श्रीराम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा वर्षगांठ: आओ सनातन विजय का दूसरा उत्सव मनाते हैं

डॉ. अजय खेमरिया

Update: 2026-01-22 04:58 GMT

ठीक दो साल पहले आज ही के दिन देश का स्वर एक ही था ‘मेरे राम आ रहे हैं’। धरती, अंबर, सब ओर इसी की गूंज थी। क्या अद्भुत दृश्य था भारत का। एक विस्मृत लोकचेतना मानो बंधन से मुक्त होकर लोक में नाच रही थी। आज कैलेंडर की तारीख फिर उसी घड़ी को याद दिला रही है।

सवाल यह है कि क्या यह केवल एक मंदिर भर की बात थी? उस भारत में, जहां हर एक लाख की आबादी पर 53 मंदिर हैं, फिर इस मंदिर की इतनी चर्चा और विमर्श की क्या खासियत थी?

असल में यह विश्व की सबसे महान सभ्यता का पुनरुत्थान था। हां, मेरी अपनी समझ में 22 जनवरी 2024 भारत के पुनरुत्थान का स्वर्णिम संधि-काल के रूप में दर्ज है। जो लोग ‘धर्म-धर्म’ चिल्लाते रहते हैं, वास्तव में वे सभ्यता के महीन आवरण को पकड़ ही नहीं पाते, तब जब विमर्श के केंद्र में रामलला और अयोध्या हों।

धरती पर केवल भारत की सभ्यता ही सबसे मौलिक है और इसे हिंदू धर्म कहकर एक बौद्धिक खुराफात हमारे स्वत्व के साथ नियोजित होकर कारित की गई है। अगर यह सभ्यता से संयुक्त नहीं होता, तो क्या कारण है कि देश में जाति, पाति, अमीरी, गरीबी, वर्ग के भेद भुलाकर दो साल पहले लोग स्वप्रेरित होकर रामलला के स्वागत में आतुर होते, जबकि भारत के हिंदू तो हजारों इष्ट, गुरु, शाखाओं और पूजा पद्धतियों में सदियों से बंटे रहे हैं।

‘राम आएंगे… राम आएंगे, मेरी झोपड़ी के भाग्य खुल जाएंगे’ यह नाद भारत-वाणी में यूं ही तब्दील नहीं हुआ था। गहराई से देखें तो यह एक आहत राष्ट्र और सभ्यता का औपनिवेशिक सेक्युलरिज़्म और इस्लामिक बर्बरता से मुक्ति का सुमंगल योग भी था।

ख्यात बुद्धिजीवी वी.एस. नायपाल भारत को एक ‘आहत सभ्यता’ कहते हैं। सच भी यही है, क्योंकि आधुनिक जगत में इस्लामिक बर्बरता से मुक्ति के ईसाई उदाहरण तो यूरोप में बुल्गारिया, हंगरी जैसे देशों के रूप में बीसियों हैं, जहां गिरिजाघर फिर बहाल हुए हैं, जिन्हें इस्लामिक आतताइयों ने कब्जा कर मस्जिदों में तब्दील कर दिया था। भारत अकेला ऐसा उदाहरण है, यूरोप से बाहर, जिसने अयोध्या को मूल रूप में बहाल करने का सुफल किया है। इसलिए इसे महज मंदिर का प्रश्न समझकर सीमित नहीं किया जा सकता।

22 जनवरी हमारी सभ्यता की बहाली का उत्सव बन चुका है, जिसे हर साल अब दीपावली की तरह अधिमान्यता देने का समय आ गया है। ऐसा इसलिए, क्योंकि भारत का धर्म सभ्यता से परे कभी नहीं रहा है।

आधुनिक संदर्भ में अयोध्या और राम तो बस निमित्त भर हैं एक ऐसी सभ्यता के पुनर्प्रदीप्ति पाने के, जिसने मानव जगत को धर्म और नर के मानक प्रदान किए। जिसने दुनिया को मूल्य दिए। जिसने विविधताओं में एकता नहीं, बल्कि एकता में छिपी विविधताओं के सम्मान का तरीका समझाया।

दुर्भाग्य से अंग्रेजी सेक्युलर दृष्टि, मुगलिया चश्मे और आज़ाद भारत के वाम दुर्बुद्धिजीवियों ने भारत की आहत आत्मा को बाबर और औरंगज़ेब के सामने न केवल नकारा, बल्कि उनके यशगान को सेक्युलर बताकर चार पीढ़ियों तक मानसिक रूप से बंधक भी बनाए रखा। इसलिए आइए, अयोध्या के नाम पर सनातन की ऐतिहासिक विजय का दूसरा उत्सव मनाते हैं।

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