आखिरकार शांति का नोबेल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तक पहुंच ही गया। खुद को शांति दूत बताने वाले ट्रंप की दावेदारी के बावजूद नोबेल पुरस्कार समिति ने तो उन्हें इस लायक नहीं माना, पर वेनेजुएला की जिन विपक्षी नेता मारिया मचाडो को नोबेल दिया गया था, वही खुद वाशिंगटन जाकर उन्हें अपना पुरस्कार सौंप आईं।
अपने सालभर के शासन में युद्धविराम का इतिहास रचने के एकतरफा दावे करते हुए ट्रंप खुद को शांति के नोबेल का सही पात्र बताते रहे, लेकिन पुरस्कार समिति को ऐसा नहीं लगा। सो, दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी समझे जाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति के दावे को नजरअंदाज कर समिति ने नोबेल दे दिया वेनेजुएला में लोकतांत्रिक और मानवाधिकारों के लिए संघर्षरत विपक्षी नेता मारिया मचाडो को।
खुद को दुनिया का चौधरी समझने वाले ट्रंप नाराज हुए। नोबेल समिति की बुरा-भला भी कहा। फिर भी मचाडो ने वेनेजुएला में लोकतंत्र बहाली में सहयोग की आकांक्षा जताते हुए अपना नोबेल उन्हें समर्पित करने की बात कही थी। तब माना गया था कि यह एक नोबेल विजेता का बड़प्पन है कि उसने अपनी प्रतिक्रिया में पदक से वंचित को अपना पदक समर्पित किया, पर मचाडो ने ट्रंप से मुलाकात में उन्हें बाकायदा अपना नोबेल सौंप कर अब दुनिया को चौंका दिया है।
हालांकि नोबेल पुरस्कार समिति ने स्पष्ट कर दिया है कि इसे किसी को गिफ्ट या ट्रांसफर नहीं किया जा सकता। यह भी कि सिर्फ मूल विजेता ही हमेशा नोबेल पुरस्कार विजेता कहलाएगा। हां, नोबेल पुरस्कार को बेचने पर कोई पाबंदी नहीं है। अतीत में पांच नोबेल विजेता दिमित्री मुरातोव, जेम्स वाटसन, फ्रांसिस क्रिक, जॉन नैश और नील्स बोहर अलग-अलग कारणों से अपना पदक बेच या नीलाम कर चुके हैं।
मचाडो द्वारा अपना नोबेल ट्रंप को दे देने के पीछे की किसी डील पर फिलहाल अटकलें ही लगाई जा सकती हैं। वैसे मचाडो से पहले वेनेजुएला पर हमला कर ट्रंप दुनिया को चौंका चुके थे। नशीले पदार्थों, टेररिज्म आदि के आरोपों के बीच लगातार धमकियां सहने के बाद एक दिन अचानक ट्रंप ने अपनी डेल्टा फोर्स भेजकर वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को सपत्नीक उठवा लिया।
मादुरो पर अमेरिका में जारी मुकदमे के बीच ही मचाडो वाशिंगटन पहुंचकर ट्रंप से मिलीं और अपना नोबेल उन्हें गिफ्ट कर दिया। उन्होंने ट्रंप पर पूरा भरोसा जताते हुए इसे वेनेजुएला के निवासियों के लिए ऐतिहासिक दिन भी करार दिया। ट्रंप ने भी मारिया से मुलाकात को सम्मानजनक बताते हुए टिप्पणी की “उन्होंने मेरे अच्छे कामों के लिए मुझे अपना नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया। हमारे बीच का यह आपसी सम्मान कमाल का है।”
इसमें दो राय नहीं कि इंजीनियरिंग का पेशा छोड़कर राजनीति में आईं, तलाकशुदा 58 वर्षीय मचाडो ने वाकई वेनेजुएला में तानाशाही शासन समाप्त कर लोकतंत्र बहाली के लिए लंबा शांतिपूर्ण संघर्ष किया है। उन्होंने बहुत कुछ सहा भी है। उसी संघर्ष के लिए उन्हें विश्व का सबसे प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार भी मिला, जो उन्होंने अब उसी व्यक्ति को सौंप दिया है, जिसे पूरी दुनिया वेनेजुएला पर सैन्य आक्रमण करने वाले विदेशी शासक के रूप में देखती है।
ट्रंप खुद वेनेजुएला का तेल बेचकर मुनाफा कमाने की बात कह रहे हैं, लेकिन उन्हें अपना नोबेल सौंपते हुए मचाडो ने लिखा-“ट्रंप ने वेनेजुएला की आजादी के लिए जो किया है, उसे वेनेजुएला के लोग कभी नहीं भूलेंगे।
मादुरो की गिरफ्तारी के बाद वेनेजुएला में भावी सत्ता व्यवस्था और चुनावों की अटकलों के बीच ट्रंप से मिलीं मचाडो कोई ठोस आश्वासन नहीं पा सकीं। वेनेजुएला के संविधान के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज को अंतरिम राष्ट्रपति नियुक्त किया है, पर ट्रंप खुद को वहां का कार्यवाहक राष्ट्रपति बता रहे हैं।
शायद ट्रंप को रोड्रिगेज के साथ काम करने में कोई समस्या भी न हो, क्योंकि उनकी नजर तो वेनेजुएला में तेल और दुर्लभ खनिज संपदा के दोहन पर है। ऐसे में वेनेजुएला समेत दुनियाभर में मचाडो की नई भूमिका पर संदेह और सवाल स्वाभाविक हैं।
बेशक मचाडो लंबे समय से वेनेजुएला में लोकतांत्रिक और मानवाधिकारों की बहाली के लिए संघर्षरत हैं। 2024 में उन्हें राष्ट्रपति चुनाव नहीं लड़ने दिया गया और उनके द्वारा समर्थित विपक्षी उम्मीदवार एडमंड गोंजालेज को जीत के बावजूद सत्ता नहीं सौंपी गई। यह भी कि मादुरो की छवि तानाशाह शासक की रही है, लेकिन देश पर हमला कर उसके संसाधनों की लूट करने वाले विदेशी शासक का गुणगान करते हुए उसे अपना नोबेल सौंपकर खुद मचाडो अपनी साख पर उठते संदेह और सवालों से नहीं बच पाएंगी।
अपने देश में लोकतांत्रिक और मानवाधिकारों के लिए संघर्ष निश्चय ही देश-समाज के प्रति साहसिक प्रतिबद्धता का काम है, लेकिन उसके लिए विदेशी आक्रांता का सहयोग लेना और उसका गुणगान करना कम-से-कम देशप्रेम के दायरे में तो नहीं आता।
वैसे तो अमेरिका की छवि ही दूसरे देशों में कठपुतली सरकारें बनवाकर अपने हित साधने की रही है, लेकिन अपने दूसरे राष्ट्रपति काल में ट्रंप खुलेआम दादागिरी पर उतर आए हैं। मनमाने टैरिफ का कोड़ा फटकारने के बाद अब वह सीधे-साधे युद्ध की धमकियां दे रहे हैं।
ग्रीनलैंड पर कब्जे की कोशिशों का विरोध करने वाले देशों पर और अधिक टैरिफ की धमकी किसी सभ्य वैश्विक व्यवस्था का प्रमाण तो हरगिज नहीं। कोलंबिया और मैक्सिको पर भी ट्रंप की कुदृष्टि किसी से छिपी नहीं है।
ईरान के कट्टरपंथी शासन का समर्थन नहीं किया जा सकता, लेकिन सत्ता परिवर्तन का फैसला तो वहां के नागरिक ही करेंगे। ईरान की सड़कों पर जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच अमेरिकी धमकियां भी उसकी परदे के पीछे की भूमिका का संकेत दे रही थीं, लेकिन अब प्रदर्शनकारियों ने उस पर धोखे का आरोप लगाकर उस संदेह की एक तरह से पुष्टि कर दी है।
अमेरिका और सोवियत संघ के दौर में दुनिया ने लंबा शीत युद्ध देखा है। सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका विश्व व्यवस्था में अपना वर्चस्व स्थापित करना चाह रहा है। बेशक चीन, सोवियत संघ की जगह लेकर विश्व व्यवस्था को द्विध्रुवीय बनाना चाहता है, जबकि पुतिन के नेतृत्व में रूस भी अपना खोया हुआ दबदबा वापस पाने को बेताब है।
इन बड़े देशों की साम्राज्यवादी सोच शांति और सौहार्द पर आधारित न्यायसम्मत विश्व व्यवस्था के लिए खतरा पेश कर रही है, जिससे निपटने के लिए अब शेष विश्व को एकजुट प्रयास करने की जरूरत है। अगर इक्कीसवीं शताब्दी को युद्धोन्माद और विनाश के बजाय ज्ञान-विज्ञान और सभ्यता की शताब्दी बनाना है, तो अविलंब इन प्रयासों की शुरुआत कूटनीतिक स्तर से होनी चाहिए, वरना इतिहास माफ नहीं करेगा।