विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु) विनियम, 2026 को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में अन्तर्निहित भावना से जोड़ते हुए ‘समता’, ‘समावेशन’ और ‘सामाजिक न्याय’ जैसे कर्णप्रिय एवं लोकप्रिय आदर्शों के साथ प्रस्तुत किया गया है।
जैसा कि विनियम का शीर्षक संकेत करता है, इसका प्रमुख लक्ष्य एवं केन्द्रीय भाव ‘समता’ की स्थापना और उसका संवर्धन है। किन्तु इसकी सम्पूर्ण संरचना पर दृष्टि डालने पर स्पष्ट होता है कि यह पूर्णतः धर्म, जाति, लिंग, नस्ल, जन्म-स्थान और दिव्यांगता जैसी ‘पहचान-आधारित’ श्रेणियों पर आधारित है। उच्च शिक्षा संस्थानों में अनिवार्य रूप से गठित किए जाने वाले केन्द्र, समितियाँ, निगरानी इकाइयाँ तथा प्रतिनिधित्व व्यवस्था में इन्हीं पहचानों की अनिवार्यता को रेखांकित किया गया है।
प्रशासनिक दक्षता से सम्पन्न अधिकारी ही इसके सम्यक निर्वचन द्वारा यह समझ सकते हैं कि उपर्युक्त ‘पहचान-आधारित’ श्रेणियों से इतर, अर्थात् तथाकथित उच्च श्रेणियों का प्रतिनिधित्व भी इसमें सम्भव है। किन्तु उच्च शिक्षा संस्थानों में जिस स्तर का प्रशासनिक नेतृत्व वर्तमान में उपलब्ध है, उसके कार्य-व्यवहार और निरन्तर क्रम को देखते हुए आशंकाएँ बढ़ जाती हैं।
एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि इस विनियम की संरचना में ‘पहचान’ ही मूल आधार है। परिणामस्वरूप, यह व्यक्ति को एक ‘स्वतंत्र और समग्र नागरिक’ के रूप में देखने के बजाय, सर्वप्रथम किसी-न-किसी सामाजिक खाँचे में परिभाषित करती है। इस प्रकार व्यवहार में अपेक्षित समता, ‘समान नागरिकता’ की अवधारणा को पदच्युत कर ‘पहचान-आधारित राजनीति’ की प्रचलित धारा को ही संस्थागत स्वरूप प्रदान करती प्रतीत होती है।
इस विनियम में ‘भेदभाव’ की परिभाषा अत्यधिक विस्तृत होने के कारण अस्पष्ट बन जाती है। इसमें प्रत्यक्ष भेदभाव के साथ-साथ अप्रत्यक्ष, अन्तर्निहित, अनुभूत अथवा मनोवैज्ञानिक असुविधाओं को भी इसकी परिधि में सम्मिलित कर लिया गया है। ‘मानवीय गरिमा के प्रतिकूल’ जैसे भारी-भरकम पदबन्ध बिना किसी ठोस एवं वस्तुनिष्ठ मापदण्ड के प्रयुक्त किए गए हैं। जबकि न्याय की मूल शर्त स्पष्टता और पूर्वानुमेयता होती है, इस विनियम में अनिश्चितता और आशंका को ही व्यवस्था का अंग बना दिया गया है।
प्रथम दृष्टया, उच्च शिक्षा संस्थानों में कथित भेदभाव के उन्मूलन और समान अवसर सुनिश्चित करने का एक सायास ‘प्रगतिशील’ प्रयास इस विनियम में दिखाई देता है। किन्तु जब इसके वैचारिक आधार, संरचनात्मक विन्यास और सम्भावित सामाजिक प्रभावों के सन्दर्भ में सूक्ष्म विवेचन किया जाता है, तो इसके भीतर अनेक विरोधाभास उजागर होते हैं। यही विरोधाभास इसके घोषित उद्देश्यों को भी दुर्बल करते प्रतीत होते हैं। इसके अतिरिक्त, यह विनियम उच्च शिक्षा संस्थानों को, और प्रकारान्तर से सम्पूर्ण भारतीय समाज को, और अधिक खण्डित करने की सम्भावना भी उत्पन्न करता है।
उच्च शिक्षा संस्थानों में मुक्त संवाद, वैचारिक असहमति और आलोचनात्मक विमर्श के स्थान पर ‘हल्लाबोल शिकायत संस्कृति’ और आत्म-नियन्त्रण का वातावरण विकसित होने की आशंका प्रबल होती दिखाई देती है।
समावेशन के नाम पर निर्मित यह विनियमबद्ध संस्थागत ढाँचा उच्च शिक्षा संस्थानों को धीरे-धीरे एक निगरानी क्षेत्र में परिवर्तित करता प्रतीत होता है। समान अवसर केन्द्र, समता समिति, समता समूह, समता दूत, चौबीसों घंटे सक्रिय समता हेल्पलाइन, अनिवार्य घोषणा-पत्र और नियमित जनसांख्यिकीय रिपोर्टिंग जैसे उपाय एक ऐसे तन्त्र का निर्माण करते हैं, जो विश्वास के स्थान पर गहरे अविश्वास पर आधारित है।
उच्च शिक्षा संस्थानों की मूल परिकल्पना बौद्धिक स्वतंत्रता और सह-अस्तित्व की भावना के विकास की रही है, जो इस व्यवस्था में खण्डित होती दिखाई देती है। इस विनियम की धाराओं के लागू होने पर विद्यार्थी, शिक्षक और कर्मचारी एक-दूसरे को शैक्षिक समुदाय के सहयात्री के बजाय सम्भावित शिकायतकर्ता अथवा आरोपी के रूप में देखने लगेंगे, ऐसी गहरी आशंका उत्पन्न होती है। इससे ‘हम’ और ‘वे’ की मानसिक विभाजन रेखा और अधिक गहरी हो सकती है।
इन आशंकाओं के अतिरिक्त, विनियम में एक गम्भीर दण्डात्मक प्रवृत्ति भी अन्तर्निहित है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को यह अधिकार प्रदान किया गया है कि वह कथित उल्लंघन की स्थिति में किसी उच्च शिक्षा संस्थान को अध्ययन कार्यक्रमों के संचालन से प्रतिबन्धित कर सके, मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षा (ओडीएल) तथा ऑनलाइन कार्यक्रमों से वंचित कर सके अथवा उसे 2(एफ) और 12(बी) की सूची से हटा सके। यह व्यवस्था राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में प्रतिपादित ‘संस्थागत स्वायत्तता’ की भावना के प्रतिकूल प्रतीत होती है।
वर्तमान परिदृश्य में संस्थागत स्वायत्तता निरन्तर ह्रासमान होती दिखाई देती है। विश्वविद्यालयों को पूर्व में प्राप्त ज्ञान-निर्माण, बौद्धिक अन्वेषण और वैचारिक उन्नयन की स्वतंत्रता धीरे-धीरे परिसीमित होकर एक केन्द्रीकृत, अनुशासनात्मक और दण्डात्मक तन्त्र के अधीन आती प्रतीत हो रही है। यह प्रवृत्ति किसी भी राष्ट्र के दीर्घकालिक हित में समीचीन नहीं कही जा सकती।
सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से स्वीकृत यह नीति व्यावहारिक रूप से सामाजिक ध्रुवीकरण को प्रोत्साहित करती प्रतीत होती है। इस विनियम के लागू होने के बाद प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान को नियमित रूप से जाति एवं समूह-आधारित जनसांख्यिकीय आँकड़ों तथा शिकायतों का वर्गीकृत प्रकाशन करना होगा। इससे शिक्षा का उद्देश्य साझा नागरिकता और सामूहिक उत्तरदायित्व विकसित करने के स्थान पर स्थायी समूह-चेतना को बनाए रखने तक सीमित हो सकता है।
विद्यार्थी सर्वप्रथम भारतीय नागरिक होने के बजाय किसी-न-किसी श्रेणी के प्रतिनिधि बन जाते हैं। समान पीड़ा, समानुभूति और साझा भविष्य की अनुभूति के स्थान पर प्रतिस्पर्धी पीड़ितता का भाव विकसित होता है, जो संवादात्मकता और सामाजिक समरसता के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
इन समस्त प्रवृत्तियों का सम्मिलित प्रभाव उच्च शिक्षा और प्रकारान्तर से भारतीय समाज पर दूरगामी पड़ता है। इस विनियम के प्रभावी होते ही सामाजिक विभाजन कम होने के बजाय संस्थागत रूप से स्थायी होता प्रतीत होता है। शताब्दियों से विश्वविद्यालय संवाद, समन्वय और बौद्धिक विकास के उर्वर स्थल रहे हैं, किन्तु अब वे संघर्ष-प्रबन्धन और सर्वव्यापी नियन्त्रण के केन्द्र बनते दिखाई दे रहे हैं।
कहा जा सकता है कि उच्च शिक्षा राष्ट्रीय चेतना और साझा सामाजिक दृष्टि को सुदृढ़ करने के बजाय खण्डित पहचान-बोध को पुनरुत्पादित करने की दिशा में अग्रसर होती दिख रही है। कुछ पाठक यह भी कह सकते हैं कि लेखक की दृष्टि में ही कोई दोष है, जो उसे यह सब दिखाई दे रहा है।
निस्संदेह, यह विनियम नैतिक उद्देश्यों की दृष्टि से आकर्षक है, किन्तु वैचारिक और संरचनात्मक स्तर पर गहरे अन्तर्विरोधों से ग्रस्त है। भेदभाव को समाप्त करने के प्रयास में यह उन्हीं पहचान-रेखाओं को और अधिक सुदृढ़ करता प्रतीत होता है, जिन्हें भारतीय समाज ऐतिहासिक रूप से पार करने का सतत प्रयास करता रहा है।
आवश्यकता इस बात की है कि समता को पहचान-आधारित प्रबन्धन के बजाय समान नागरिकता, संवाद और शैक्षणिक स्वतंत्रता के आधार पर पुनर्विचारित किया जाए। अन्यथा, समता के नाम पर यह व्यवस्था विभाजन को ही स्थायी बना देने का माध्यम सिद्ध हो सकती है।
नीति-निर्माताओं का ध्यान राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़ों की ओर भी जाना आवश्यक था। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2015 में 8,900, वर्ष 2016 में 5,347 तथा 2020–22 के मध्य अनुसूचित जाति के 14.78 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति के 14.71 प्रतिशत मामले निराधार पाए गए। उच्च शिक्षा संस्थानों में वर्तमान स्थिति इतनी गम्भीर है कि किसी समय ‘अम्बेडकरवाद’ के बहाने समसामयिक परिवेश की आलोचनात्मक व्याख्या करने वाले लेख के आधार पर वर्षों बाद लेखक के विरुद्ध दुर्भावनापूर्ण ढंग से मामला दर्ज कर दिया जाता है और उसे अनुसूचित श्रेणियों का विरोधी घोषित कर दिया जाता है।
परिणामस्वरूप, अनुसूचित श्रेणियों से इतर व्यक्ति संविधान के किसी अनुच्छेद पर आलोचनात्मक टिप्पणी करने से पूर्व अपने परिवेश में ‘पहचान-आधारित’ श्रेणियों की खोज करने को विवश दिखाई देता है। जब वर्तमान में ही स्थिति इतनी भयावह है, तो इस विनियम के प्रभावी होने के पश्चात् क्या-कुछ सम्भव हो सकता है, इसका मात्र अनुमान ही सिहरन उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त है।