भारतीय संत परंपरा में संत शिरोमणि गुरु रविदास जी का नाम केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं है। वे सामाजिक चेतना, समानता और मानव गरिमा के विराट प्रतीक हैं। उनकी वाणी का मूल संदेश यही था कि ईश्वर बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि निर्मल मन में निवास करते हैं। ‘मन ही पूजा, मन ही धूप’ के माध्यम से उन्होंने भक्ति को आंतरिक साधना से जोड़ा। संत रविदास जी एक ऐसे सांस्कृतिक संकल्प का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसने समाज को झुकना नहीं, बल्कि मानवता के सूत्र में जोड़ना सिखाया। जाति-पाति और छुआछूत से जकड़े समाज में उन्होंने प्रेम, समरसता और आध्यात्मिक समानता का दीप जलाया।
15वीं शताब्दी में जन्मे संत रविदास जी ने उस दौर में आवाज उठाई, जब सामाजिक विभाजन गहराई तक बैठ चुका था। उन्होंने अपने पदों और जीवन के उदाहरणों से स्पष्ट किया कि मनुष्य की पहचान जन्म से नहीं, बल्कि कर्म और गुणों से होती है। ‘एकै माटी के सभ भांडे’ के माध्यम से उन्होंने समस्त मानवता की एकता का दर्शन दिया। वहीं ‘जनम जात मत पूछिए, का जात अरु पात। रैदास पूत सब प्रभु के, कोए नहिं जात कुजात’ कहकर जातिगत अहंकार को सामाजिक विघटन का कारण बताया।
उनके लिए भक्ति केवल पूजा-पाठ नहीं थी, बल्कि सेवा, शिक्षा और समाज सुधार भी उतने ही पवित्र कर्म थे। ज्ञान को उन्होंने वह शक्ति माना, जो व्यक्ति को सही और गलत का विवेक देती है और परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करती है।
संत रविदास जी के जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष श्रम की प्रतिष्ठा था। वे पनहीं बनाने का कार्य करते थे और उन्होंने अपने पैतृक पेशे को कभी छोटा नहीं समझा। उन्होंने कहा- ‘श्रम कऊ ईसर जानि’, अर्थात परिश्रम ही ईश्वर का स्वरूप है। उनसे जुड़ी प्रसिद्ध कथा, जिसमें वे गंगा स्नान पर जाने के बजाय अपने वचन का पालन करते हुए पनहीं तैयार करने को प्राथमिकता देते हैं, कर्मनिष्ठा और सत्यनिष्ठा का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करती है।
लोककथाओं के अनुसार, संत रविदास जी के बढ़ते प्रभाव से प्रभावित होकर दिल्ली के शासक सिकंदर लोदी ने उन्हें दरबार में बुलवाया। वहां उनसे धर्म परिवर्तन का दबाव डाला गया, परंतु संत रविदास जी अडिग रहे। उन्होंने कहा- ‘वेद धरम त्यागूं नहीं, जो गल चलै कटार।’ उन्होंने शांत भाव से स्पष्ट किया कि सच्ची भक्ति हृदय की होती है, जिसे डर या लालच से बदला नहीं जा सकता। ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ का उनका संदेश बताता है कि पवित्रता स्थान में नहीं, मन में होती है। युवाओं के लिए उनका यह जीवनदर्शन आज भी प्रेरणास्रोत है- कर्म करते रहो, फल अवश्य मिलेगा।
उनकी कल्पना का आदर्श समाज ‘बेगमपुरा’ दुःख, भेदभाव और अभाव से मुक्त एक समतामूलक व्यवस्था का स्वप्न था। यह केवल आध्यात्मिक कल्पना नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की परिकल्पना थी, जहां सबको अन्न, सम्मान और समान अवसर मिले। आधुनिक समय में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की ‘सबका साथ, सबका विकास’ की अवधारणा को इसी दृष्टि से जोड़ा जाता है, जहां समाज के अंतिम व्यक्ति तक सुविधाएं और अवसर पहुंचाने की बात होती है। श्रमिकों, कारीगरों और वंचित वर्गों के सम्मान तथा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने वाली नीतियों को संत रविदास जी के श्रम-गौरव और अंत्योदय की भावना से प्रेरित माना जाता है।
कबीरदास जी ने संतों में संत रविदास जी को श्रेष्ठ बताया है। संत रविदास जी अत्यंत विनम्र, निष्कपट और सच्चे भक्ति मार्ग के साधक थे। वे जाति-भेद के विरुद्ध और प्रेम, समानता व मानवता के पक्षधर थे। कबीर और रविदास जी दोनों निर्गुण भक्ति धारा के संत थे, इसलिए उनके विचारों में गहरी समानता मानी जाती है।
‘ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिलै सबन को अन्न। छोट-बड़ो सब सम बसै, रैदास रहै प्रसन्न।’
यह पद उनके सामाजिक दर्शन को स्पष्ट करता है। वे केवल आध्यात्मिक मुक्ति की बात नहीं करते, बल्कि धरती पर ही एक न्यायपूर्ण व्यवस्था का स्वप्न देखते हैं। उनके लिए आदर्श ‘राज’ वह है, जहां किसी को भूख, अभाव या अपमान का सामना न करना पड़े। यहां ‘अन्न’ जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं का प्रतीक है, जबकि ‘छोट-बड़ो सब सम’ सामाजिक समानता और जातिगत भेदभाव के अंत का संदेश देता है। ‘रैदास रहै प्रसन्न’ यह दर्शाता है कि संत की प्रसन्नता व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक कल्याण से जुड़ी है।
भगवान और भक्त के संबंध को संत रविदास जी ने अत्यंत सुंदर प्रतीक के माध्यम से व्यक्त किया है-
‘प्रभु जी तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बौ दिन राती।’
यहां दीपक ईश्वर का प्रतीक है और बाती भक्त का। दीपक बिना बाती के नहीं जलता और बाती बिना दीपक के अर्थहीन है। अर्थात भक्त और प्रभु का संबंध अभिन्न है। जिस प्रकार बाती स्वयं जलकर प्रकाश फैलाती है, उसी प्रकार सच्चा भक्त अहंकार त्यागकर ईश्वर में लीन हो जाता है और उसके जीवन से प्रेम, दया और ज्ञान का प्रकाश फैलता है। ‘दिन राती’ शब्द निरंतर भक्ति और अटूट स्मरण का संकेत देता है।
संत रविदास जी आध्यात्मिक दृढ़ता और सांस्कृतिक आत्मसम्मान के भी प्रतीक रहे। कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने सत्य और अपने धर्ममार्ग से समझौता नहीं किया। मीरा बाई जैसी भक्त का उन्हें गुरु मानना यह दर्शाता है कि भक्ति और ज्ञान किसी वर्ग या जन्म की सीमा में बंधे नहीं हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति, सच्चा धर्म और सच्ची राष्ट्रसेवा कर्म, सेवा, समानता और मानव प्रेम में प्रकट होती है।
संत रविदास जयंती केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि एक संकल्प है- एक ऐसे समरस, शिक्षित और आत्मनिर्भर समाज के निर्माण का, जहां हर मन पवित्र हो और हर व्यक्ति सम्मानपूर्वक जीवन जी सके।