मणिपुर में युमनाम सरकारः स्थिरता के लिए समावेशी बातचीत की पहल हो

Update: 2026-02-06 03:05 GMT

मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के 9 फरवरी, 2025 को इस्तीफे के उपरांत लगभग एक साल बाद बुधवार को युमनाम खेमचंद सिंह के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हो गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राज्य में लगे राष्ट्रपति शासन के आदेश को रद्द करते हुए एक लोकप्रिय सरकार की वापसी का रास्ता साफ कर दिया। भाजपा के नेता युमनाम खेमचंद सिंह ने 13वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। उनके साथ कुकी समुदाय की नेमचा किपर्गन और भाजपा की सहयोगी नागा पीपल्स फ्रंट के लोसी दिखो ने भी शपथ ली। ये दोनों नेता उपमुख्यमंत्री के पद पर कार्य करेंगे।

यद्यपि यह कदम राष्ट्रपति शासन को एक साल से आगे बढ़ने से रोकने के लिए उठाया गया है, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि सत्तारूढ़ भाजपा को विधानसभा के कार्यकाल के आखिरी साल में जनता का समर्थन फिर से हासिल करने में इससे मदद अवश्य मिलेगी। राष्ट्रपति शासन को एक साल से आगे बढ़ाने के लिए संसद में संविधान संशोधन विधेयक लाना पड़ता। संविधान के अनुसार, एक साल से ज्यादा समय तक राष्ट्रपति शासन नहीं चल सकता। ऐसे में भाजपा के लिए नई सरकार बनाना जरूरी हो गया था। इसी कारण युमनाम खेमचंद को मुख्यमंत्री चुना गया।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि भाजपा ने आखिर मुख्यमंत्री पद के लिए युमनाम खेमचंद को ही क्यों चुना और क्या वे कुकी और मैतेई समुदायों के बीच संतुलन बना पाएंगे। जैसा कि आम चुनाव में देखा गया, एन. बीरेन सिंह के दूसरे कार्यकाल के दौरान मणिपुर की पहाड़ियों और घाटियों में असंतोष फैल गया था, जो विपक्षी उम्मीदवारों की जीत में साफ दिखाई दिया। इसके बाद जैसे-जैसे छिटपुट हिंसा अपेक्षाकृत शांत इलाकों में भी फैली, भाजपा के अंदरूनी आलोचकों के एक गठबंधन ने जिसमें खेमचंद सिंह भी शामिल थे नेतृत्व में बदलाव के लिए सफलतापूर्वक पैरवी की।

जब भाजपा नेतृत्व ने खेमचंद सिंह को विधायक दल के नेता और मुख्यमंत्री पद के लिए नामित किया, तब बीरेन सिंह भी वहां मौजूद थे। यह पार्टी के भीतर बनी आम सहमति को दर्शाता है। खेमचंद सिंह कुकी समुदाय में खासे लोकप्रिय नेता माने जाते हैं। उन्होंने पिछले साल नागा-बहुल उखरुल जिले में राहत शिविर का दौरा कर मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच सुलह की दिशा में काम करने का अपना इरादा भी जाहिर किया था। उनके इस दौरे के बाद दोनों समुदायों के बीच आपसी सद्भाव की उम्मीद जगी थी।

एक तरफ खेमचंद सिंह अपने प्रयासों से लोगों के बीच जाकर शांति का सूत्रपात करते रहे, तो दूसरी तरफ राष्ट्रपति शासन के दौरान सशस्त्र कट्टरपंथी समूहों की मनमानी को खत्म करने और विस्थापित लोगों की सुरक्षित वापसी को आसान बनाने के प्रयास किए गए। भले ही सुरक्षा बलों ने लूटे गए हथियारों का एक बड़ा हिस्सा बरामद कर लिया हो और कट्टरपंथी समूहों के असर को कम किया हो, लेकिन जातीय संघर्ष की मानवीय कीमत अब भी अनसुलझी है। अनुमानित 60 हजार विस्थापित लोगों में से सिर्फ नौ हजार ही अपने घर लौट पाए हैं, जो लगातार भरोसे की कमी को दर्शाता है।

जनवरी में चुराचांदपुर के तुइबोंग इलाके में एक मैतेई व्यक्ति की उसकी कुकी-जो पत्नी से मिलने जाते समय हत्या जैसी घिनौनी घटनाएं, उन कट्टरपंथी समूहों को काबू में करने की तत्काल जरूरत को दर्शाती हैं जो अब भी हावी हैं। भाजपा ने राजनीतिक अस्तित्व के सवाल को अपने नेताओं को आपस में जोड़ने वाले एक कारक के रूप में सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया है। हालांकि, दोनों समुदायों के बीच इसी तरह की शांति कायम करना बेहद मुश्किल काम है।

कुकी-जो समूह ‘अलग प्रशासन’ की ऐसी मांग कर रहे हैं, जो व्यावहारिक नहीं है और जिससे न केवल इन दोनों समुदायों के बीच, बल्कि इससे आगे भी विवाद बढ़ सकता है। लिहाजा, नई सरकार को नेतृत्व के पदों पर अलग-अलग समुदायों के प्रतिनिधियों को शामिल करने जैसी रियायतों से आगे बढ़ना होगा। सच्ची स्थिरता के लिए एक समावेशी बातचीत की जरूरत होगी, जिसमें सभी राजनीतिक और नागरिक समाज के हितधारक शामिल हों, ताकि भरोसे की नींव को फिर से मजबूत किया जा सके।

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