संघ कार्य के 100 वर्ष:सात साल की उम्र में अमीनपारा की ‘शाखा’ गया, वहीं से बदल गया मेरा जीवन

Update: 2026-01-18 07:19 GMT

कर्म-पथ पर संघ के संस्कार

पढ़ाई के बाद नौकरी के दौरान संघ से मिले राष्ट्र-प्रेम और कर्तव्यनिष्ठा के संस्कारों ने मुझे सही मार्ग दिखाया। मैंने हमेशा राष्ट्र को सर्वोपरि मानकर कार्य किया। मेरी अंतरात्मा इस बात की गवाह है कि मैंने कभी ऐसा कोई कार्य नहीं किया, जिससे राष्ट्र, समाज या किसी व्यक्ति अथवा परिवार को दुःख पहुंचे। मैं अपने सहकर्मियों को भी यही सलाह देता था।

यही मानवीय गुण और नैतिक आचरण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने स्वयंसेवकों को सिखाता है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि आरएसएस राष्ट्र-प्रेम जगाने वाला और भारतीयता का पोषण करने वाला भारत का एक अद्वितीय संगठन है। यह हमारी महान सनातन संस्कृति को जागृत रखे हुए है।

उन सभी राजनीतिक दलों और व्यक्तियों से मेरा विनम्र अनुरोध है, जो संघ पर बिना जाने आरोप लगाते हैं.कृपया एक दिन स्वयं शाखा में उपस्थित हों। वहां कुछ समय बिताएं। बच्चों और स्वयंसेवकों को देखें। तब आपको स्वतः ही पता चल जाएगा कि राष्ट्र-भक्ति का वास्तविक स्वरूप क्या होता है और यह संगठन किस पवित्र उद्देश्य के लिए निःस्वार्थ भाव से कार्य कर रहा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से मेरा जुड़ाव आज से ठीक 64 वर्ष पहले हुआ था। तब मैं केवल सात वर्ष का था और उस समय इस अद्भुत संसार को सिर्फ ‘शाखा’ के नाम से जानता था। रायपुर के अमीनपारा की प्राथमिक शाला का शांत प्रांगण हर रविवार सुबह सात बजे हमारी कर्मभूमि बन जाता था। वहीं शाखा लगती थी।

शाखा में केशव भैया (डॉ. केशव ठाकुर), डॉ. शिवकुमार अग्रवाल और डॉ. सुखनंदन सोनकर जैसे त्यागी और समर्पित स्वयंसेवक आते थे। उनके सान्निध्य में भगवा ध्वज फहराया जाता और राष्ट्र-भाव से ओतप्रोत प्रार्थना होती थी, जिसके शब्द आज भी मेरे कानों में गूंजते हैं। इसके बाद शारीरिक और मानसिक विकास के लिए अनेक खेल खेले जाते थे दौड़, कबड्डी, मलखंभ जो न केवल शरीर को बल देते थे, बल्कि टीम भावना का भी बीजारोपण करते थे।

खेल के बाद हम बच्चों को भारत माता के वीर सपूतों पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी और नेताजी सुभाषचंद्र बोस की शौर्य गाथाएं सुनाई जाती थीं। हमें संतों और कवियों तुलसीदास, कबीरदास और मीराबाई के जीवन और दर्शन से परिचित कराया जाता था। उसी समय मैंने शहीद भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद के बलिदान के बारे में जाना।

शाखा से घर लौटने के बाद मन ऊर्जा से भरा रहता था

एक दिन मुझे ज्ञात हुआ कि अब शाला प्रांगण में शाखा नहीं लगेगी। यह जानकर निराश होकर घर लौटना पड़ा। जब घर के लोगों को बताया तो उन्हें भी अच्छा नहीं लगा। बाद में पता चला कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार के निर्देश पर शाखा बंद कराई गई थी।

शाखा बंद होने के बावजूद हम साथी मिलते-जुलते रहे। भैया लोग जहां भी मिलते, स्नेहपूर्ण बातें करते और राष्ट्र-प्रेम से जुड़ी कोई न कोई प्रेरक बात अवश्य बताते थे। जैसे-जैसे मैं बड़ा होता गया, संघ से मिले संस्कारों के कारण मेरे मन में राष्ट्र-प्रेम की भावना और अधिक सुदृढ़ होती गई। आरएसएस का नाम सुनते ही मेरे भीतर देश-भक्ति का भाव जाग उठता था। यह लगाव किसी संस्था से नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय चेतना से था, जिसे संघ ने मेरे भीतर जगाया था।

संघ से जुड़े लोग मिलते तो राष्ट्र के उत्थान और नवनिर्माण की बातें होतीं। हर रविवार की शाखा हमें ज्ञान, शौर्य और धर्मपरायणता की अमूल्य पूंजी सौंपती थी। शाखा से घर लौटने के बाद मन ऊर्जा से भरा रहता था। मैं परिवार के लोगों, खासकर मां को, संघ की गतिविधियों के बारे में बताया करता था। महापुरुषों के बारे में जो कुछ सुनकर आता, उसे परिवार में साझा करता था। मां और घर के अन्य लोग मेरी बालसुलभ बातों पर मुस्कराते थे। मोहल्ले के कई बुजुर्ग मेरी बातें सुनकर प्रसन्न होते और वे भी नेक बातें बताया करते थे। स्कूल में दोस्तों से भी इस संबंध में चर्चा होती थी। कई बच्चों को मैंने शाखा से जोड़ा।

मई 2017 में मैं शासकीय सेवा से निवृत्त हुआ। अब साहित्य-साधना और समाज-सेवा का कार्य करता हूं। आज भी मैं महावीर अखाड़ा के सामने, जैतूसाब मठ, पुरानी बस्ती स्थित अपने निवास से संघ की गतिविधियों पर ध्यान देता हूं और इसकी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विचारधारा का प्रशंसक हूं। बचपन के वे स्वर्णिम दिन और मिले हुए संस्कार मेरे हृदय में आज भी ताजे और प्रकाशित हैं। वही भाव मेरी कविताओं और लेखों में भी प्रकट होते हैं।

मैं मानता हूं कि हर साहित्यकार को राष्ट्र-प्रेम से ओतप्रोत सृजन करना चाहिए। बच्चों को अच्छे संस्कार देने चाहिए, ताकि उनका जीवन राष्ट्र के विकास में समर्पित हो सके।

“सच्चा स्वयंसेवक वही है, जो अपने स्वार्थ को त्यागकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखे। संघ कार्य कोई नौकरी नहीं, यह राष्ट्रभक्ति की साधना है।”

- डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार

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