कांग्रेस के राष्ट्रीय मनरेगा श्रमिक सम्मेलन में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और पार्टी के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने कार्यकर्ताओं से मनरेगा योजना का नाम बदलने के विरोध में देशभर में आंदोलन चलाने का आह्वान कर एक नया विमर्श छेड़ दिया है। राहुल गांधी ने जिस तरह मनरेगा बचाओ अभियान छेड़ने की बात कही है, उससे यही स्पष्ट होता है कि वे एक बार फिर ऐसे मुद्दे को तूल देने जा रहे हैं।
सम्मेलन में देशभर से श्रमिक भाग लेने आए थे। इन श्रमिकों ने अपने-अपने कार्यस्थलों से मुट्ठीभर मिट्टी लाकर खड़गे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की उपस्थिति में प्रतीकात्मक रूप से पौधों में डाली। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस ने 10 जनवरी को संप्रग सरकार के महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम ‘मनरेगा’ को निरस्त किए जाने के विरोध में 45 दिवसीय राष्ट्रव्यापी अभियान ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ की शुरुआत की थी।
विपक्षी दल ‘विकसित भारत रोजगार आजीविका मिशन गारंटी अधिनियम’ को वापस लेने और मनरेगा को उसके मूल स्वरूप में, यानी काम करने के अधिकार और पंचायतों के अधिकार को बरकरार रखते हुए, एक अधिकार आधारित कानून के रूप में बहाल करने की मांग कर रहा है। हालांकि राहुल गांधी जो भी कदम उठाते हैं, उससे इस बात की गारंटी कम ही होती है कि उन्हें और कांग्रेस को कोई राजनीतिक या चुनावी लाभ मिलेगा।
ऐसा ही एक मुद्दा मनरेगा का है, जिस पर बेवजह तूल देकर वे इसे राजनीतिक मुद्दा बनाना चाहते हैं। यह पहली बार नहीं है जब राहुल गांधी किसी ऐसे विषय को उठा रहे हों, जिसमें जनता का ध्यान आकर्षित करने की क्षमता नहीं दिख रही है।
जहां तक मनरेगा का सवाल है, तो केवल इसका नाम ही नहीं बदला गया है, बल्कि इसके कई प्रावधानों में भी बदलाव किए गए हैं। ये बदलाव कुछ इस प्रकार हैं कि कानून रूपी यह योजना एक तरह से नई योजना बन गई है। लेकिन इसके आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचना सही नहीं होगा कि ग्रामीण विकास और रोजगार गारंटी के इस कानून को खत्म कर गरीबों के अधिकारों पर कुठाराघात किया जा रहा है। राहुल गांधी मनरेगा बचाओ अभियान के जरिए कुछ ऐसी ही प्रतीति कराना चाहते हैं।
इसके लिए वे ऐसे तर्क भी दे रहे हैं कि प्रधानमंत्री ने मनरेगा की जगह वीबी जीरामजी लाने से पहले न तो कोई अध्ययन कराया और न ही कैबिनेट से किसी तरह का विचार-विमर्श किया। ऐसे तर्क हास्यास्पद ही कहे जा सकते हैं। ऐसे तर्क तभी दिए जाते हैं, जब सरकार के किसी फैसले, कार्यक्रम अथवा कानून का ठोस तर्कों के साथ विरोध करना कठिन हो जाता है।
बीस वर्ष पहले जब मनरेगा को लागू किया गया था, तब देश की परिस्थितियां भिन्न थीं। बीते दो दशकों में देश के जनजीवन के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी बड़े बदलाव आए हैं। इन बदलावों को देखते हुए मनरेगा जैसी योजना में संशोधन करना केवल आवश्यक ही नहीं, बल्कि अनिवार्य हो गया था। विशेषकर इसलिए क्योंकि समय के साथ मनरेगा में कई कमजोरियां सामने आ चुकी थीं।
इन कमजोरियों पर चर्चा भी होती रही है। प्रायः यह कहा जाता था कि आखिर मनरेगा के तहत कब तक गड्ढे खोदे और भरे जाते रहेंगे। इसी तरह यह भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि मनरेगा में भ्रष्टाचार की शिकायतें लगातार आती रही हैं। क्या कभी इसका निष्पक्ष आकलन किया गया कि मनरेगा से ग्रामीण जीवन में कितना बुनियादी बदलाव आया?
यदि वीबी जीरामजी के तहत काम के दिन 100 से बढ़ाकर 125 किए जा रहे हैं और इस योजना के काम अधिक पारदर्शी ढंग से कराने के उपाय किए जा रहे हैं, तो इसमें किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए। इसी तरह इसमें क्या हर्ज है कि अब इस योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में ठोस बुनियादी ढांचे का भी निर्माण कराया जाएगा और केंद्र स्तर पर उसकी निगरानी बढ़ाई जाएगी।
नई योजना की आलोचना का एक बिंदु यह भी है कि इसमें राज्यों का अंशदान बढ़ा दिया गया है। लेकिन ऐसा करने से राज्यों में जिम्मेदारी का भाव जागेगा और उन्हें अधिक जवाबदेह भी बनाया जा सकेगा।