भारत को स्पेस सुपर पावर बनाता प्राइवेट सेक्टर

विवेक सुचा

Update: 2026-01-16 03:28 GMT

भारत के स्पेस मिशन में निजी क्षेत्र की भागीदारी कितनी अहम

भारत अनुसंधान और अंतरिक्ष संगठन (इसरो) के सोमवार को हुए पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी) मिशन में निजी क्षेत्र की अहम भागीदारी देखने को मिली। पहली बार हैदराबाद की कंपनी पूषा स्पेस ने सैटेलाइट उपलब्ध कराए, जो इस मिशन का हिस्सा बने। इस ताजा मिशन में निजी भागीदारी से साफ है कि भारत अपने अंतरिक्ष इकोसिस्टम में नई कंपनियों को बड़ी भूमिका देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। निजी क्षेत्र को मजबूत रेगुलेटरी सपोर्ट और तकनीकी सहयोग मिल रहा है, जिससे इसरो के साथ सहयोग और गहरा हो सकता है।

निजी क्षेत्र की भूमिका कितनी अहम?

इसरो के मिशनों में निजी कंपनियां सैटेलाइट निर्माण, विकास और डेटा सेवाओं में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। पूषा स्पेस के मिशन में शामिल होने से यह स्पष्ट होता है कि निजी क्षेत्र सस्ते और नवीन समाधान प्रदान कर रहा है। इससे लॉन्च क्षमता बढ़ रही है और लागत में कमी आ रही है। पहले इसरो अकेले ही सब कुछ संभालता था, लेकिन अब 300 से अधिक स्टार्टअप्स इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं।

स्काईरूट एयरोस्पेस, सेलेस्टियल एयरोस्पेस, अग्निकुल कॉसमोस और पिक्सेल स्पेस जैसी कंपनियां सैटेलाइट लॉन्च और अर्थ ऑब्जर्वेशन में योगदान दे रही हैं। निजी क्षेत्र की भागीदारी से इसरो को बड़े और जटिल मिशनों पर फोकस करने का मौका मिलता है, जबकि नियमित और तकनीकी कार्य निजी कंपनियां संभालती हैं।

युवा वैज्ञानिकों की नई सोच

इसी संदर्भ में गुरुग्राम के युवा वैज्ञानिकों का एक समूह खास तौर पर उल्लेखनीय है। आईआईटी से जुड़े इस समूह का नेतृत्व श्रेयांस जैन कर रहे हैं। उनकी कंपनी सेलेस्टियल एयरोस्पेस एक अभिनव बैलून-आधारित लॉन्च सिस्टम विकसित कर रही है। इस तकनीक में एक बड़ा बैलून रॉकेट को ऊपरी वायुमंडल तक ले जाता है, जहां हवा का घनत्व कम होता है। वहां से रॉकेट प्रक्षेपित किया जाता है, जिससे ईंधन की बचत होती है और पेलोड क्षमता 2–3 गुना तक बढ़ सकती है।

जमीन से लॉन्च करने में गुरुत्वाकर्षण से लड़ने के कारण अधिक ईंधन खर्च होता है, जबकि यह तकनीक लागत कम करती है और प्रदूषण भी घटाती है। उनकी टीम ऐसी संरचनाओं पर काम कर रही है, जो ग्रीन ईंधन से संचालित हों। कई महीनों के शोध के बाद टीम ने विंड टनल परीक्षण पूरे किए हैं और 2026 तक प्रोटोटाइप लॉन्च करने का लक्ष्य रखा है। यह नवाचार इसरो के मिशनों में सीधे तौर पर उपयोगी हो सकता है।

स्पेस इकोनॉमी और भारत का लक्ष्य

निजी क्षेत्र की भागीदारी यह दिखाती है कि कैसे युवा उद्यमी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को आगे बढ़ा रहे हैं। इससे भारत और विदेशों में भारत की साख मजबूत हुई है। निजी क्षेत्र स्पेस मिशनों में बड़ी भूमिका निभा रहा है, जो भारत के दीर्घकालिक सपनों के लिए अनिवार्य है।

भारत की स्पेस इकोनॉमी वर्तमान में लगभग 9 बिलियन डॉलर की है, जो वैश्विक बाजार का करीब 2–3 प्रतिशत है। सरकार का लक्ष्य 2033 तक इसे 44 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने का है। इस लक्ष्य को हासिल करने में निजी क्षेत्र की भूमिका निर्णायक है।

2020 से शुरू हुए सुधारों, इंडियन स्पेस पॉलिसी 2023, आईएन-स्पेस (इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथोराइजेशन सेंटर) के गठन और 100 प्रतिशत एफडीआई की अनुमति ने निजी कंपनियों को प्रोत्साहित किया है। इससे स्वदेशी तकनीक विकसित हो रही है, जो आत्मनिर्भर भारत की दिशा में अहम कदम है।

भविष्य की राह

निजी कंपनियां न केवल आर्थिक मूल्य पैदा कर रही हैं, बल्कि भारत की सॉफ्ट पावर भी बढ़ा रही हैं। सेलेस्टियल एयरोस्पेस जैसी कंपनियों की बैलून तकनीक ईंधन बचत के साथ सस्टेनेबल स्पेस इकोसिस्टम की दिशा में बड़ा कदम है। भविष्य में निजी क्षेत्र मंगल मिशन और स्पेस टूरिज्म जैसे क्षेत्रों में भी योगदान दे सकता है।

कुल मिलाकर, इसरो के मिशनों में निजी क्षेत्र की भूमिका केवल सहायक नहीं, बल्कि भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं के लिए अनिवार्य बन चुकी है। श्रेयांस जैन जैसे युवा इनोवेटर्स इस परिवर्तन के प्रतीक हैं। निजी क्षेत्र से नवाचार बढ़ेगा, लागत घटेगी और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत मजबूत होगा। यही रास्ता भारत को एक सच्ची स्पेस सुपर पावर बनाने की ओर ले जाता है।

Similar News