एपस्टीन प्रकरण: पश्चिमी नैतिकता का टूटता भ्रम

बलबीर पुंज

Update: 2026-02-05 05:19 GMT

हर सभ्यता अपनी कुछ छवियां बनाती है और कहानियां गढ़ती है। इनके माध्यम से वह स्वयं को और दूसरों को यह बताती है कि उसका मूल उद्देश्य क्या है और वह किन मूल्यों को प्राथमिकता देती है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पश्चिमी संस्कृति के द्योतक देशों ने स्वयं को मानवाधिकारों का संरक्षक, कानूनी शासन का आदर्श, लैंगिक समानता का अग्रदूत, आधुनिक नैतिकता का मानक और स्वतंत्रता के अधिकारों का पैरोकार घोषित किया। यह स्वघोषणा केवल शब्दों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसे पूरी दुनिया पर थोपने की भी कोशिश की गई। आर्थिक दबाव, राजनीतिक हस्तक्षेप, सांस्कृतिक प्रभुत्व और आवश्यकता पड़ने पर सैन्य शक्ति-इन सबके माध्यम से पश्चिमी मूल्यों को विश्व पर लागू किया गया। इस प्रक्रिया में गैर-पश्चिमी सभ्यताओं को ‘पिछड़ा’ या ‘अप्रगतिशील’ बताकर हाशिए पर रखा गया।

परंतु जेफ्री एपस्टीन से संबंधित ‘एपस्टीन फाइल्स’, जिनकी नई खेप में 35 लाख पन्ने, 2,000 वीडियो और डेढ़ लाख से अधिक तस्वीरें शामिल हैं, जिन्हें अमेरिकी न्याय विभाग ने गत 30 जनवरी को जारी किया, उसने उस बनावटी नैतिक मुखौटे को चीरकर रख दिया है, जिसे पश्चिमी दुनिया ने अपनी छवि के लिए तैयार किया था। अमेरिकी उप-मुख्य न्यायाधीश टॉड ब्लेंच ने इसे एक कानूनी दायित्व बताया, लेकिन वैश्विक प्रतिक्रियाओं से संकेत मिलता है कि यह पश्चिमी सभ्यता का अपने नैतिक संकट से सामना था। अमेरिकी और यूरोपीय मीडिया इसे केवल शक्ति, पैसा और यौन अपराधों के सनसनीखेज मिश्रण के रूप में परोस रहा है। किंतु इसे केवल एक व्यक्तिगत अपराध के रूप में देखना वास्तविकता को दबाने का उपक्रम है। एपस्टीन प्रकरण कोई अपवाद नहीं, बल्कि पश्चिमी सभ्यता की आंतरिक विफलताओं, नैतिक द्वंद्व और पतन का लक्षण है।

जेफ्री एपस्टीन कोई गुमनाम या मामूली अपराधी नहीं था। वह एक संगठित शिकारी था, जिसे राजनीतिक, वित्तीय, शैक्षणिक और राजपरिवारों के समूहों का संरक्षण प्राप्त था। उस पर 2006 में नाबालिगों के यौन शोषण के आरोप लगे, लेकिन 2008 में उसे असाधारण रूप से कानूनी राहत मिल गई। वर्ष 2019 में वह फिर संघीय यौन तस्करी के आरोपों में गिरफ्तार हुआ और न्यूयॉर्क की जेल में उसकी मौत को एकाएक ‘आत्महत्या’ घोषित कर दिया गया, जिस पर आज भी सवाल उठते हैं।

एपस्टीन से जुड़े दस्तावेज मुख्यतः अदालती आदेशों पर सामने आए। इनमें उड़ान रिकॉर्ड, संपर्क सूचियां, गवाहियां, बयान और आंतरिक पत्राचार शामिल हैं, जो उस गठजोड़ का विवरण देते हैं, जिसमें एपस्टीन राष्ट्रपति, धनाढ्यों, मीडिया, विश्वविद्यालयों और राजघरानों के बीच सहज रूप से उठता-बैठता था। यह स्पष्ट है कि दस्तावेजों में केवल नामों का उल्लेख अपराध की पुष्टि नहीं करता, किंतु इस लंपट के आसपास प्रभावशाली हस्तियों का घेरा पश्चिमी नैतिकता के पतन की ओर अवश्य इशारा करता है। एपस्टीन का विमान, जिसका नाम ‘लोलिता एक्सप्रेस’ था, दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों को उसके निजी द्वीप और आवासों तक ले जाता था।

पश्चिम का दावा है कि कानून के सामने सभी समान हैं, जिसे ‘एपस्टीन फाइल्स’ ध्वस्त कर देती हैं। साधारण नागरिक के लिए न्याय तत्काल और कठोर, जबकि उच्च वर्ग के लिए विलंबित और लचीला-यह असमानता एक संरचनात्मक समस्या का प्रमाण है। यह सब एकाएक नहीं हुआ है। यह उस सांस्कृतिक चिंतन का परिणाम है, जिसमें स्वतंत्रता को जिम्मेदारी से, इच्छाओं को संयम से और अधिकारों को कर्तव्यों से अलग कर दिया गया। जब मानव शरीर का बाजारीकरण स्वतंत्रता और आधुनिकता के नाम पर वैध ठहराया जाने लगता है, तब सशक्तिकरण का स्थान शोषण और क्रूरता ले लेता है।

‘एपस्टीन फाइल्स’ पश्चिमी आधुनिकता का अपवाद नहीं, बल्कि उसी नैतिक भोंडेपन का तार्किक परिणाम है, जहां 40 प्रतिशत अमेरिकी युवा अकेलेपन, अवसाद और मानसिक अस्वस्थता से जूझ रहे हैं, और जहां प्रतिवर्ष 400 से 600 सामूहिक गोलीबारी की घटनाएं होती हैं। 1960 में केवल 13 प्रतिशत अमेरिकी अकेले रहते थे, जो 2022 में बढ़कर 29 प्रतिशत हो गए। तलाक की दर 40 से 80 प्रतिशत के बीच है, और एक-तिहाई युवा अमेरिकी अपने माता-पिता के साथ नहीं रहना चाहते। वर्ष 2019 में अमेरिकी सरकार ने बुजुर्गों की देखभाल पर 1.5 ट्रिलियन डॉलर खर्च किए थे, जिसके 2029 तक दोगुना होने की संभावना है। यही नहीं, ‘री-होमिंग’ नामक भूमिगत आयोजनों के माध्यम से ‘अनचाहे’ बच्चों को नए अभिभावकों तक पहुंचाया जाता है। ये सामाजिक दरारें उसी तथाकथित ‘पश्चिमी मॉडल’ की हैं, जिसे कभी सार्वभौमिक आदर्श माना गया था।

इतिहास भी पश्चिमी नैतिक दावों की असलियत उजागर करता है। चर्च प्रेरित इनक्विजिशन में लाखों लोगों को जलाया गया और असंख्य महिलाओं को चुड़ैल घोषित कर यातनाएं देकर मार डाला गया। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और न्यूजीलैंड में मूलनिवासियों की संस्कृतियों को नष्ट किया गया। भारत में दलित-जनजातियों और अमेरिका में अश्वेतों की सांस्कृतिक पहचान छीनी गई। चर्च-प्रेरित संस्थानों में यौन अपराधियों को संरक्षण देने का भी इतिहास रहा है। वर्ष 2004 की जॉन जे रिपोर्ट ने अमेरिका में 4,392 पादरियों द्वारा यौन शोषण का खुलासा किया था। इसी तरह अक्टूबर 2022 में फ्रांस में पादरियों द्वारा 3,30,000 बच्चों के यौन शोषण का भंडाफोड़ हुआ। ऐसे अनेक उदाहरण हैं और ‘एपस्टीन फाइल्स’ इसी श्रृंखला की नई कड़ी हैं।

दुर्भाग्य से औपनिवेशवाद का शिकार रहे भारत सहित कई देशों ने पश्चिमी ढांचे को आधुनिकता मान लिया। यह सुखद है कि भारत धीरे-धीरे अपनी कालजयी सनातन नैतिकता की ओर लौट रहा है। गीता का कर्मयोग-‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’—कर्तव्य को सर्वोपरि मानता है। जब धर्म का पालन होता है, तो दूसरों के अधिकार स्वतः सुरक्षित हो जाते हैं। यहां ‘धर्म’ केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का मार्ग है। सूर्य का धर्म प्रकाश देना है, जल का धर्म जीवन देना है। इसी प्रकार पिता, माता, शिक्षक और शासक का धर्म अपने दायित्वों का निर्वहन करना है। यही नैतिक ढांचा समाज में न्याय, समरसता और अधिकारों को सुनिश्चित करता है।

‘एपस्टीन फाइल्स’ केवल आपराधिक तानाबाना नहीं, बल्कि एक सभ्यता की विफलता का प्रतीक हैं। भारत को इससे यह सीख लेनी चाहिए कि पश्चिम की त्रुटियों को न दोहराए, बल्कि अपने कर्म, धर्म, संयम और नैतिक उत्तरदायित्व पर आधारित सभ्यतागत विरासत को और सशक्त करे।

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