ये संन्यासी की भाषा नहीं हो सकती

ज्योतिर्मठ के प्रमुख स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बयान पर संत समाज में नाराजगी है। सवाल उठा है कि क्या यह भाषा संन्यासी मर्यादा के अनुरूप है।

Update: 2026-02-02 05:09 GMT

ज्योतिर्मठ के प्रमुख स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की भाषा, उनके बयान, उनका आचरण हैरान करने वाला है। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ न केवल जंग का ऐलान कर दिया है, बल्कि योगी से सनातनी हिन्दू होने का प्रमाण भी मांगा है। उन्होंने कहा कि योगी को 40 दिन में ये साबित करना होगा कि वो हिन्दू हैं और गाय को माता मानते हैं। उनका कहना है कि योगी गाय को राज्य माता घोषित करें, गौ हत्या और गौमांस के निर्यात पर पूर्ण

प्रतिबंध लगाएं। अगर वो ऐसा नहीं करते हैं तो मार्च में लखनऊ में होने वाले संत समागम में योगी को नकली हिन्दू घोषित किया जाएगा। संतों ने उनके इस बयान पर हैरानी जताई है। अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रवीन्द्र पुरी ने कहा कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद संतों की मर्यादा को तोड़ रहे हैं। योगी के खिलाफ उन्होंने जिस तरह के शब्दों का उपयोग किया है वैसा कोई शंकराचार्य नहीं कर सकता। अयोध्या तपस्वी छावनी के पीठाधीश्वर आचार्य परमहंस ने कहा कि स्वामी अविमुक्तश्वरानंद ने जो कहा, वह

संन्यासी की भाषा नहीं हो सकती। उन्होंने अपने अहंकार और क्रोध पर नियंत्रण नहीं रखा तो फिर उन्हें शंकराचार्य कौन मानेगा? जहां तक उत्तर प्रदेश में गौवध और गौमांस निर्यात पर पाबंदी लगाने का सवाल है तो स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की इस मांग में कोई दम नहीं है, क्योंकि भारत में उतर प्रदेश सहित गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हिमाचल और उत्तराखंड में गौवंश की हत्या पर पूरी तरह पाबंदी है जबकि आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और ओडिशा में कुछ शतों के

साथ पाबंदी है। केरल, पश्चिम बंगाल और उत्तर पूर्वी राज्यों में गौवध पर कोई पाबंदी नहीं है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ अक्सर न केवल गाय को माता कहकर संबोधित करते रहे हैं. बल्कि 2017 से 2020 के बीच उन्होंने गौशालाओं के निर्माण पर 764 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। इस साल के बजट में भी 2000 करोड़ रुपए का आवंटन गौवंश कल्याण और निराश्रित गायों के संरक्षण के लिए किया है। दरअसल पिछले महाकुंभ में मौनी अमावस्या के दिन हुई भगदड़ की घटना से सबक लेते

हुए इस बार माघ मेले में प्रशासन ने सुरक्षा और भीड प्रबंधन के लिए विशेष प्रबंध किए थे। प्रशासन भी ज्यादा सतर्कता और संवेदनशीलता बरत रहा है। मौनी अमावस्या के दिन श्रद्धालुओं को रोका नहीं जा रहा था, बल्कि धीरे-धीरे आगे बढ़ाया जा रहा था। इसी व्यवस्थित भीड़ के बीच पुरी (ओडिशा) स्थित गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती भी संगम में स्नान करने पहुंचे। वे उसी कतार में थे, जहां आम श्रद्धालु खड़े थे। न किसी को हटाया गया, न मार्ग खाली कराया गया। उन्होंने

आम श्रद्धालु की तरह संगम में स्नान किया। स्नान के बाद भी वे उतनी ही सहजता से लौट गए, जितनी सहजता से आए थे। यह दृश्य इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि उसी समय उत्तराखंड स्थित ज्योतिर्मठ के प्रमुख स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़ा विवाद सामने आया था। उनका आरोप था कि पुलिस ने उन्हें पालकी के साथ स्नान करने जाते समय रोका और शिष्यों से चक्का मुक्की की। इसके विरोध में वे संगम तट पर 11 दिन तक धरने पर बैठे रहे। चूंकि अद्धालु संतों से उपदेश से पहले अच्छे

आचरण की उम्मीद करते हैं। सनातन परंपरा में शंकराचार्य की पदवी ज्ञान, संयम और त्याग का प्रतीक मानी जाती है। संत की सबसे बड़ी पहचान उनका व्यवहार होता है। माघ मेला कोई साधारण आयोजन नहीं है। यह वह पावन भूमि है जहां आदि शंकराचार्य सहित अनगिनत संतों ने बिना किसी विशेषाधिकार के साधना की। संगम ने हमेशा विनय को स्वीकार किया है। जहां पद नहीं, भाव चलता है। संगम सबको समान रूप से स्वीकार करता है। संत को भी और सामान्य श्रद्धालु को भी..।

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