श्रद्धांजलि शरद मेहरोत्रा : एक तपोनिष्ठ प्रचारक
श्रद्धांजलि शरद मेहरोत्रा : एक तपोनिष्ठ प्रचारक
सुबह अभी पूरी तरह जागी नहीं थी। नगर की गलियों में ठिठकी हुई शीतलता थी और शाखा स्थल पर बिछत्री दूब पर ओस के मोती सूर्य की प्रतीक्षा कर रहे थे। उसी धूसर आलोक में कहीं से एक सधी हुई, तेज परंतु शांत चाल उभरती थीन कोई हड़बड़ी, न कोई आडंबर। सफेद धोती, सादे वस्त्र, मुख पर सहज मुस्कान और आँखों में अपार आत्मविश्वास। यह शरद मेहरोत्रा थे। वे कभी अपने आगमन की सूचना नहीं देते थे, पर जहाँ भी पहुँचते, वहाँ व्यवस्था स्वयं आकार ले लेती थी। जैसे इत्र की शीशी खोले बिना ही उसकी सुगंध फैल जाती है उपस्थिति से पहले ही प्रभाव।
कन्नौज, इत्र और सुगंधों का नगर उनकी जन्मभूमि थी। संयोग नहीं, बल्कि संस्कार था कि कन्नौज की गलियों में पलने वाला यह व्यक्तित्य जीवन भर स्वयं इत्र की भाँति महकता रहा और अपने संपर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सुवासित करता गया। उनका जीवन किसी तीव्र सुगंध की तरह नहीं था जो क्षणिक प्रभाव छोड़ दे, बल्कि उस गहरे, टिकाऊ इत्र-सा था जो समय के साथ और गाड़ा होता जाता है।
शरद जी के व्यक्तित्व में अनुशासन और करुणा का अद्भुत संतुलन था। वे कम बोलते थे, पर जब बोलते, तो शब्द सीधे हृदय में उत्तरते। उनकी चुप्पी भी संवाद करती थी। सामने वाला स्वयं को सुना हुआ, समझा हुआ और स्वीकार किया हुआ अनुभव करता। प्रचारक जीवन उनके लिए कोई भूमिका नहीं, कोई पद नहीं, बल्कि स्वीकार किया हुआ संकल्प था जीवन पर्यंत निभाया गया व्रत। मात्र 22 वर्ष की आयु में, जब जीवन की संभावनाएँ, सुख-सुविधाएँ और यश के द्वार खुलते हैं, उन्होंने उन सबको सादर प्रणाम कर मातृभूमि की सेवा का मार्ग चुन लिया। यह त्याग आकस्मिक नहीं था, यह संस्कारों की सहज परिणति थी।
पूज्य पिता के संघचालक होने और घर में संघ के वरिष्ठ अधिकारियों के निरंतर संपर्क ने उनके मन में संघ-संस्कारों की जड़ें बहुत पहले ही रोप दी थीं। इसलिए जब वे प्रचारक बने, तो पूरे मनोयोग और संपूर्ण सामर्थय के साथ कार्य में प्रवृत्त हो गए। न भोजन-वस्त्र की चिंता, न विश्राम की, न ही स्वास्थ्य की। आगरा, मथुरा और अलीगढ़ उनके प्रारंभिक कार्यक्षेत्र रहे। वहाँ उन्होंने पहले कार्यकर्ता गढ़े, फिर संगठन खड़ा किया। उनका विश्वास था 'शाखाएँ संख्या से नहीं, संस्कार से जीवित रहती हैं।' वे नए स्वयंसेवकों के नाम ही नहीं, उनके घर की परिस्थितियों, पढ़ाई, चिंताएँ और सपने तक याद रखते थे। डौटना भी हो तो पहले कंधे पर हाथ रखते कठोरता से पहले आत्मीयता।
वे कहा करते थे, 'संघ का काम भाषण से नहीं, व्यवाहार से आगे बढ़ता है।' उनका व्यवहार ही उनका प्रवचन था। पैदल चलना, समय की कठोर पाबंदी, सादगी और स्थानुशासन ये सब उनके व्यक्तित्व के स्थायी भाव थे। बड़े से बड़े दायित्व पर पहुँचकर भी वे अंतिम पंक्ति में बैठना पसंद करते। उनका मानना था कि नेतृत्व ऊँचाई से नहीं, जमीन से पैदा होता है।
उनकी संगठन क्षमता और नेतृत्व कुशलता को पहचानकर वरिष्ठ अधिकारियों ने सन् 1981 में, अपेक्षाकृत अल्पायु में ही, उन्हें मध्यभारत प्रांत में सह प्रांत प्रचारक का दायित्व सौंपा। नया क्षेत्र, नए व्यक्ति परंतु उनकी योजकता, कल्पकता और धैर्यपूर्ण नेतृत्व से प्रांत में कार्य शीघ्र ही फलने-फूलने लगा। जीवन पर्यंत वे वहीं प्रांत प्रचारक रहे। एक हजार शाखाओं का स्वप्न केवल लक्ष्य नहीं साधना बन गया। अनेक जिलों में सौ शाखाओं का लक्ष्य साकार हुआ। पर उनके लिए उपलब्धि का मापदंड केवल आँकड़े नहीं थे; उनके लिए सबसे बड़ी सफलता थी कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास, समर्पण और संस्कार।
अपने लिए अत्यंत कठोर और कार्यकर्ताओं के लिए उतने ही सरल, सहन और आत्मीय शरद जी ने शिक्षा, संस्कार और सेवा के विविध क्षेत्रों में चल रहे कार्यों को अदृश्य रहकर दिशा दी। वे स्वयं पीछे रहते, पर कार्य को कीर्तिमान तक पहुँचाते। किसी कार्यकर्ता स्वयं को कभी अकेला नहीं पाया। सफलता में उनकी पीठ थपथपाती हुई हथेली होती और असफलता में उनका आश्वस्त करता हुआ मौन। निष्क्रिय कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना और नए कार्यकर्ताओं का निर्माण करना यह उनको विशेष साधना थी।
विश्व हिंदू परिषद की अखिल भारतीय बैठकें हों, संस्कार भारती के सम्मेलन, विद्या भारती की साधारण सभाएँ और प्रधानाचार्य सम्मेलन, संघ के कार्यकारी मंडल के मिलन हो या भाजपा विधायकों के वर्ग, हर जगह उनकी व्यवस्था, अनुशासन और नेतृत्व की सुगंध फैलती थी। शारदा विहार परिसर में मात्र दो माह में भवन निर्माण कर पं. रामनारायण शास्त्री आचार्य प्रशिक्षण संस्थान का शुभारंभ और बैरसिया में 'पंचवटी' की कल्पना को मूर्त रूप देना, ये सब उनकी दूरदृष्टि और कार्यकुशलता के उदाहरण हैं।
कैंसर जैसे असाध्य रोग की असह्य पीड़ा में भी वे स्थितप्रज्ञ रहे। अपने शरीर की वेदना उन्हें विचलित नहीं करती थी, पर किसी सामान्य कार्यकर्ता या उसके परिवार की पीड़ा उन्हें भीतर तक व्यथित कर देती थी। ऐसे असंख्य परिवार हैं जिन्होंने संकट की घड़ी में शरद जी को अपने साथ खड़ा पाया। व्यर्थ का बड़प्पन उन्हें छू तक नहीं गया। उनकी रुचि अत्यंत परिष्कृत थी कार्यालय की सज्जा हो या आयोजन की व्यवस्था, वे सब कुछ उत्कृष्ट देखना चाहते थे। उनके लिए सौंदर्य भी अनुशासन का ही एक रूप था।
उनका अंतिम स्वप्न था 'भाऊराव देवरस सेवा न्यास'। इसके माध्यम से वे वनवासी बंधुओं के पिछड़ेपन को दूर कर उन्हें राष्ट्रजीवन की मुख्यधारा से जोड़ना चाहते थे। चिकित्साधीन रहते हुए भी इस कार्य की चिंता उन्हें घेरे रहती थी। कई कार्यकर्ताओं को बुलाकर उन्होंने मार्गदर्शन दिया। दुर्भाग्यवश, सेवा कार्य के प्रारंभ से ठीक पहले ही वे चुपचाप चले गए।
30 जनवरी 1993 शहीद दिवस। उसी दिन ब्रह्म मुहूर्त की बेला में, अपने रक्त की बूंद-बूंद सुखाकर, काया को तिल-तिल गलाकर, शरद जी मातृभूमि के चरणों में समर्पित हो गए। जैसे जीवन रूपी पुष्प पूर्ण सुगंधित होकर स्वयं ही अर्पित हो गया हो। प.पू. श्री गुरुजी के शब्द - 'जीवन रूपी पुष्म जब पूर्ण सुगधित हो, तभी उसे राष्ट्रदेव के चरणों में समर्पित करो' उनके जीवन में साकार हो उठे।
आज भी, जब किसी नगर में कोई कार्यकर्ता बिना अपेक्षा काम करता है, बिना नाम की चिंता किए आगे बढ़ता है, तो लगता है शरद मेहरोत्रा अभी भी कहीं न कहीं शाखा की उस ओस भरी घास पर चल रहे हैं। कन्नौज की सुगंध उनके साथ थी, पर उससे कहीं अधिक उनकी जीवन-साधना की सुगंध आज भी संगठन, समाज और राष्ट्र के वायुमंडन में व्याप्त है। यह जीवन-दीप भले ही अपना सम्पूर्ण प्रकाश बिखेरकर बुझ गया हो, पर उसने हमारे लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया है शुभ, सुंदर और वरेण्य।
शरद जी द्वारा विभिन्न अवसरों पर दिए गए बौद्धिकों का सार-संक्षेप
जन्म- 20 अक्टूबर 1942 देवलोकगमन- 30 जनवरी 1993
आज जिस अणु का निर्माण हो रहा है उसका विस्फोट कल सबको चमत्कृत करेगा
शरद मेहरोत्रा नितने कुशल संगठक थे उतने ही प्रभावी वक्त भी थे। उन्होंने अनेक अवसरों पर भाषण दिए। हम यहाँ उनके कुछ बौद्धिकों का सार दे रहे हैं जो उनके व्यक्तित्व और संगठन के प्रति उनके समर्पण का आइना है।
रतलाम में आचार्य प्रशिक्षण वर्ग के समापन पर आचार्यों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार का स्मरण करते हुए कहा कि डॉ. हेडगेवारजी ने एक यात्रा प्रारंभ की थी। उस यात्रा में जिन सिद्धांतों को लिया था वे विशिष्ट थे। उनकी संकल्पशवित असाधारण थी। डॉ. साहब जो विचार रखते वे स्वयं जीवन में पहले उतारते थे। उनकी पद्धति में सहजता थी, भारीपन नहीं था। उनके अनुयायियों ने शिशु मंदिरों की कल्पना तैयार की।
सन् 1925 में उन्होंने छोटे-छोटे बच्चों को लेकर जो कार्य प्रारंभ किया था उसी संघ की शाखा से बड़े-बड़े कार्यकर्ता तैयार किए। उन्होंने बेमतलब की बातों से मतलब के लोग निर्माण किए। ध्येय की पूजा करते-करते वे स्वयं ध्येय बन गए। उनके जाने के बाद अंतिम राख को देखकर सैकड़ों लोगों ने तय किया कि हम भी हेडगेवारजी जैसा कार्य करेंगे।
उन्होंने कहा था कि विद्याभारती की निर्मिति उन्नतों के कार्य की एक बूँद है जो देश का सबसे बड़ा शिक्षा संगठन है। उसी के माध्यम से ग्राम भारती ने ग्रामीण व वनवासी क्षेत्रों में कार्य प्रारंभ किया हुआ है। आचार्यों में संतोष होना चाहिए, पैसे से व्यक्ति महान नहीं बनता। वह महान बनता है अपने विचारों से। हम समाज के सेवक हैं, हममें हीनता नहीं होना चाहिए। सबसे कठिन सेवाभाव है, सेवक जब निर्मल अन्तःकरण से सेव्य के पास जाता है, तो सेव्य उसे अपनाता है और सेव्य व सेवा एक हो जाते हैं। अपनी बात समाप्त करते हुए शरद जी ने कहा कि जिस प्रकार छोटे-छोटे अणु मिलकर एक बम बनता है और जब वह फटता है तो सभी को चमत्कृत कर देता है उसी प्रकार छोटे-छोटे शिशुओं का एक बम बनेगा, जो दस वर्ष बाद फटेगा। उससे सब लोग चमत्कृत होंगे। उस समय हमें संतोष मिलेगा। उस संतोष के आगे सब धर्म बेकार है और संतोष के बिना हम सत् चित् आनंद का लाभ नहीं उठा सकते। (16 जून 1993 रतलाम
समाज की विषमता के लिये हम भी जिम्मेदार
में समाज में संवेदनशीलता का निमार्ण करना है, जिससे समग्र समाज का विकास हो सकें। हमे ऐसे समाज का निर्माण करना है जिससे कोई पीड़ित शोषित, गरीब, ऊँच-नीच न रहे। शोषित, पौड़ितों के विकास के लिए हम दान दें, सहयोग दें, यह स्थिति हमें बदलना होगी। आदर्श स्थिति तो यह होगी कि समाज में कोई गरीब व पीड़ित न हो। समाज की विषमता के लिए हम भी जिम्मेदार है। हम अपना सुख-सुविधा का तो ध्यान रखते हैं, लेकिन पीड़ित बंधुओं के दुःख को कम करने में सहयोग नहीं देते। यह समाज मेरा है यदि कोई गरीब, अशिक्षित रहता है तो उसको अपने पैरों पर खड़ा करने की जिम्मेवारी हम सबकी है। गरीब, पिछड़े एवं शोषित बंधुओं के लिए समाज में संवेदनशीलता पैदा करनी होगी, जिससे समग्र समाज का विकास हो सके। समाज को गौरवपूर्ण स्थान दिलाने के लिए हम सबको प्रयास करना होंगे। ईसाई मिशनरियाँ सेवा तो करती है, लेकिन उससे समाज में भेदभाव की स्थिति पैदा होती है। वे बलात् धर्म परिवर्तन करवाते हैं। हिन्दू सोच के अनुसार सभी में ईश्वर है, इसलिए समाज की सेवा करना ईश्वर की सेवा करने के समान है। मैं हिन्दू हूँ अपने समाज की सेवा करना मेरा पुनीत कर्तव्य है, इसी भाव से हमें गरीब, शोषित, पीड़ित बंधुओं की सेवा करना है। जब सारा समाज शिक्षित होगा, तब कोई न तो गरीथ होगा न शोषित। तब संपूर्ण समाज का विकास होगा। सभी को गौरव का समाज प्राप्त होगा। (सेवा भारती शिशु वाटिका इंदौर उद्घाटन समारोह)
डॉ. हेडगेवार देश के लिए जीने वाला समाज बनाना चाहते थे
डॉ. रूप से कमजोर परिवार से थे, किंतु जीवन में आई भीषण कठिनाइयों का सामना करते हुए वे एक असाधारण व्यक्तित्य के रूप में उभरे। वे जन्मजात देशभक्त थे और विद्यार्थी जीवन से ही भारत को स्वतंत्र देखने की तीव्र आकांक्षा रखते थे। डॉ. हेडगेवार का मानना था कि केवल अंग्रेजों के चले जाने से देश की समस्याएँ स्वतः समाप्त नहीं हो जाएँगी। वे कांग्रेस के इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं थे। उनका विचार था कि जब तक समाज सशक्त, संगठित और राष्ट्रनिष्ठ नहीं बनेगा, तब तक सच्ची स्वतंत्रता और राष्ट्र की उन्नति संभव नहीं है। उनका स्पष्ट दृष्टिकोण था कि हिंदुस्तान के मूल निवासी हिंदू हैं. और हिंदू समाज का उत्थान ही देश का उत्थान है। यदि हिंदू समाज कमजोर होगा तो देश भी कमजोर होगा, और यदि हिंदू समाज सशक्त होगा तो राष्ट्र स्वतः स्फाक्त बनेगा। इसी विचारधारा को आधार बनाकर उन्होंने राष्ट्र निर्माण का कार्य आरंभ किया। डॉ. हेडगेवार देश के लिए जीने वाले व्यक्तियों की एक निरंतर श्रृंखला बनाना चाहते थे। इसी उद्देश्य से उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। संघ के माध्यम से उन्होंने समाज को संगठित करने की एक सहज, सरल और प्रभावी कार्यपद्धति दी, जिसे तंत्र-मंत्र से पो एक स्वाभाविक सामाजिक प्रक्रिया कहा जा सकता है। हिंदू समाज की संगठन शक्ति का जीवंत तदाहरण संपूर्ण विश्व ने 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या में हुई पहली कारसेवा के दौरान देखा। यह घटना समाज की एकजुटता और आत्मबल का प्रतीक बनी। साथ ही, विश्व में साम्यवाद के सिद्धांतों का पतन यह दर्शाता है कि केवल विचारधाराएँ नहीं, बल्कि संगठित और मूल्यनिष्ठ समाज ही टिकाऊ होता है। डॉ. हेडगेवार का संपूर्ण जीवन राष्ट्रभक्ति, संगठन और समाज निर्माण को समर्पित रहा।
(मुरैना में संघ शिक्षा वर्ग)
हिन्दू राष्ट्र की विजय पताका सर्वत्र फहराएगी
हि न्दू राष्ट्र की विजय पताका सर्वत्र फहराएगी। हमारा देश हिन्दू राष्ट्र है तथा यह पुनीत भाव संघ की शाखाओं के माध्यम से देश के कोने-कोने में फैला हुआ है। इस देश का मालिकाना हक हिन्दुओं का है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संपूर्ण देश में 20 हजार शाखाओं के माध्यम से हिन्दू चिंतन के अनुकूल संस्कार देने का काम गत कई वर्षों से कर रहा है, उसका परिणाम हमें देश में ही नहीं वरन् विश्व के अन्य देशों में भी देखने को मिल रहा है। जो अंग्रेज अपने देश में कई वर्षों तक राज्य करते रहे हैं, उनके गृह देश इंग्लैंड में विश्व हिन्दू परिषद के तत्वावधान में 24 देशों के 1 लाख प्रतिनिधि एकत्रित हुए और हिन्दू परिषद के तत्वावधान में 24 देशों के 1 लाख प्रतिनिधि एकत्रित हुए और हिन्दुत्व के आधार पर विश्व कल्याण की बात कहीं। कांग्रेस ने गत कई वर्षों से जिस खिचड़ी राष्ट्र का प्रचार-प्रसार किया है, इसमें हिन्दू-सिक्ख एवं जैन जैसे खेमों में राष्ट्र को बाँटने का दुःखदायी प्रयास भी शामिल हैं। इस प्रयास को असफल करने और राष्ट्र में एकता स्थापित करने के लिए संघ ने बीड़ा उठाया है।
(शिवपुरी शीत शिविर 1992)
संस्मरण
असीरगढ़ की तराई में काल का हमला
शरद जी का बुरहानपुर प्रवास था। इस अवसर को मैंने भी हाथ से जाने नहीं दिया। जीप में शरदजी आगे बैठे थे। पीछे एक और विभाग प्रचारक अण्णाजी मुकादम, जिला प्रचारक परमानन्दजी तथा तहसील विस्तारक जगनाथ माने बैठे हुए थे। दूसरी ओर में और अन्य बंधु सवार थे।
असीर दुर्ग के सामने से जीप निकल ही रही थी कि अचानक एक ट्रक ने हमारी जीप को टक्कर मारी। क्षणभर के लिए ऐसा लगा मानो हमारी हड्डी पसलियों का भी पता नहीं चलेगा। ट्रक ने जीप का पर्दा फाड़ दिया था और शेड भी एक ओर से टूट गया था। किंतु ईश्वर की कृपा से सभी बाल-बाल बच गए। इस भयावह स्थिति में भी शरदजी स्थितप्रज्ञ की भाँति शांत बैठे रहे। उन्होंने इस दुर्घटना को भी हास्य-विनोद में ही लिया। जीप चालक विनोदप्रिय भाई कमलचंद राठौर प्रारंभ में आशकित थे कि आज शरदजी बहुत डॉटिंग, किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। काल बनकर आए उस ट्रक की टक्कर को मा. शरदनी ने हँसते-हँसते टाल दिया।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो वही दृश्य फिर स्मृति में उभर आता है। मानो शरदजी ने 51 वर्ष की आयु में काल बनकर आए कैंसर को भी उसी सहजता और प्रसन्नता से स्वीकार कर लिया। उन्होंने अपनी पीड़ा कभी किसी से बयान नहीं की। बीमारी के कठिन क्षणों में भी वे निरंतर मार्गदर्शन करते रहे, उत्साह बाँटते रहे और कार्यकर्ताओं को कार्यरत रहने की प्रेरणा देते रहे। खंडवा में होम्योपैथिक के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. बसंतीलालजी झंवर उनका उपचार कर रहे थे। उस समय भी शरदजी केवल अपने लिए ही नहीं, बल्कि अपने साथियों के लिए भी स्वयं भोजन तैयार करते थे। एक दिन एक मित्र ने कहा- 'यह खंडवावासी स्वयंसेवकों के लिए बड़े शर्म की बात है कि प्रांत प्रचारक स्वयं भोजन बनाएँ। क्या हम लोग परहेजी भोजन नहीं बना सकते? 'जब शरदजी से आग्रह किया गया कि वे भोजन न बनाएं और हम लोग घरों से परहेजी भोजन ले आएँ, तो उन्होंने बड़े ही विनोदी भाव से कहा- 'भाई, दिन के कुछ घंटे तो भोजन बनाते-बनाते ही कट जाते हैं। उनका यह सहज, सरल और कर्मयोगी जीवन आज भी हमें प्रेरणा देता है।
वीरसिंह हिन्दौन, खंडवा
जनरेटर तैयार है, अब केवल लाइनें बिछाना बाकी हैं
स न् 1981, मा. शरदजी पहली बार धार आये आये तब उनके पास सह प्रांत प्रचारक का दायित्व था। उनकी पहली बैठक संघ कार्यालय में हुई और शायद उस बैठक में हम 6-7 स्वयंसेवक ही रहे होंगे। प्रथम दृष्टि में ही उनका बड़ा आकर्षक व्यक्तित्व लगा। भव्य डील डौल, सिर पर घने बाल, धोती और लंबा कुतों, चेहरे पर छाप छोड़ने वाली मुस्कान और सबसे बड़ी विशेषता उनके चश्में से झांकती हुई वे पारखी आँखें, कार्यकर्ता की परख करने में एक दम दक्ष।
परिचय के साथ बातचीत शुरू हुई। पहली बार लगा कि संघ इतना शक्तिशाली और राष्ट्र की दिशा देने में सक्षम हो गया है। जबकि मैं इसके पूर्व यह दक्ष-आंरभ से कुछ जराश हो चला था। उन्होंने कहा- 'भाई अब तो हमारी मेहनत और लगन से संघ कार्य समाज का वह सुपर पावर जनरेटर बन गया है, जिसकी अब केवल लाइनें बिछाना बाकी है और यह कार्य भी अगले एक दो वर्षों में हुआ समझो, फिर हम समाज के हर क्षेत्र में करंट और रोशनी पहुंचा सकेंगे।' उनकी इस आत्मविश्वास भरी वाणी से मैं ओतप्रोत हो गया, और आज हम सब देखते हैं कि संघ सचमुच सामाजिक परिवर्तन और प्रखर राष्ट्रीयता का केन्द्र बिन्दु बन गया है।
सरदारसिंह तंवर श्री रामकृष्ण विद्या मंदिर, धार