उच्च शिक्षा और यूजीसी: यूजीसी का समता संवर्धन विनियम 2026 समाज को बांटने की साजिश?
डॉ. विश्वास चौहान
भारतीय शिक्षा व्यवस्था में समता और समावेशन के नाम पर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। 13 जनवरी 2026 को भारत के राजपत्र में प्रकाशित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु विनियम, 2026' ने उच्च शिक्षा के परिदृश्य को बदलने का प्रयास किया है। ये विनियम 2012 के पुराने नियमों को प्रतिस्थापित करते हैं और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 की भावना से प्रेरित हैं, जिसमें 'पूर्ण समता और समावेशन' को शिक्षा के मूल में रखा गया है।
लेकिन इन नियमों का जन्म सिर्फ नीतिगत दस्तावेज़ों से नहीं हुआ। यह सही है कि ये नियम सामाजिक दर्द, विधिक संघर्ष, राजनीतिक बहस और वैचारिक टकराव का परिणाम हैं। इन नियमों की पृष्ठभूमि, विकास और चुनौतियों को समय रहते समझना और इनके वैचारिक पहलुओं का विश्लेषण करना आवश्यक है।
उच्च शिक्षा में भेदभाव की समस्या सदियों पुरानी है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 समानता की गारंटी देते हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से कैंपस में जाति, धर्म, लिंग या दिव्यांगता आधारित भेदभाव जारी रहा। वर्ष 1989 का एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम इस दिशा में एक मजबूत कदम था, लेकिन उच्च शिक्षा में इसका प्रभाव सीमित रहा।
2000 के दशक में थोराट समिति (2007) ने एआईआईएमएस जैसे संस्थानों में जातिगत भेदभाव की जांच की और समान अवसर केंद्र (ईओसी) की सिफारिश की। लेकिन असली उत्प्रेरक दो दुखद घटनाएँ बनीं: रोहित वेमुला की आत्महत्या (2016, हैदराबाद विश्वविद्यालय) और पायल तडवी की मौत (2019, मुंबई मेडिकल कॉलेज)। वेमुला का मामला पिछड़े छात्रों पर राजनीतिक दबाव और भेदभाव का प्रतीक बना, जबकि तडवी का मामला उसकी जनजातीय पृष्ठभूमि से जुड़ा था। इन घटनाओं ने राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ा।
दूसरी ओर नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े डराने वाले थे: 2022 में 13,044 छात्रों ने आत्महत्या की, इनमें सामान्य छात्र भी शामिल थे, और साथ ही एट्रोसिटी (अत्याचार) के मामलों की संख्या भी बढ़ रही थी। इन घटनाओं से प्रेरित होकर वेमुला और तडवी की माताओं की ओर से 2019 में सर्वोच्च न्यायालय में एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने एक जनहित याचिका (पीआईएल) दाखिल की। इंदिरा जयसिंह को कुछ लोग अर्बन नक्सल भी कहते हैं। उन्होंने दलील दी कि 2012 के यूजीसी नियम अपर्याप्त हैं, भेदभाव की जांच, रिपोर्टिंग और दंड की कमी है। उन्होंने ओबीसी को जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा में शामिल करने और झूठी शिकायतों पर दंड हटाने की मांग की।
अप्रैल 2025 में उन्होंने यूजीसी के 2012 के विनियमों के 'ग्रे एरियाज' (अस्पष्ट क्षेत्रों) पर बहस की और सितंबर में समयसीमा तय करने पर जोर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी दलीलों से सहमति व्यक्त करते हुए यूजीसी को 8 सप्ताह में नए नियम बनाने का निर्देश दिया, जो इस विनियम का आधार बने।
जयसिंह की वैचारिक पृष्ठभूमि वामपंथी मानवाधिकारों से जुड़ी है, और उन्होंने मोदी सरकार की नीतियों पर अक्सर सवाल उठाए हैं। इस पीआईएल के दौरान न्यायालय ने छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्याओं पर विशेष ध्यान दिया। 24 मार्च 2025 को नए नियमों के लिए राष्ट्रीय कार्यबल (एनटीएफ) गठित किया गया। कहा जाता है कि नेशनल टास्क फोर्स का सुझाव इंदिरा जयसिंह ने सुप्रीम कोर्ट को दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने एनटीएफ का अध्यक्ष पूर्व न्यायाधीश एस. रविंद्र भट को बनाया, जिन्होंने मोदी सरकार द्वारा लाए गए ईडब्ल्यूएस कानून (10% आरक्षण सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए) के विरोध में निर्णय दिया था।