आखिर ट्रंप को झुकना पड़ा

Update: 2026-02-04 03:53 GMT

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत के खिलाफ टैरिफ बढ़ाने की धमकी पर अब विराम लग गया है। जो ट्रंप कभी 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की बात कर रहे थे, वही अब 25 प्रतिशत से भी नीचे आकर 18 प्रतिशत पर राजी हो गए हैं। आखिर ट्रंप क्यों झुके, यह सवाल अब बेहद चर्चा में है।

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से टेलीफोन पर बातचीत के बाद दोनों देशों के बीच लंबे समय से चली आ रही कड़वाहट अब दूर होती नजर आ रही है। इसी के साथ कई महीनों से अटका भारत-अमेरिका व्यापार समझौता भी आखिरकार सहमति की ओर बढ़ गया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक यह घोषणा कर सबको चौंका दिया। उन्होंने भारतीय सामानों पर लगने वाला टैरिफ 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत किए जाने की बात कही। यह फैसला इसलिए भी चौंकाने वाला रहा क्योंकि इससे पहले तक कई चरणों में हुई बातचीत बेनतीजा रही थी।

इस दौरान अमेरिका लगातार भारत पर दबाव बना रहा था कि वह उच्च टैरिफ को स्वीकार करे, लेकिन भारत की ओर से सकारात्मक के बजाय नकारात्मक जवाब मिलने और रूस से बढ़ती नजदीकियां देखने के बाद ट्रंप को झुकना पड़ा।

अमेरिका के इस रवैये के पीछे कई वजहें रहीं, जिनके चलते महीनों तक व्यापार समझौता अटका रहा। ट्रंप प्रशासन ने दबाव बनाने के लिए 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का फार्मूला अपनाया, लेकिन भारत ने उसकी मनमानी शर्तें नहीं मानीं। नतीजतन, यह रणनीति भी काम नहीं आई।

ट्रंप प्रशासन की शर्त साफ थी कि अगर भारत को व्यापक व्यापार समझौता करना है तो उसे रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद करना होगा। लेकिन भारत ने ऐसा नहीं किया, क्योंकि रूस भारत का सबसे पुराना और भरोसेमंद मित्र देश रहा है।

इसका परिणाम यह हुआ कि अमेरिका को भारत के साथ व्यापारिक संबंध बनाए रखने के लिए टैरिफ कम करने पर मजबूर होना पड़ा। हालांकि ट्रंप का दावा है कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद करने पर राजी हो गया है, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टैरिफ घटाने के फैसले का स्वागत तो किया, लेकिन रूस से तेल खरीदने को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की।

ट्रंप के इस फैसले के पीछे भारत और यूरोपीय यूनियन (ईयू) के बीच हुए बड़े व्यापारिक समझौते को भी एक अहम कारण माना जा रहा है। भारत और ईयू के बीच हाल ही में फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) पर बातचीत पूरी हुई है, जिसे दोनों पक्षों ने अब तक की सबसे बड़ी ट्रेड डील बताया है।

इस समझौते से भारत की ताकत और सौदेबाजी की स्थिति मजबूत हुई, जिससे उसने अमेरिकी शर्तों को नकार दिया। ईयू से बढ़ती बातचीत के कारण अमेरिका को यह डर सताने लगा कि कहीं वह पीछे न छूट जाए।

प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ दिन पहले ही भारत-ईयू डील को विकास, निवेश और रणनीतिक साझेदारी के लिए बड़ा कदम बताया था।वैसे अमेरिका के लिए भारत पर प्रस्तावित 18 प्रतिशत टैरिफ सिर्फ व्यापार का नहीं, बल्कि राजनीति और ऊर्जा नीति का भी मामला है। व्हाइट हाउस किसी भी हाल में चाहता है कि रूस को तेल से होने वाली कमाई कम हो, ताकि यूक्रेन युद्ध को लेकर दबाव बढ़ाया जा सके।

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने हाल ही में कहा था कि भारत द्वारा रूस से तेल आयात लगभग खत्म हो चुका है और इससे टैरिफ हटाने का रास्ता साफ हुआ है। ट्रंप ने यह भी कहा है कि भारत अमेरिका से अधिक तेल खरीदेगा और भविष्य में वेनेजुएला से भी तेल ले सकता है।

इसका उद्देश्य यह है कि अगर रूस या ईरान को लेकर हालात ोबिगड़ते हैं तो तेल की कीमतों में अचानक उछाल न आए। ईरान को लेकर बढ़ता तनाव अमेरिका के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि मध्य पूर्व में किसी भी टकराव का सीधा असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। ऐसे में भारत से समझौता करना अमेरिका की मजबूरी ही माना जा रहा है।

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