ईरान में हालिया नरसंहार किसी आकस्मिक राजनीतिक उथल-पुथल का नतीजा नहीं है। यह एक सुनियोजित, वैचारिक और मजहब आधारित सतत हिंसा का विस्तार है, जो कभी समाप्त नहीं होती। इस त्रासदी में अधिक भयावह यह वैश्विक चुष्पी है, जिसे अक्सर मानवाधिकार, लोकतंत्र और अंतरात्मा की दुहाई देने वाला कुटिल वर्ग जानबूझकर साधे रहता है। इस मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रतिक्रिया भी उसी वैश्विक पाखंड का हिस्सा है। दुनिया के सबसे ताकतवर पद पर बैठा व्यक्ति यदि हर अंतरराष्ट्रीय संकट को सौदेबाजी और तात्कालिक लाभ के चश्मे से देखे, तो उससे नैतिकता की अपेक्षा करना स्वयं को धोखा देना है। ईरान में गिरती लाशों पर ट्रंप के वक्तव्य न तो संवेदनशील है, न ही उसमें लोकतंत्र बहाली का कोई संकल्प दिखता है- यदि कुछ है, तो यह केवल स्थार्थ है।
निहत्थे ईरानी जिस साहस के साथ इस्लामी तानाशाही के विरुद्ध खड़े रहे, वह आधुनिक इतिहास का एक करुण और गौरवपूर्ण अध्याय है। 17 जनवरी को स्वयं सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई द्वारा यह स्वीकार करना कि इस्लामी शासन-विरोधी प्रदर्शनों में कई हजार लोग' मारे जा चुके हैं, वह मजहबी रक्तपात की भयावहता का एक और प्रतिरूप है। लेकिन मूल प्रश्न याह है कि जब मुसलमानों की हत्या किसी इस्लामी शासन के हाथों होती है, तब एक विशेष संगठित आक्रोश कहां गायब हो जाता है? गाजा में इजरायली सेना द्वारा मुसलमानों की मौतों और कश्मीर में मोदी सरकार के आतंकवाद-अलगाववाद विरोधी अभियानों पर आसमान सिर पर उठा लेने वाला स्वयंभू बुद्धिजीवी कुनबा ईरान में मुसलमानों के नरसंहार पर मौन क्यों हैं? 'उम्माह', जो कि वैश्विक मुस्लिम एकता का कथित सिद्धांत है- यह निष्क्रिय क्यों है? आखिर निहत्थ आंदोलित ईरानी किसके लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा रहे हैं?
दरअसल, यह वहां दोहरा मापदंड है, जिसने आज के नैतिक विमर्श को सड़ांध से भर दिया है। इस्लाम के नाम पर गैर-मुसलमानों से घृणा, उनके पूजा स्थलों का विखंडन और हिंसा (हत्या सहित) सदियों से जारी मजहबी उपक्रम है, जिसे वर्षों से तथाकथित उदारवादियों द्वारा भ्रामक रूपी 'प्रतिक्रिया की आड़ में जायज ठहराने का प्रयास किया जा रहा है। इसी में मुसलमानों के दमन और यहां तक कि उनके कत्ल पर इसी समूह द्वारा चुप्पी तब साध ली जाती है, जब हत्यारा हम-मजहबी या विशुद्ध इस्लामी शासनतंत्र हो। तब ऐसा व्यवहार किया जाता है, मानो मानवता को कोई चोट ही न पहुंची हो, मानी रक्त केवल रंग हो और करुणा सिर्फ वैचारिक विकल्प। इससे अधिक नैतिक पतन और बौद्धिक दरिद्रता और क्या हो सकती है? क्या यह सच नहीं कि हर दिन सैकड़ों ईरानी उन स्वतंत्रताओं (पसंदीदा कपड़े पहनने सहित) की तलाश में गोलियों का शिकार हो रहे हैं, जिन्हें सभ्य समाजों में, हमारे यहां भी, स्वाभाविक माना जाता है? भारत में वामपंथियों, तथाकथित उदारवादियों और महिला अधिकार समूहों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। जो वर्ग छोटी-छोटी घटना (गाज्जा सहित) पर अक्सर सड़कों पर उतर आता है, वह ईरान में महिलाओं के दमन में असामान्य रूप से चुप है। यही नहीं, श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश में सत्ता-परिवर्तन का प्रयोग अपने देश में दोहराने की कामना करने वाले भी पूरी तरह शांत है? इस पाखंड के दो स्पष्ट कारण हैं।
पहला ईरान में मुस्लिम नरसंहार उस सुविधाजनक नैरेटिव के मुताबिक नाहीं है, जिसमें हर अत्याचार का दोष अक्सर तथाकथित 'हिंदू फासीवाद', 'युद्धोन्मादी यहूदी' या 'अमेरिकी साम्राज्यवाद' पर मढ़ा जाता है। ईरान में हजारों मुसलमानों को हत्याएं अयातुल्ला अली खामेनेई के निर्देश पर हुई है। दूससा- ईरान में इस्लामी व्यवस्था का जन्म वामपंथियों और मुल्ला मौलवियों के गठजोड़ से हुआ था। पांच दशक पहले माक्र्सवादी तूदेह पार्टी और अन्य वाम गुटों ने तत्कालीन ईरानी राजा मोहम्मद रजा पहलवी के विरुद्ध मजहबी आंदोलन में निर्णायक भूमिका निभाई थी। इसलिए वामपंथी समूह अपने सहयोग से स्थापित इस्लामी तंत्र की क्रूरता पर खामोश है।
वर्ष 1978 तक ईरान एक आधुनिक और अपेक्षाकृत उदार समाज था। पहलवी कर अधिनायकवादी शासन चरित्र से बहुत हद तक सेकुरतर यहा, जिसमें महिलाओं को शिक्षा-मताधिकार प्राप्त था और सत्ता-अधिष्ठान मजहबी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता था। तेल से प्राप्त संसाधनों का उपयोग बुनियादी द्वांचे और आधुनिकता के निर्माण में किया जाता था। पश्चिमी देशों से बढ़ती नजदीकी के कारण पहलवी के खिलाफ वामपंथियों ने इस्लामी फट्टत्पधियों से हाथ मिलाया और 'क्रांति' के नाम पर जनता को यह विश्वास दिलाया कि इस्लामी शासन ही मुक्ति का मार्ग है। परिणाम वहाँ हुआ, जो ऐसे ह अस्वाभाविक गठजोड़ में होता है। सत्ता पर मुल्ला मौलवियों कर कब्जा और 'काफिर-कु' का सफाया।
ईरान 1979 के बाद आग से निकलकर भट्टले में जा गिरा। विश्वविद्यालय बंद हो गए हो छात्र संगठन प्रतिबंधित और याहाँ तक कि वामपंथी विचारकों को जेलों में ठूंस दिया गया। महिलाओं को आधुनिक जीवन से बाहर निकालकर मजाबी पुलिस के माध्यम से मध्ययुगीन काल में धकेल दिया गया। भारत इस चिंतन परिचित है। 1947 में जिहादियों ने कम्युनिस्टों और औपनिवेशिकों से गठजोड़ करके भारत के एक-तिहाई हिस्से पर इस्लामी परचम फहरा दिया। वहीं वैचारिक पटकमा, वही औजार और वाही परिणाम। पाकिस्तानऔर बांग्लादेश इस प्रयोग के जीवित प्रमाण है, जहां अल्पसंख्यकों का तीख क्षरण, महिलाओं का बढ़ता दमन और अंतहीन सांप्रदायिक हिंसा का काला इतिहास है। पाकिस्तान में जारी सुन्नी-शिया संगर्ष यह सिद्ध करता है कि एक निश्चित और संकीर्ण पहचान पर बना देश अपने भीतर विविधता को सहन नहीं कर सकता।
ईरान की तरह पाकिस्तान में भी राजनीतिक स्वार्थ और मजहबी कट्टरता, समाज को लगातार अस्थिरता और रक्तपात की ओर धकेल रहा है। यदि डोनाल्ड ट्रंप को वाकई लोकतंत्र-मानवाधिकारों की चिंता होती, तो वे पाकिस्तान से निकटता नहीं बढ़ाते, जहाँ गैर-मुसलमानों के साथ मुस्लिमों (शिया-अहमदिया सहित) को भी दीन के नाम पर प्रताड़ित और बलूचा-सिंधी आदि विद्रोहियों का दमन किया जा रहा है। आज भी वही भारत-विरोधी शक्तियां देश में 1947 जैसी पटकथा दोहराने का प्रयास कर रही है। सीएए विरोधी हिंसक प्रदर्शन से लेकर कथित किसान आंदोलन और नूपुर शर्मा आदि प्रकरण तक इसके उदाहरण है। यह ठीक है कि वे अब तक सफल नहीं हुए, लेकिन भारत को पुनः तोड़ने के प्रयास अब भी जारी है। वही ईरान की असदी वैश्विक दोहरे मापदंडों, वैचारिक अंधेपन और नैतिक पाखंड का प्रतिबिंध है।
ईरान में मुस्लिम नरसंहार उस सुविधाजनक नेटिव के मुताबिक नहीं है, जिसमें हर अत्याचार का दोष अक्सर तथाकथित 'हिंदू फासीवाद', 'युद्धोन्मादी यहूदी' या अमेरिकी साम्राज्यवाद' पर मढ़ा जाता है। ईरान में हजारों मुसलमानों की हत्याएं अयातुल्ला अली खामेनेई के निर्देश पर हुई है। दूसरा ईरान में इस्लामी व्यवस्था का जन्म वामपंथियों और मुल्ला मौलवियों के गठजोड़ से हुआ था। पांच दशक पहले मार्क्सवादी तूदेह पार्टी और अन्य वाम गुटों ने तत्कालीन ईरानी राजा मोहम्मद रजा पहलवी के विरुद्ध मजहबी आआंदोलन में निर्णायक भूमिका निभाई थी।