संघ कार्य के 100 वर्ष:1940 में बसंत पंचमी के दिन भोपाल के कमाली मंदिर में लगी थी पहली शाखा
भोपाल विभाग का संगठनात्मक विकास
समय के साथ संगठनात्मक आवश्यकताओं के अनुसार विभागीय ढांचे का पुनर्गठन होता रहा। 1989 में भोपाल विभाग को महानगर विकास और भोपाल विभाग में विभाजित किया गया। 1998 में पुनः दोनों का एकीकरण हुआ। वर्ष 1996 तक विभाग सतत सक्रिय रहा। इसके बाद श्री अनिल डी. ने विभाग प्रचारक के रूप में कार्य संभाला और इनके सहप्रचारक के रूप में श्री सुजान भगत कार्यरत रहे।
वर्तमान समय में भी भोपाल विभाग में भोपाल महानगर, सागर, उज्जैन के रूप में कार्य संचालित हो रहा है। इसके अतिरिक्त सीहोर, हुजूर, बैरसिया, रायसेन, विदिशा और शाजापुर जिले संगठनात्मक दृष्टि से सशक्त रूप में स्थापित हैं।
नवाबी रियासत के भय, दमन और प्रतिबंधों के बीच पनपा यह संगठन आज जागरूक, संगठित और सक्रिय समाज का आधार बना है। भोपाल में संघ की यह इतिहास कथा केवल अतीत का दस्तावेज नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए साहस, सेवा और समर्पण की अक्षय विरासत है।
1940 : भोपाल में पहली संघ शाखा
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सौ वर्षों की यात्रा में जब भारतीय समाज के सांस्कृतिक पुनर्जागरण और संगठनात्मक चेतना के रूप में देखा जाता है, तब भोपाल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण दिखाई देती है। यह केवल एक संस्था के विस्तार की कहानी नहीं, बल्कि विपरीत और दमनकारी परिस्थितियों में भी धैर्य, अनुशासन और निष्ठावान सेवा के बल पर समाज को दिशा देने का सतत प्रयास है।
1940 में बसंत पंचमी के अवसर पर नगर के कमली मंदिर परिसर में शाखा का शुभारंभ हुआ। उस समय नवाबी रियासत के भय, प्रतिबंध और दमन के वातावरण में यह एक साहसिक पहल थी। कमली मंदिर में लगी यह पहली शाखा भोपाल में संघ कार्य का आधार बनी।
कमली मंदिर में लगी थी पहली शाखा
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्षों को यात्रा भारतीय समाज के आत्मबोध, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और संगठनात्मक चेतना की विराट कथा है। यह केवल एक संस्था के विस्तार की कहानी नहीं, बल्कि विपरीत और दमनकारी परिस्थितियों में भी धैर्य, अनुशासन और निस्वार्थ सेवा के बल पर समाज को दिशा देने का सतत प्रयास है। इस दीर्घ यात्रा का एक अत्यंत संघर्षपूर्ण, किंतु उतना ही प्रेरक अध्याय है भोपाल। नवाबी रियासत के भय, प्रतिबंध और दमन से निकलकर संगठित, जागरूक और आत्मविश्वासी समाज तक पहुँचने की यह यात्रा संघ की तपस्या और संगठन शक्ति का सजीव उदाहरण है।
दो सत्ता केंद्र और बढ़ती असुरक्षा
भोपाल रियासत में दो प्रमुख शक्ति केंद्र थे। एक ओर भोपाल नगर में नवाब परिवार अपनी निजी सुरक्षा सेना के साथ निवास करता था और वहीं से शासन संचालित होता था। दूसरी ओर सीहोर में अंग्रेज पोलिटिकल एजेंट का मुख्यालय और सैन्य छावनी स्थित थी। इस दोहरे नियंत्रण ने हिन्दू समाज की असुरक्षा को और बढ़ा दिया था। इसके बावजूद कुछ जागरूक नागरिक सामाजिक चेतना को जीवित रखने का प्रयास कर रहे थे। इन्हीं प्रयासों से भोपाल में हिन्दू सेवा संघ सक्रिय हुआ, जो सनातन हिन्दुओं के नागरिक अधिकारों और सम्मान के लिए संघर्ष कर रहा था। मंदिर कमाली परिसर में संचालित अखाड़ा केवल शारीरिक अभ्यास का स्थान नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना का केंद्र बन चुका था। यही स्थान आगे चलकर संघ कार्य की भूमि बना।
1934: संघ से ऐतिहासिक संपर्कः वर्ष
1934 भोपाल के लिए निर्णायक सिद्ध हुआ। उसी वर्ष हिन्दू सेवा संघ का एक प्रतिनिधिमंडल हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय अधिवेशन में भाग लेने नासिक गया। लौटते समय यह दल नागपुर रुका, जहाँ उनकी भेंट राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार से हुई। जंगल सत्याग्रह के बाद संघ और डॉक्टरजी देशभर में चर्चित हो चुके थे। इस प्रतिनिधिमंडल में भाई उद्धवदास मेहता, मास्टर भैरोंप्रसाद सक्सेना, ठाकुर लालसिंह सहित छह कार्यकर्ता शामिल थे।
भोपाल से संबंधित संघ के दायित्ववान प्रमुख कार्यकर्ता
परमेश्वरीवल्लभ शर्मा, मा. शशीकान्त शेठ, डॉ. माधव हरि कान्हेरे, विभीषण सिंह, ज्ञान प्रकाश तिवारी, विलास गोळे, उत्तमचंद ईसराणी, गुलाबचंद खण्डेलवाल, डॉ. लक्ष्मणराव जोशी श्री दिगंबरराव तिजारे, श्री दत्ताजी कस्तुरे, श्रीअरविंद मोघे, श्री गोपाळराव येवतीकर, श्री अण्णाजी मुकादम, डॉ. राजकुमार जैन, श्री श्रीधर पराडकर, श्रीअनिल दवे बाबूलाल सिंघल, मुरारीलाल श्रीवास्तव, राम शोभाणी, जुगलकिशोर भार्गव, मोरेश्वर रानडे, नर्मदाप्रसाद किंकर, दिनकर सबनीस, अभय जैन, विलास गोले, श्रीराम आरांवकर, अरुण कुलकर्णी, तपन भौमिक, सुहास भगत, पंकज जोशी, राकेश शर्मा, प्रभाकर केलकर, जयरामदास टहिलयानी गोविन्द सारंग, नारायणप्रसाद गुप्ता, नेमीचंद कक्कड़, 21. जीवनधर जैन, ओमप्रकाश कुन्द्रा, नितिन केकरे, चंदरसिंह ।
उन्होंने संघ की शाखा पद्धति, कार्यशैली और उद्देश्य को गहराई से समझा। यही भेंट आगे चलकर भोपाल में संघ कार्य की नींव बनी।
व्यायामशाला से शाखा की ओर पहला कदमः भोपाल लौटने के बाद भाई उद्धवदास मेहता ने मंदिर कमाली परिसर के अखाड़े को व्यायामशाला का स्वरूप दिया। कुश्ती अभ्यास के साथ-साथ प्रातःकालीन सामूहिक गतिविधियां, अनुशासन तथा सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर चर्चा प्रारंभ हुई। इस व्यायामशाला का संचालन महादेव प्रसाद आचार्य को सौंपा गया
प्रतिबंध, छापे और गुप्त संघर्षः मंदिर की गतिविधियाँ अंग्रेज पोलिटिकल एजेंट की दृष्टि से
नहीं बच सकीं। उसने इसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधि मानकर नवाब को पत्र लिखा। परिणामस्वरूप नवाब प्रशासन ने मंदिर कमाली पर छापे मारे और व्यायामशालाओं पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद कई वर्षों तक संघर्ष चला। कभी बंद कमरों में अभ्यास हुआ, कभी गुप्त रूप से। साथ ही नवाब प्रशासन से संवाद और वार्ताएं भी चलती रहीं। लंबे प्रयासों के बाद 1938 में एक समझौता हुआ, जिसके अंतर्गत हिन्दू समाज को सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक उत्सव सार्वजनिक रूप से मनाने की अनुमति मिली।
1942: भारत छोड़ो आंदोलन की
चुनौतीः भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान संघ कार्य को अस्थायी बाधा आई। सीहोर में आंदोलन विशेष रूप से तीव्र था, क्योंकि वहाँ अंग्रेज पोलिटिकल एजेंट का मुख्यालय था। संघ स्वयंसेवकों ने आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। अनेक गिरफ्तारियाँ हुईं और कुछ समय के लिए शाखाओं का संचालन बाधित हुआ, किंतु 1943 के प्रारंभ से कार्य पुनः नियमित हो गया।
1948: प्रतिबंध और अमानवीय दमनः
फरवरी 1948 में गाँधीजी की हत्या के बाद संघ पर देशव्यापी प्रतिबंध लगा दिया गया। भोपाल का नवाब प्रशासन मानो इसकी प्रतीक्षा कर रहा था, क्योंकि संघ स्वयंसेवक विलीनीकरण आंदोलन में सक्रिय थे। प्रतिबंध लगते ही संघ और हिन्दू महासभा से जुड़े कार्यकर्ताओं के घरों पर दमन शुरू हुआ।
एक विचार से राष्ट्र निर्माण
“केवल भूमि के किसी टुकड़े को राष्ट्र नहीं कहते। एक विचार, एक आधार, एक सभ्यता और एक परंपरा से लोग पुरातन काल से रहते चले आए हैं, उन्हीं लोगों से राष्ट्र बनता है।”
- डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार