दुनिया के लिए प्रेरक बनता भारत का चुनावी तंत्र

उमेश चतुर्वेदी

Update: 2026-01-23 05:55 GMT

स्वाधीनता के बाद जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था को हमने अपनाया, वह हमारी अपनी नहीं, बल्कि पश्चिम से आयातित मानी जाती है। दिलचस्प यह है कि आज यही व्यवस्था दुनियाभर में शासन की बेहतर प्रणाली के रूप में स्वीकार की जा रही है। इसकी बुनियाद इंग्लैंड में सन् 1215 में हुई मैग्नाकार्टा की संधि में मिलती है। आज का लोकतंत्र इसी संधि से निकले कानूनों और परंपराओं से विकसित हुआ है। जबकि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल में भारतीय दिलों की पारंपरिक लोकतांत्रिक सोच निहित है। दुर्भाग्य से भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली की महत्ता को दुनिया अब तक पूरी तरह स्वीकार करने से हिचकती रही है।

ऐसे माहौल में अंतरराष्ट्रीय लोकतांत्रिक एवं चुनावी सहायता संस्थान की अगुआई भारत को मिलना मामूली बात नहीं है। अंग्रेजी में इस संस्थान को इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेटिक एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस यानी आईडीईए के नाम से जाना जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि भारतीय लोकतंत्र को वैश्विक स्तर पर अहमियत मिल रही है।

वैश्विक लोकतांत्रिक परिदृश्य के लिहाज से भारत को मिली यह अगुआई ऐतिहासिक है। 1995 में 14 देशों द्वारा स्थापित इस संगठन के सदस्य देशों की संख्या अब 37 हो चुकी है। संयुक्त राज्य अमेरिका और जापान स्थायी पर्यवेक्षक के रूप में इस संगठन में शामिल हैं। करीब आठ अरब की विश्व जनसंख्या में से लगभग दो अरब बीस करोड़ पंजीकृत मतदाता इन्हीं सदस्य देशों से आते हैं, जिनमें भारत की हिस्सेदारी 99 करोड़ 10 लाख से अधिक है।

आंकड़ों से स्पष्ट है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। इस दृष्टि से भारत की अध्यक्षता केवल औपचारिक दायित्व नहीं, बल्कि वैचारिक नेतृत्व का अवसर भी है। इस संगठन में सदस्यता केवल देशों के चुनाव आयोगों या चुनाव कराने वाली संस्थाओं को ही मिलती है, इसलिए भारतीय चुनाव आयोग भी इसका सदस्य है। स्वाभाविक है कि इसी नाते अध्यक्षता भी आयोग के पास आई है।

जिस समय घरेलू मोर्चे पर भारतीय चुनाव प्रणाली और उसकी मशीनरी सवालों के घेरे में रहती है, उसी समय चुनाव आयोग को इस प्रतिष्ठित संस्था की अगुआई मिलना सामान्य घटना नहीं है। विपक्षी दलों की ओर से कभी वोट चोरी के आरोप लगाए जाते हैं तो कभी आयोग को नकारा बताया जाता है। ऐसे माहौल में आईडीईए की अध्यक्षता मिलना भारतीय चुनाव प्रणाली की वैश्विक स्वीकृति और प्रतिष्ठा का प्रतीक है।

दुनिया अब तक लोकतंत्र को पश्चिमी मॉडल के चश्मे से ही देखती रही है, जहां लोकतांत्रिक आत्मा से अधिक बाजार-केंद्रित राजनीतिक ढांचे पर जोर रहा है। वहां व्यक्ति की बजाय संस्थाओं की स्वाधीनता और संसदीय परंपराओं को प्रमुख माना गया। लेकिन संचार और सूचना क्रांति तथा आर्थिक बदलावों के चलते आज का मतदाता पहले से कहीं अधिक जागरूक हो चुका है। वह अपनी राय की अहमियत चाहता है। इसी कारण पश्चिमी लोकतांत्रिक मॉडल को लेकर सोच में बदलाव आया है।

यदि भारतीय लोकतंत्र और चुनावी व्यवस्था मजबूती से खड़ी है, तो इसके पीछे इन वैचारिक परिवर्तनों का भी बड़ा योगदान है। एक अरब से अधिक मतदाताओं वाले देश में चुनावी भागीदारी का बढ़ना मामूली बात नहीं है। इसे भारतीय चुनावी तंत्र की लचीली लेकिन मजबूत व्यवस्था की सफलता के रूप में देखा जाना चाहिए।

भारतीय चुनावी प्रबंधन में नवाचार, डिजिटल चुनावी प्रक्रियाओं पर जोर और दिव्यांग तथा दूरस्थ क्षेत्रों के मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने में चुनाव आयोग की भूमिका अहम रही है। चुनावी साक्षरता बढ़ाने के लिए आयोग ने जितने प्रयोग किए हैं, उनका उदाहरण अन्य देशों में कम ही देखने को मिलता है। विपक्षी आरोपों के बावजूद यदि मतदाता भागीदारी बनी हुई है, तो यह माना जा सकता है कि चुनाव आयोग के प्रति भरोसा कम नहीं हुआ है।

इस दृष्टि से देखा जाए तो भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहुंच पुस्तकालयों और विमर्श के मंचों तक सीमित न होकर बूथ और अंतिम व्यक्ति तक पहुंची है। इसी संदर्भ में चुनाव आयोग की अध्यक्षता में 21 से 23 जनवरी के बीच आईडीईए सदस्य देशों के चुनाव प्रमुखों और अधिकारियों की प्रस्तावित बैठक विशेष महत्व रखती है। माना जा रहा है कि दुनिया भर के अधिकारी यह जानने को उत्सुक होंगे कि इतनी बड़ी मतदाता संख्या के बावजूद भारत चुनावी पवित्रता कैसे बनाए रखता है।

चुनावी पवित्रता की जड़ें हमारी पारंपरिक लोकतांत्रिक सोच से जुड़ी हैं। प्राचीन भारत का बज्जि गणतंत्र आधुनिक व्यवस्थाओं की तुलना में कहीं अधिक लोकतांत्रिक और लोकाभिमुख था। दक्षिण भारत में दसवीं सदी के चोल शासकों द्वारा अपनाई गई ग्रामीण शासन व्यवस्था को आज के राजनीतिक विज्ञानी भी एक उत्कृष्ट मॉडल मानते हैं। मैग्नाकार्टा से पहले कर्नाटक में लिंगायत संप्रदाय के संस्थापक संत बसवेश्वर द्वारा स्थापित अनुभव मंडपम् में समाज के सभी वर्ग धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर खुलकर चर्चा करते थे और सहमति तक पहुंचते थे। राजनीतिक शास्त्री इसे आधुनिक संसद का प्रारंभिक स्वरूप मानते हैं।

आज हमारी चुनाव प्रणाली मजबूत है, तो इसके पीछे यह ऐतिहासिक परंपरा भी एक बड़ा कारण है। वैश्विक स्तर पर लोकतांत्रिक देशों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं, जिनके समाधान में भारत का अनुभव प्रेरक हो सकता है। ध्रुवीकरण, दुष्प्रचार, साइबर हस्तक्षेप, चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता की कमी और युवाओं की घटती रुचि लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बन रही है। जनमत को प्रभावित करने में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग इन समस्याओं को और जटिल बना रहा है।

ऐसे में भारत अपने सफल चुनावी अनुभवों के आधार पर अंतरराष्ट्रीय मंच पर लोकतांत्रिक राष्ट्रों के लिए मार्गदर्शक बन सकता है। भारत को मिली यह अगुआई इस बात का भी संकेत है कि हमारे लोकतंत्र की ताकत केवल चुनाव कराने में नहीं, बल्कि हर वोट को दी गई अहमियत में निहित है। विविध भाषाओं, धर्मों और सामाजिक असमानताओं के बावजूद भारतीय चुनाव प्रणाली का शांतिपूर्ण बने रहना इसी विश्वास का परिणाम है।

स्पष्ट है कि विशाल और बहुलवादी समाज भारतीय लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी ताकत है। पश्चिमी देशों और ग्लोबल साउथ की लोकतांत्रिक प्रवृत्तियों की तुलना में भारतीय चुनाव प्रबंधन कहीं अधिक प्रभावशाली और उपलब्धिपूर्ण दिखाई देता है। अमेरिका और यूरोप में जहां मतदाता भागीदारी लगातार घट रही है, वहीं अविश्वास और सामाजिक टकराव जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।

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