाजन की आशंका के चलते सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर अस्थायी रोक लगाई है। अब 19 मार्च 2026 को अगली सुनवाई प्रस्तावित है। तब तक 2012 के पुराने नियम लागू रहेंगे और यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नए नियमों को कैसे संशोधित कर संवैधानिक रूप से संतुलित और व्यावहारिक बनाया जाता है, ताकि उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और न्याय वास्तव में सुनिश्चित हो सके।

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