‘संवाद’ नहीं, सभ्यतागत अपमान का मंच

डॉ. विश्वास चौहान

Update: 2026-01-15 03:50 GMT

भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल (बीएलएफ) का विवाद अब किसी स्थानीय सांस्कृतिक असहमति तक सीमित नहीं रहा है। यह भारतीय सांस्कृतिक मंचों पर लंबे समय से सक्रिय उस वैचारिक एकाधिकार को उजागर करता है, जो ‘संवाद’, ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ और ‘समावेशिता’ जैसे शब्दों की आड़ में सभ्यतागत स्मृति पर सुनियोजित प्रहार करता रहा है। यह आयोजन अब साहित्य का उत्सव कम और वैचारिक एजेंडे तथा चंदाखोरी का मंच अधिक प्रतीत होता है, जहां आक्रांताओं के पुनर्पाठ को प्रगतिशीलता कहा जाता है और समाज की ऐतिहासिक पीड़ा को ‘न्यूज़’ में बदल दिया जाता है वह भी समाज के ही धन से।

भारत भवन जैसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक केंद्र को इस वैचारिक प्रयोगशाला के रूप में उपयोग किया जाना केवल संस्थागत विचलन नहीं है, बल्कि यह मध्यप्रदेश शासन की असमंजसपूर्ण मौन सहमति का भी संकेत देता है। इस पूरे विवाद ने बीएलएफ के वैचारिक स्रोतों, आयोजक राघव चंद्रा के उदारवादी बैकग्राउंड, 44 संस्थाओं से जुड़ी संदिग्ध फंडिंग संरचना और विदेशी प्रभाव को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है। पूर्ववर्ती विवादों से लेकर 2026 के बाबर-केंद्रित सत्र तक एक बात स्पष्ट है बीएलएफ साहित्य का मंच नहीं, बल्कि वैचारिक युद्ध का मैदान बन चुका है, जो भारत की जख्मी सभ्यता के ऐतिहासिक घावों को वामपंथी नाखूनों से खुरचता है।

भारत भवन की आत्मा और बीएलएफ का दुरुपयोग

संस्थागत मर्यादा का अपहरण

भारत भवन, मध्यप्रदेश शासन द्वारा स्थापित, समकालीन कला, साहित्य, संगीत और रंगकर्म की एक विशिष्ट संस्था रही है। इसके ट्रस्ट आधारित बाय-लॉज स्पष्ट करते हैं कि वागर्थ, रंगमंडल, अनहद, रूपंकर और छवि जैसे प्रभाग रचनात्मक समकालीन अभिव्यक्ति के लिए हैं, न कि मध्यकालीन आक्रांताओं पर विवादास्पद वैचारिक बहसों के लिए। इसके बावजूद बीएलएफ जैसे निजी आयोजन को प्रशासन द्वारा बार-बार इस शासकीय परिसर में स्थान देना गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

यदि यह उत्सव वास्तव में स्वतंत्र और गैर-सरकारी है, तो इसे निजी परिसरों में आयोजित करने में क्या बाधा है? भारत भवन की सरकारी गरिमा का उपयोग कर वैचारिक मंच सजाना सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है। यह न केवल ट्रस्ट बाय-लॉज की भावना के विरुद्ध है, बल्कि सार्वजनिक उत्तरदायित्व के सिद्धांतों से भी टकराता है। यदि शासन में इच्छाशक्ति हो, तो ऐसे मामलों में भारतीय न्याय संहिता की धारा 318 (लोकसेवक द्वारा आपराधिक विश्वासघात) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत विधिक कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

बीएलएफ के वैचारिक स्रोत

उदारवादी सेकुलरिज़्म की आड़ में विदेशी जाल

बीएलएफ के वैचारिक स्रोतों पर प्रश्न उठाना अब अपरिहार्य हो गया है। आयोजक और डायरेक्टर राघव चंद्रा की पृष्ठभूमि इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। उनकी शैक्षणिक और वैचारिक पृष्ठभूमि हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और सेंट स्टीफेंस कॉलेज से जुड़ी है, जिन्हें वामपंथी विचारधारा के गढ़ तथा भारतीय सनातन दृष्टिकोण के विरोधी परिसरों के रूप में देखा जाता रहा है। समस्या शिक्षा या अनुभव से नहीं, बल्कि उस वैचारिक दृष्टिकोण से है, जो अक्सर भारतीय सभ्यता को ‘ओरिएंटलिस्ट’ नजरिए से देखता है।

ऐसे विमर्शों में हिंदू परंपराओं को पिछड़ा और इस्लामी इतिहास को समावेशी बताने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। चंद्रा के लेखन और भाषणों में गांधी के उद्धरण मिलते हैं, लेकिन व्यवहार में यही सेकुलरिज़्म हिंदू स्मृति को कमजोर करने का माध्यम बन जाता है। प्रश्न स्वाभाविक है यदि आयोजक इतने ‘समावेशी’ हैं, तो बीएलएफ में विषय चयन बार-बार हिंदू संवेदनाओं से टकराने वाला क्यों होता है? क्या विदेशी शैक्षणिक दृष्टि भारतीय लोक-स्मृति को समझने में असमर्थ है, या यह असंवेदनशीलता जानबूझकर अपनाई जाती है?

फंडिंग के स्रोत

‘कम्युनिटी ड्रिवन’ दावा और पारदर्शिता का अभाव

बीएलएफ स्वयं को ‘कम्युनिटी ड्रिवन’ बताता है और कॉर्पोरेट स्पॉन्सरशिप से दूरी का दावा करता है। इसके बावजूद रिपोर्टों से स्पष्ट है कि इसे 44 संस्थाओं से फंडिंग मिलती है। इन संस्थाओं की पहचान सार्वजनिक नहीं की जाती, जिससे संदेह और गहरा होता है। पूर्व में एक कांग्रेस नेत्री ने इस विषय को लेकर ईडी में शिकायत करने की बात भी कही थी।

प्रश्न यह भी है कि क्या इन स्रोतों में विदेशी सांस्कृतिक संगठन और फाउंडेशन शामिल हैं। क्या यह वही पैटर्न नहीं है, जो ‘एनजीओ, एक्टिविटीज एंड फॉरेन फंड्स’ जैसी रिपोर्टों में उजागर होता रहा है? 2025 के आयोजन को यूनेस्को सिटी ऑफ लिटरेचर टैग से जोड़ने की कोशिश भी इसी विदेशी मान्यता की लालसा की ओर संकेत करती है, जिससे इस संस्था को विदेश से चंदा मिलने की युक्तियुक्त शंका होती है।

मेरी जानकारी के अनुसार, बीएलएफ की आयोजक संस्था ‘सोसायटी फॉर कल्चर एंड एनवायरनमेंट’ के पास फॉरेन एक्सचेंज रेगुलेशन एक्ट, 1973 (फेरा) तथा फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट, 1999 (फेमा) के तहत विदेशी धन या चंदे की स्वीकृति नहीं है। इसके बावजूद चर्चा है कि इन्होंने बीएलएफ में फ्रांस से जुड़े एक सत्र को ‘एलायंस फ्रांसेज़’ जैसी विदेशी संस्था से फंडिंग कराई है। यदि यह तथ्य सही है, तो संस्था के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई भी की जा सकती है।

विदेशी वामपंथी और जॉर्ज सोरोस से जुड़ती कड़ियां

फैक्ट स्टॉर्म पॉलिसी एंड रिसर्च फाउंडेशन, भोपाल की फैक्ट-फाइंडिंग के अनुसार 2023 से 2026 तक बीएलएफ के आयोजनों में साल्वेटर वावनेस (ऑस्ट्रेलियाई विचारक), वर्जिन बायज (फ्रेंच लेखिका), मिमी निकलिन (अंतरराष्ट्रीय टीवी होस्ट और कोच), विलियम डलरिम्पल (स्कॉटिश इतिहासकार और लेखक) जैसे विदेशी व्यक्तियों को आमंत्रित किया गया है। साल्वेटर वावनेस को छोड़कर अधिकांश विदेशी वक्ता अपने देशों में प्रगतिशील, सेकुलर और वैश्विक उदार बौद्धिक परंपरा से जुड़े रहे हैं, जिन्हें धुर वामपंथी माना जाता है। इसके प्रमाण लेखक के पास उपलब्ध हैं।

फैक्ट स्टॉर्म पॉलिसी एंड रिसर्च फाउंडेशन की रिपोर्ट का एक और चिंताजनक तथ्य यह है कि बीएलएफ में आमंत्रित विदेशी विचारक विलियम डलरिम्पल को ‘हाय फेस्टिवल’ में भी प्रमुख रूप से आमंत्रित किया गया था। यह आयोजन भारत और हिंदुत्व विरोधी माने जाने वाले जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसायटी फाउंडेशन की फंडिंग से हुआ था।

Similar News