उच्च शिक्षा नीति: यूजीसी के विवाद और भारतीय शिक्षण परंपरा

कैलास चन्द्र

Update: 2026-01-29 05:29 GMT

वादे वादे जायते तत्त्वबोधः बनाम विवादे विवादे बुद्धिनाशः भारत की समग्र अनुभव-परंपरा, ज्ञान-विज्ञान, शास्त्र और शिक्षण पद्धति एक अत्यंत मौलिक सत्य को स्वीकार करती है कि ज्ञान संवाद से जन्म लेता है, टकराव से नहीं। तर्क से प्रकट होता है, थोपने से नहीं। इसी कारण उपनिषद-परंपरागत शिक्षा में एक कालजयी सूत्र बार-बार प्रतिध्वनित होता है “वादे वादे जायते तत्त्वबोधः”।

अर्थात, प्रत्येक स्वस्थ वाद-विवाद से तत्त्वज्ञान, सत्य और गहन समझ का उदय होता है। आज यूजीसी गाइडलाइंस को लेकर जो बहसें, असहमतियाँ, जातिगत प्रतिक्रियाएँ और बौद्धिक घेराबंदी दिखाई दे रही हैं, उनमें भारतीय परंपरा का यह सूत्र एक संतुलनकारी दीपक बन सकता है। वास्तविक समस्या दिशाहीन चर्चा नहीं, बल्कि चर्चाओं का ‘संवाद’ से ‘संघर्ष’ में बदल जाना है।

जब व्यक्ति तर्क छोड़कर व्यक्तिगत आक्षेपों, कटाक्षों और भ्रमों में उतर जाता है, तब बहस का उद्देश्य सत्य की खोज नहीं रह जाता, बल्कि अहंकार की प्रतिस्पर्धा बन जाता है। ऐसी स्थिति में भारतीय ज्ञान-परंपरा हमें एक दूसरा महत्त्वपूर्ण वाक्य स्मरण कराती है “विवादे विवादे बुद्धिनाशः; बुद्धिनाशात् विनश्यति।अर्थात, लगातार विवाद, कुतर्क और आरोप-प्रत्यारोप बुद्धि का नाश कर देते हैं, और बुद्धिनाश अंततः विनाश की ओर ले जाता है।

यूजीसी मार्गदर्शन का विवाद: संवाद से समाधान, संघर्ष से नहीं

यूजीसी की नई नीतियां चाहे वे आरक्षण से जुड़े पहलू हों, ‘कट-ऑफ’ या ‘इक्विटी’ का ढाँचा, या पहचान-आधारित वर्गीकरण इन सभी पर समाज में दो तरह के विवाद उभर रहे हैं। नीतिगत विमर्श: नीति के उद्देश्य और उसके प्रभावों को लेकर वास्तविक बहस आवश्यक है, क्योंकि लोकतंत्र में नीति की समीक्षा एक स्वस्थ परंपरा है। यह “वादे वादे जायते तत्त्वबोधः” की श्रेणी में आता है, जहाँ संवाद से बेहतर समाधान निकल सकता है।विभाजनकारी विवाद: नीति को जातिगत द्वेष, समूह-विरोध या राजनीतिक ‘सभागृह लड़ाई’ का रूप देना “विवादे विवादे” की स्थिति है, जहाँ तर्क के स्थान पर अहंकार और समूहवादी प्रतिक्रियाएँ बहस को विकृत कर देती हैं।यदि इस भटकाव को नहीं रोका गया, तो नीति-विवाद ज्ञान नहीं, बल्कि केवल विभाजन उत्पन्न करेंगे। यही वह बिंदु है, जहाँ हमारे शास्त्रीय सूत्र शालीनता, विवेक और संतुलन की याद दिलाते हैं।

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जब बहस जाति, पक्ष-विपक्ष, पूर्वाग्रह या भ्रमों में उलझने लगे, तब संयमपूर्वक यह कहना आवश्यक हो जाता है कि हमारा लक्ष्य किसी पक्ष की जीत नहीं, बल्कि सही और न्यायसंगत नीति का विकास है।“वादे वादे जायते तत्त्वबोधः” हमें सत्य की खोज के लिए चर्चा करने को प्रेरित करता है। और जब बहस कटुता और आरोपों की ओर बढ़ने लगे, तब यह चेतावनी सामने आती है “विवादे विवादे बुद्धिनाशः; बुद्धिनाशात् विनश्यति।”आइए नीति, तथ्य और तर्क पर वापस लौटें। बिना किसी पर आरोप लगाए, चर्चा को सही पटरी पर लाया जा सकता है। इससे भावनात्मक उफान शांत होता है और बहस ज्ञान-आधारित दिशा में आगे बढ़ती है।

भारतीय समाधान-शैली: संघर्ष नहीं, सहमति की ओर

भारत की सभ्यता ने सदियों से यह सिखाया है कि सत्य थोपने से नहीं, बल्कि शास्त्रार्थ और संवाद से प्रकट होता है। संतुलन को संरक्षित रखने के लिए यही दृष्टि एक सुरक्षात्मक बाँध की तरह कार्य करती है।यदि यूजीसी जैसी नीतियों को समझना है, सुधारना है, या उन पर सहमत-असहमत होना है, तो बहस का स्वरूप वैदिक परंपरा के अनुरूप होना चाहिए

तर्क हो, तकरार नहीं।

प्रमाण हो, परपीड़ा नहीं।

विचार हो, व्यक्तिगत आक्षेप नहीं।

ज्ञान की खोज हो, अहंकार का प्रदर्शन नहीं।

भारत का इतिहास बताता है कि संवाद जितना गहरा होगा, निर्णय उतना ही टिकाऊ होगा। और संघर्ष जितना बढ़ेगा, समाधान उतना ही दूर होता जाएगा।

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