संघ कार्य के 100 वर्ष: बिलासपुर के चाटापारा की व्यायामशाला में डॉ. हेडगेवार जी के प्रवास से उठी चेतना

Update: 2026-02-05 06:19 GMT

छत्तीसगढ़ में संघ कार्य की ऐतिहासिक आधारशिला

छत्तीसगढ़ की धरती पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विशाल वटवृक्ष आज दृष्टिगोचर हो रहा है, उसकी जड़ें एक ऐतिहासिक प्रसंग में छिपी हैं। वह प्रसंग डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी के बिलासपुर प्रवास से जुड़ा है। सन् 1928 के 25–26 दिसंबर को हुआ यह प्रवास सामान्य नहीं था, बल्कि छत्तीसगढ़ में संघ विचार को व्यवहार और संगठन का रूप देने वाला निर्णायक क्षण था।

डॉ. हेडगेवार जी जब दो दिवसीय प्रवास पर बिलासपुर पहुंचे, तब यह क्षेत्र सामाजिक चेतना और नवजागरण के दौर से गुजर रहा था। युवाओं में ऊर्जा थी, लेकिन दिशा का अभाव था। इसी संदर्भ में बिलासपुर के चाटापारा स्थित व्यायामशाला का प्रसंग अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है। उस समय व्यायामशालाएं केवल शरीर को बलशाली बनाने का केंद्र नहीं थीं, बल्कि समाज-निर्माण की प्रयोगशालाएं हुआ करती थीं।

डॉ. साहब ने इस प्रवास के दौरान संघ कार्य को स्थायित्व देने के लिए संगठनात्मक ढांचा खड़ा किया। ऐसा माना जाता है कि छत्तीसगढ़ की पहली संघ शाखा का प्रारंभ यहीं से हुआ।

भाऊ साहब नूलकर को प्रथम संघचालक का दायित्व

भाऊ साहब नूलकर को बिलासपुर का प्रथम संघचालक, बापू साहब दिवस्कर को कार्यवाह तथा दत्तात्रेय वर्तक (दत्तोपंत) को शारीरिक कार्य का दायित्व सौंपा गया। बिलासपुर के चाटापारा की व्यायामशाला में ही छत्तीसगढ़ की पहली शाखा लगी थी। वर्तमान में यहां आधुनिक जिम संचालित है।

डॉ. साहब ने युवाओं में अनुशासन और राष्ट्रभाव का बीज बोया

उस ऐतिहासिक प्रसंग के संबंध में बिलासपुर के प्रथम शारीरिक कार्य प्रमुख दत्तात्रेय वर्तक (दत्तोपंत) के पौत्र सौरभ वर्तक बताते हैं कि उनके पिता भास्कर वर्तक ने यह जानकारी दी थी कि परम पूज्य डॉ. हेडगेवार जी का चाटापारा की व्यायामशाला में दो दिवसीय प्रवास हुआ था।

इस प्रवास के बाद बिलासपुर में व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया तीव्र गति से आगे बढ़ी। इसने युवाओं में अनुशासन, संगठन और राष्ट्रभाव का ऐसा बीज बोया, जो शीघ्र ही शाखा व्यवस्था के रूप में विकसित हुआ।

रायपुर और दुर्ग जैसे क्षेत्रों के लिए भी नेतृत्व तय किया

डॉ. साहब की दृष्टि केवल बिलासपुर तक सीमित नहीं थी। इस प्रवाह में उन्होंने रायपुर और दुर्ग जैसे क्षेत्रों के लिए भी नेतृत्व तय किया। रायपुर में कृष्णकुमार सिकरी, कृष्णासय कापी और नारायण पोदार को दायित्व दिए गए, वहीं दुर्ग में भाऊ साहब किरोलिकर को संघचालक बनाया गया। इस प्रकार छत्तीसगढ़ को एक संगठित कार्यक्षेत्र के रूप में विकसित करने की नींव रखी गई।

घटापारा की व्यायामशाला में हुआ वह संवाद, वह प्रेरणा और वह संगठनात्मक निर्णय आगे चलकर रायपुर, दुर्ग, जांजगीर और सरगुजा तक संघ विस्तार का आधार बना। आज जब छत्तीसगढ़ में संघ कार्य समाज के हर क्षेत्र में सक्रिय दिखाई देता है, तो उसके मूल में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी का वह ऐतिहासिक बिलासपुर प्रवास और घटापारा की व्यायामशाला से उठी चेतना स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।

वस्तुतः यह प्रयास छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सुदृढ़, अनुशासित और दीर्घकालिक नींव का प्रारंभिक सूत्रपात था, जिसने आने वाली पीढ़ियों को संगठन, सेवा और राष्ट्रधर्म के मार्ग पर अग्रसर किया।

“भगवा ध्वज का निर्माण संघ ने नहीं किया। संघ ने तो उस परम पवित्र भगवा ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार किया है, जो हजारों वर्षों से राष्ट्र और धर्म का प्रतीक रहा है।”

- डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार

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