बिहार के बाद महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों में मिली सफलता ने लोगों को फिर हैरान किया है। भाजपा के प्रति इतना समर्थन है कि विरोधी भी यह कहने पर मजबूर हैं कि भाजपा पार्टी कड़ी मेहनत करती है, यही वजह है कि कोई अन्य पार्टी उसके आसपास भी खड़ी नहीं हो पा रही है। जाहिर है, भाजपा में प्रोफेशनल एक्सीलेंस को राजनीति में लाने का श्रेय नेतृत्व को जाता है। इसी क्रम में पार्टी ने एक बार फिर संगठनात्मक कमान अमित शाह के हाथों में सौंप दी है। अब लोगों में यह उम्मीद बन गई है कि पश्चिम बंगाल में भी इस बार भाजपा बहुमत लेकर आएगी।
संगठन से जुड़े कई रणनीतिकार यह कहने लगे हैं कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सीटें 50 से भी नीचे आ सकती हैं। यहां तक कहा जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस को अपनी सियासी जमीन बचाने में भी भारी मशक्कत करनी पड़ सकती है। पश्चिम बंगाल को यदि सत्ता से बाहर होना पड़ता है, तो इसके पीछे भाजपा के आक्रामक अभियान के साथ-साथ बनर्जी सरकार के भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण की राजनीति का पतन भी एक बड़ा कारण होगा। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति से प्रदेश की लगभग 10 प्रतिशत आबादी ऊब चुकी है और इस बार बदलाव की आवाज साफ सुनाई दे रही है।
जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले महीने 29 से 31 दिसंबर तक राज्य का दौरा किया, तो स्थानीय लोगों और भाजपा कार्यकर्ताओं में इसी तरह का उत्साह साफ दिखाई दिया। यह दौरा बंगाल मिशन की एक अहम शुरुआत माना जा रहा है। तीन दिनों में मैराथन संगठनात्मक बैठकों के दौरान कार्यकर्ताओं के साथ-साथ पार्टी पदाधिकारियों को भी स्पष्ट निर्देश दिए गए। अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में भाजपा के लिए दो-तिहाई बहुमत का लक्ष्य भी सामने रख दिया।
शाह की कार्यशैली को देखें तो वे सबसे पहले संगठन की कसावट से शुरुआत करते हैं। विधायकों और सांसदों के साथ-साथ जमीनी कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद करते हैं। संगठन और उम्मीदवारों की कमजोरियों को चिन्हित कर, उसके समाधान पर तुरंत काम शुरू कर देते हैं। पश्चिम बंगाल में भी अमित शाह ने सरकार के खिलाफ नौकरी घोटाला, कोयला घोटाला और पशु तस्करी जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है। इन मामलों में तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और मंत्रियों के नाम सामने आना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। राज्य के कई मंत्रियों और नेताओं के जेल जाने से सरकार पहले से ही दबाव में है।
सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा अवैध घुसपैठ का बनता जा रहा है। ममता बनर्जी इस मुद्दे पर असहज नजर आती हैं। अमित शाह के आरोप हैं कि अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बाड़ लगाने के लिए केंद्र द्वारा बार-बार आग्रह के बावजूद राज्य सरकार ने बीएसएफ को जमीन देने से इनकार किया। भाजपा का दावा है कि बांग्लादेश से घुसपैठ लगभग बंद हो गई है, जबकि तृणमूल के शासनकाल में यह लगातार जारी रही।
बंगाल की सामाजिक संरचना तेजी से बदली है। सीमावर्ती इलाकों में हालात ऐसे बन गए हैं कि स्थानीय लोग खुद को अल्पसंख्यक महसूस करने लगे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि जो लोग मूल निवासी नहीं हैं, उन्होंने धीरे-धीरे संसाधनों पर कब्जा जमा लिया है। इससे बंगाल की जीवन-पद्धति में बड़ा बदलाव आया है।
भाजपा का तर्क है कि घुसपैठ रोकने के लिए सख्त नीति जरूरी है और जब से यह जिम्मेदारी अमित शाह के हाथों में आई है, तब से स्थिति में सुधार दिख रहा है। 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को राज्य में केवल 3 सीटें मिली थीं, लेकिन 2021 में पार्टी ने 77 सीटों पर जीत दर्ज कर बड़ी छलांग लगाई। इसी तरह 2014 में भाजपा को लोकसभा में 17 प्रतिशत वोट मिले थे, जो 2024 में बढ़कर लगभग 39 प्रतिशत तक पहुंच गए।
पार्टी अब पूरी तरह से केंद्रित रणनीति के साथ आगे बढ़ रही है। बंगाल के कुल लगभग 81 हजार मतदान केंद्रों में से 65 हजार पर भाजपा ने बूथ समितियां गठित कर दी हैं और सभी 294 विधानसभा क्षेत्रों में विस्तारक तैनात कर दिए गए हैं। दूसरी ओर, राज्य में अपराध और भ्रष्टाचार के मुद्दे लगातार बढ़ते जा रहे हैं। खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का व्यवहार भी कई बार मर्यादाओं को पार करता दिखाई देता है। केंद्र के साथ बैठकों में कागज फेंकना, अधिकारियों से अभद्रता करना और संवैधानिक पद की गरिमा को नजरअंदाज करना विपक्ष के लिए बड़ा हथियार बन गया है।
हाल के दिनों में ईडी अधिकारियों के साथ हुआ टकराव भी सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला साबित हुआ है। भाजपा समर्थक मानते हैं कि यदि यही स्थिति बनी रही तो 2026 में ममता बनर्जी के लिए सत्ता बचाना मुश्किल हो सकता है। मुस्लिम-हिंदू विभाजन और पक्षपात की राजनीति अब ज्यादा समय तक नहीं चल पाएगी। बंगाल के मतदाता अब बदलाव के लिए तैयार दिखाई दे रहे हैं।