आज जब विश्व वैचारिक ध्रुवीकरण और संघर्ष के दौर से गुजर रहा है, तब भारत का सनातन दर्शन एक दीपस्तंभ की तरह मार्गदर्शन करता है। विश्व के हर कोने में आज अशांति का वातावरण बना हुआ है। कई देश आपस में युद्ध में उलझे हैं। कथित शक्तिशाली देश दूसरों के संसाधनों पर कब्जा करने की मंशा रखते हैं। अमेरिका और वेनेजुएला का प्रकरण इसके उदाहरण हैं। दुर्भाग्य से पूरा विश्व, संयुक्त राष्ट्र संघ और तमाम बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठन इस पर चुप हैं।
ईरान में जनता 1979 की तथाकथित इस्लामिक क्रांति के विरुद्ध आवाज़ उठा रही है और अपनी मूल पहचान पर गर्व कर रही है। सोशल मीडिया पर ईरानी महिलाएं अपनी पहचान को खुले रूप में स्वीकार कर रही हैं। उधर, बांग्लादेश में वहां का अल्पसंख्यक हिंदू समूह राजनैतिक संरक्षण प्राप्त चरमपंथियों का शिकार बन रहा है। तथाकथित अमन और शांति के पैरोकार इस वक्त खामोश हैं।
पश्चिम की कथित लिबरल नीतियों ने संयुक्त अरब अमीरात के शासकों को भी भयभीत कर रखा है। वे अपने छात्रों को ब्रिटेन और यूरोप के विश्वविद्यालयों में अध्ययन के लिए भेजने से डर रहे हैं कि कहीं उनके छात्र यूरोप में लिबरल नीतियों के कारण जिहादी मानसिकता के शिकार न हो जाएं।
आज की वैश्विक परिस्थितियां यह प्रश्न खड़ा करती हैं कि क्या केवल राजनीतिक क्रांतियां, सत्ता परिवर्तन या वैचारिक कट्टरता मानव समाज को स्थायी शांति और समानता की ओर ले जा सकती हैं। ईरान में इस्लामी शासन के विरुद्ध उठती आवाज़ें, महिलाओं के समान अधिकारों की मांग, धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध असंतोष और सामाजिक स्वतंत्रता की आकांक्षा इस बात का प्रमाण हैं कि जब कोई विचारधारा मानव स्वभाव, विविधता और गरिमा के विपरीत जाती है, तो अंततः उसके विरुद्ध प्रतिक्रिया जन्म लेती है।
ईरान की वर्तमान स्थिति केवल राजनीतिक असंतोष का परिणाम नहीं है, बल्कि यह एक गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक बेचैनी को भी दर्शाती है। कट्टर धार्मिक व्याख्याओं के कारण व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अंकुश, महिलाओं के अधिकारों पर प्रतिबंध, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन और आधुनिक जीवन मूल्यों के साथ टकराव, इन सबने समाज में असंतोष को जन्म दिया है। महिलाएं केवल वस्त्रों या बाहरी आचरण के प्रश्न पर नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व, सम्मान और समान अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं। यह संघर्ष इस बात को रेखांकित करता है कि कोई भी व्यवस्था, जो समानता और मानवीय गरिमा को नकारती है, लंबे समय तक स्थिर नहीं रह सकती।
भारत का सनातन दर्शन मूलतः "अहं ब्रह्मास्मि" और "तत्त्वमसि" जैसे सूत्रों के माध्यम से प्रत्येक जीव में एक ही चेतना को देखता है। यहां स्त्री और पुरुष के बीच मौलिक स्तर पर कोई भेद नहीं, बल्कि दोनों को सृजन के पूरक रूप में स्वीकार किया गया है। वैदिक काल से लेकर उपनिषदों तक गागों, मैत्रेयी, लोपामुद्रा जैसी विदुषी स्त्रियां इस बात का प्रमाण हैं कि ज्ञान, संवाद और आध्यात्मिक विमर्श में स्त्रियों की भूमिका केंद्रीय रही है।
इसके विपरीत, जब किसी धर्म या विचारधारा की संकीर्ण व्याख्या स्त्री को द्वितीय श्रेणी में धकेल देती है, तो वह समाज को भीतर से कमजोर करती है। ईरान में चल रहा संघर्ष इसी असंतुलन का परिणाम है। कट्टरता मानव का मूल स्वभाव नहीं है। मानव का मूल स्वभाव सबका साथ, सबका विश्वास और सबका कल्याण है।
आज पूरा यूरोप आतंकवाद से पीड़ित है। धार्मिक उग्रवाद और वैचारिक कट्टरता वहां की सामाजिक संरचना, सुरक्षा और सांस्कृतिक संतुलन को चुनौती दे रहे हैं। दूसरी ओर अमेरिका की विदेश नीति पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि वह दूसरे देशों पर प्रभुत्व या नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास करता है, जिससे वैश्विक असंतुलन और संघर्ष बढ़ते हैं।
इसके विपरीत, भारत का इतिहास देखें तो भारत ने कभी भी विस्तारवादी आक्रमण की नीति नहीं अपनाई। भारत की शक्ति तलवार से नहीं, बल्कि विचार से फैली है। योग, आयुर्वेद, बौद्ध दर्शन, उपनिषद, भगवद्गीता और संत परंपरा के माध्यम से भारत का दर्शन पूरे विश्व में फैला है।
इतिहास गवाह है कि भारत ने कभी भी किसी अन्य देश पर आक्रमण कर उसे अपने अधीन करने का प्रयास नहीं किया। भारत पर आक्रमण हुए यूनानी, शक, हूण, तुर्क, मुगल और औपनिवेशिक शक्तियां आईं। सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद भी सनातन संस्कृति जीवित है, क्योंकि यह केवल ईंट-पत्थर की संरचना नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। इसे तलवार से नष्ट नहीं किया जा सकता। यह सहनशीलता, पुनर्निर्माण और आत्मिक शक्ति का उदाहरण है।
भारत का मूल दर्शन "वसुधैव कुटुम्बकम" में निहित है। सारी पृथ्वी एक परिवार है। यह केवल काव्यात्मक विचार नहीं, बल्कि व्यवहारिक जीवन-दृष्टि है। इसमें किसी एक धर्म, राष्ट्र या समुदाय की श्रेष्ठता नहीं, बल्कि सभी के अस्तित्व और कल्याण की कामना निहित है।
जब ईरान जैसे देशों में लोग धार्मिक कट्टरता से मुक्ति की चाह रखते हैं, तब भारत का यह दर्शन एक वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत करता है, जहां आस्था और स्वतंत्रता, परंपरा और आधुनिकता, अनुशासन और करुणा के बीच संतुलन हो।
आज विश्व जिन संकटों से गुजर रहा है आतंकवाद, युद्ध, पर्यावरण विनाश, सामाजिक विघटन उनका समाधान केवल सैन्य शक्ति या आर्थिक दबाव से संभव नहीं है। समाधान एक ऐसे दर्शन में है जो मानव को केंद्र में रखे, प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व सिखाए और विविधताओं का सम्मान करे। भारत का दर्शन "सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः" की कामना करता है। यह किसी एक राष्ट्र की प्रार्थना नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए मंगलकामना है।
ईरान के संदर्भ में भारत का दर्शन स्पष्ट करता है कि स्थायी शांति जबरन थोपे गए नियमों से नहीं, बल्कि आंतरिक स्वीकृति और समानता से आती है। धर्म यदि करुणा, न्याय और मानव गरिमा की रक्षा नहीं करता, तो वह अपने मूल उद्देश्य से भटक जाता है। भारत का सनातन मार्ग दिखाता है कि धर्म जीवन को बांधने के लिए नहीं, बल्कि मुक्त करने के लिए होता है।
आज जब विश्व वैचारिक ध्रुवीकरण और संघर्ष के दौर से गुजर रहा है, तब भारत का सनातन दर्शन एक दीपस्तंभ की तरह मार्गदर्शन करता है। ईरान की सामाजिक उथल-पुथल, यूरोप की आतंकवाद से पीड़ा और अमेरिका की प्रभुत्ववादी नीतियों के बीच भारत यह स्मरण कराता है कि शांति का मार्ग हिंसा, कट्टरता या वर्चस्व में नहीं, बल्कि समानता, सहिष्णुता और विश्व बंधुत्व में है।
"वसुधैव कुटुम्बकम" केवल भारत की विरासत नहीं, बल्कि विश्व का भविष्य है। यदि मानवता को वास्तव में शांति और कल्याण की ओर बढ़ना है, तो उसे भारत के इसी सनातन दर्शन की ओर लौटना होगा, जहां सबका अस्तित्व सुरक्षित हो और सबका कल्याण सुनिश्चित हो।