गतांक में उद्धृत कथन प्रकारान्तर से समकालीन भारतीय समाज की मानसिक अवस्था को सूक्ष्म स्तरों पर उद्घाटित करता है तथा विडम्बना की ओर संकेत करता है, जहाँ आस्था और प्रतीकों की सहज स्वीकृति है, किन्तु उन्हीं आदर्शों से उद्भूत व्यावहारिक दायित्वों के निर्वहन के प्रति व्यापक अनिच्छा दिखाई देती है। यह अनिच्छा केवल लोक तक सीमित नहीं है, उससे भी अधिक परिमाण में वह सत्ता-तंत्र के स्तर पर भी परिलक्षित होती है। इसी मानसिकता का परिणाम है कि वर्तमान परिवेश में व्यवस्था के किसी भी प्रकार के लचरपन पर यदि कोई कटाक्ष करता है या संस्थागत दुर्बलताओं की व्याप्ति की ओर ध्यान आकृष्ट करता है, तो उसके कथनों के स्व-घोषित व्याख्याकार उसे प्रायः विरोधी मतावलंबी के रूप में चिह्नित करने लगते हैं। वैचारिकता के गम्भीर अभाव में जो व्याख्याएँ जन्म लेती हैं, वे विवेकशून्य सामाजिक वातावरण में तीव्र गति से प्रसारित भी होती हैं। इससे राष्ट्रवादी प्रवाह के बावजूद भारत का कोई सुदृढ़ या संतुलित बौद्धिक चित्र उभरकर आता नहीं दिखता।
कहना न होगा कि आलोचना को आत्मालोचन के अवसर के रूप में ग्रहण करने के बजाय उसे वैचारिक शत्रुता में रूपान्तरित कर देने की प्रवृत्ति का कल्पनातीत विस्तार हुआ है। यह प्रवृत्ति सर्वाधिक बल तब प्राप्त करती है, जब वैचारिक परिपक्वता, सामाजिक उत्तरदायित्व और ऐतिहासिक बोध से वंचित छुटभैये किसी भी प्रकार से शक्ति-संरचनाओं में स्थान पा लेते हैं। दीर्घकालिक दृष्टि के अभाव और समाज को समग्रता में देखने की अक्षमता के कारण प्राप्त शक्ति उनके लिए सेवा और उत्तरदायित्व का साधन न बनकर प्रभुत्व, प्रतिशोध और आत्म-प्रदर्शन का उपकरण बन जाती है। यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसे लोग जटिल सामाजिक समस्याओं के समाधान की ओर उन्मुख होने के बजाय शत्रु गढ़ते हैं और संवाद के स्थान पर आरोप को, विवेक के स्थान पर उत्तेजना को तथा सहमति के स्थान पर समूहगत उन्माद को बढ़ावा देते हैं। परिणामतः समाज की स्वाभाविक विविधता समरसता में रूपान्तरित होने के बजाय विभाजन की रेखाओं में बँटती चली जाती है। असहमति को विरोध और आलोचना को शत्रुता घोषित करने से सामाजिक ताना-बाना शिथिल पड़ता है और परस्पर विश्वास का क्षरण होता है। इस प्रक्रिया में समाज का बौद्धिक स्तर निरन्तर गिरता है, संस्थाएँ विभिन्न स्तरों पर दुर्बल होती जाती हैं और सामूहिक चेतना संकीर्णताओं में सिमटने लगती है। शक्ति का ऐसा असन्तुलित और अपरिपक्व प्रयोग समाज को निर्माण की दिशा में संचालित न कर विखण्डन और अवनति की ओर ही ले जाता है। समय रहते यदि इसे नहीं समझा गया, तो ऐसे व्याख्या-प्रचारक न केवल विमर्श को दरिद्र बनाते रहेंगे, अपितु वैचारिकता, भारतीयता और समरस सांस्कृतिक चेतना को भी शनैः-शनैः क्षरण की ओर धकेलते जाएंगे।
एक ओर विमर्श में भारत की महानता, सनातनता और आदर्शों की उदात्त घोषणाएँ हैं। हमने घोषित किया है कि 2047 तक हमारा राष्ट्र विकसित बनेगा। दूसरी ओर अकर्मण्यताओं को ढकने तथा मनमानीपूर्वक व्यवस्था संचालन के लिए लोग संगठित रूप में सक्रिय हैं। जैसे ही दृष्टि इस बहुवचन की ओर उन्मुख होती है, समूचा विमर्श और भारत के विकसित होने का स्वप्न अपनी प्रासंगिकता खोने लगता है। तर्क, उत्तरदायित्व, समता, न्याय, बन्धुता और मूल्य गौण होने लगते हैं और उनके स्थान पर प्रतीकात्मक सहमतियाँ तथा भावनात्मक घोषणाएँ विस्तार पाने लगती हैं। इन घोषणाओं के बीच सामाजिक खाइयाँ कम होने के बजाय और अधिक गहरी होती जाती हैं।
चुनावी राजनीति में सत्ता चाहे एकपक्षीय क्यों न दिखाई दे, वैचारिक साम्य के बावजूद समाज का एक बड़ा वर्ग भीतर-ही-भीतर एक नहीं बन पा रहा है। वह सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक स्तरों पर गहरे अर्थों में विभाजित होता दिख रहा है। किसी ने सहज ही कहा कि नई सड़कें बन रही हैं, गाँव-गाँव तक मोटरगाड़ियाँ पहुँच रही हैं, किन्तु बहुलांश पुरानी सड़कें मरम्मत तो दूर, केवल दृष्टिपात के लिए भी प्रतीक्षित हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि नए के आगमन के साथ पुराने को विस्मृत कर देने की एक नई परम्परा गढ़ी जा रही है। यह कथन प्रतीकार्थों से अत्यन्त सघन प्रतीत होता है।
एक बात और किसी भी समय में ध्रुवीकरण व्यापक राष्ट्रीय हित के पक्ष में नहीं होता। एक ओर हम कहते हैं हिन्दवः सोदराः सर्वे, न हिन्दू पतितो भवेत। मम दीक्षा हिन्दू-रक्षा, मम मन्त्रः समानता। और दूसरी ओर ऐसी नीतियाँ निर्मित करने लगते हैं जो बहुवचन, अर्थात् वोट-बैंक की दृष्टि से भारतीय समाज को नाना स्तरों पर विखण्डित कर देती हैं, जहाँ संख्या के अनुपात में लाड़-दुलार निर्धारित होने लगता है। तब प्रश्न स्वाभाविक रूप से उपस्थित होता है क्या यह वही सनातन भारत है जो पहले विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा पदाक्रान्त हुआ, जिनके विरुद्ध सभी स्तरों पर संघर्ष के उपरान्त उसने स्वतंत्रता अर्जित की? इसके पश्चात् लगभग छह दशकों तक एक ऐसी सत्ता भी रही जिसने भारतीय समाज को ‘सेकुलरिज़्म’ की घुट्टी पिलाने का हठपूर्वक प्रयत्न किया। और विगत डेढ़ दशक से राष्ट्रवादी पथ पर चलने का दावा करने वाली सत्ता आई, तो वह भी दाल-भात करते हुए बहुवचनमय राजनीति की ओर ही अग्रसर होती दिखाई देने लगी। परिणामतः गहरे और व्यापक अर्थों में सह-अस्तित्व और समरसता पर कुठाराघात होता दिखता है।
कभी-कभी यह प्रश्न भी उभरता है कि खण्डित दृष्टि से भारतवर्ष को अखण्डता में कैसे बांधा जा सकेगा? जिनकी दीक्षा ही हिन्दुओं की रक्षा थी, वे भी कुछ अधिक पाने की हड़बड़ी में अनेक स्तरों पर बड़ी गड़बड़ियाँ करते दिख रहे हैं। जब समानता ही मन्त्र हो, तो विभाजित दृष्टि से उसकी सिद्धि कैसे सम्भव हो सकेगी? ऐसी स्थिति में राम-कृष्ण जैसे जीवनादर्श अनुकरणीय कर्म बनने के स्थान पर केवल वाचिक सजावट बनकर रह जाते हैं। लेखक के रूप में मित्रप्रवर की बहुअर्थी चिन्ता को आपके माध्यम से बृहत्तर समाज तक पहुँचाने के अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग न दिखा। बात पहुँचे और यदि पूर्ण जागरण न भी हो, तो कम-से-कम जूं जितनी ही सही, कोई हलचल अवश्य उत्पन्न हो।