भारत-अमेरिका व्यापार समझौता: भारत की ‘बत्तख कूटनीति’ की जीत
प्रो. अंशु जोशी
इस सप्ताह भारत ने दुनिया को ‘बत्तख कूटनीति’ की शक्ति दिखाई। यूरोपीय संघ के साथ एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार और निवेश समझौते पर पहुंचने के बाद, साथ ही अरब लीग के देशों को शामिल करने वाले ‘दिल्ली घोषणा-पत्र’ के जरिए भारत ने ट्रम्प से एक नए भारत की ताकत को स्वीकार कराकर एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता हासिल की है।
इस सप्ताह ट्रम्प ने भारत पर लगाए गए दंडात्मक शुल्कों को हटा दिया और एक व्यापार सौदे की घोषणा की। अमेरिका-भारत व्यापार समझौते को एक कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है, जिसने एक जबर्दस्त टैरिफ गतिरोध को भारत के लिए रणनीतिक दावेदारी के क्षण में बदल दिया। हालांकि आर्थिक और भू-राजनीतिक विवरण अभी भी विकसित हो रहे हैं, यह समझौता यह दर्शाता है कि भारतीय कूटनीति ने अपने राष्ट्रीय हितों और प्राथमिकताओं के अनुरूप परिणाम प्राप्त करने के लिए व्यापार, ऊर्जा और महाशक्ति राजनीति जैसे कई मोर्चों पर दबाव का प्रभावी ढंग से उपयोग किया है।
शुल्क वृद्धि से बातचीत तक
अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में लौटने के तुरंत बाद ट्रम्प ने अपनी ‘पारस्परिक शुल्क नीति’ को फिर से लागू किया। 2025 में ट्रम्प ने विभिन्न भारतीय निर्यातों पर 25 प्रतिशत पारस्परिक शुल्क लगाया, जिसके बाद भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद जारी रखने के कारण अतिरिक्त 25 प्रतिशत दंडात्मक शुल्क लगाया गया। इससे कुछ भारतीय वस्तुओं पर प्रभावी रूप से शुल्क लगभग 50 प्रतिशत तक पहुंच गया।
हालांकि उन्होंने चीन और तुर्की को नजरअंदाज किया, जो दोनों भारत की तुलना में रूस से अधिक तेल और गैस का आयात करते हैं। इस वृद्धि ने भारतीय उद्योगों के लिए खतरा पैदा कर दिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र तथा रक्षा सहयोग पर केंद्रित, अन्यथा सहकारी रणनीतिक संबंध को भी जोखिम में डाल दिया। भारत का लक्ष्य अपनी अल्पकालिक चुनौतियों को अधिक संतुलित शर्तों पर आर्थिक और रणनीतिक संबंधों के दीर्घकालिक पुनर्गठन में बदलना था।
व्यापार सौदे की प्रमुख विशेषताएं
काफी हंगामे के बाद ट्रम्प ने अंततः यह समझ लिया कि पूरी दुनिया वर्तमान में भारत को सबसे भरोसेमंद विकास भागीदार क्यों मानती है। यूरोपीय संघ के साथ एफटीए के समापन के बाद ट्रम्प ने यह महसूस किया कि यूरोपीय देश अमेरिका से दूरी बना रहे हैं और चूंकि वे चीन पर भरोसा नहीं करते, इसलिए अब भारत की ओर देख रहे हैं।
उन्हें यह भी समझ आ गया होगा कि इस समझौते के माध्यम से भारत अगले तीन वर्षों में ट्रेड सरप्लस हासिल करने की स्थिति में है, जिससे वह ट्रम्प द्वारा लगाए गए शुल्कों से हुए नुकसान की भरपाई कर सकेगा। अंततः ट्रम्प ने भारत से हाथ मिलाने का फैसला किया। उन्होंने भारतीय वस्तुओं पर ‘आपसी शुल्क’ को 18 प्रतिशत तक कम करने और पहले लगाए गए अतिरिक्त 25 प्रतिशत दंडात्मक शुल्क को हटाने की घोषणा की, जिससे कुल प्रभावी शुल्क में बड़ी कमी आई।
यह भारत की कूटनीतिक जीत क्यों है?
शक्ति असंतुलन को फिर से परिभाषित करने और ट्रम्प के बाहरी दबाव को अपनी शर्तों पर अनुकूल परिणाम में बदलने की भारत की क्षमता महत्वपूर्ण है। देश ने अपने सबसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों पर समझौता किए बिना अमेरिकी शुल्कों में तत्काल कमी हासिल की है। चूंकि टैरिफ वृद्धि अमेरिका द्वारा एकतरफा शुरू की गई थी, इसलिए उस खतरे को बातचीत के जरिए राहत में बदलना भारत की वार्ता-शक्ति का प्रदर्शन माना जाएगा। हालांकि भारत वेनेजुएला से अपनी तेल खरीद बढ़ाने पर सहमत हुआ है, लेकिन उसने ठोस आर्थिक लाभ भी सफलतापूर्वक हासिल किए हैं, जिनमें अमेरिकी बाजार तक बढ़ी हुई पहुंच और दीर्घकालिक ऊर्जा आपूर्ति की गारंटी शामिल है। इस प्रकार यह समझौता केवल एकतरफा रणनीतिक सरेखण नहीं, बल्कि एक व्यापक ‘पैकेज’ के रूप में सामने आया है।
इस सौदे ने यह भी साबित किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे नेता हैं जो वैश्विक शक्तियों से ‘मित्रता और सम्मान’ की सार्वजनिक अभिव्यक्ति को प्रेरित करने में सक्षम हैं, क्योंकि ट्रम्प ने शुल्कों में कटौती को सीधे तौर पर मोदी के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों से जोड़ा है।
भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक लाभ
भारत के दृष्टिकोण से यह समझौता कई रणनीतिक और आर्थिक लाभ प्रदान करता है। आर्थिक रूप से, अमेरिकी शुल्कों में कमी भारतीय निर्यातकों को सीधे लाभ पहुंचाती है, महत्वपूर्ण क्षेत्रों में रोजगार को बढ़ावा देती है और भारत के सबसे बड़े बाहरी बाजारों में उतार-चढ़ाव को कम करती है।
एक अधिक पारदर्शी और नियम-आधारित ढांचा संभावित रूप से आईटी सेवाओं, डिजिटल व्यापार और विनिर्माण क्षेत्रों में निवेशकों के लिए बेहतर पूर्वानुमान उपलब्ध कराता है। यह भारतीय कंपनियों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के उच्च-मूल्य वाले खंडों में शामिल कर सकता है और ऊर्जा, बुनियादी ढांचे तथा औद्योगिक गलियारों में निवेश आकर्षित कर सकता है।
रणनीतिक रूप से, भारत ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में लगातार इस बात पर जोर दिया है कि उसके निर्णय राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक स्वायत्तता की प्रतिबद्धता से प्रेरित हैं। कूटनीतिक रूप से, नरेंद्र मोदी की प्रतिक्रिया—जिसमें ‘मेड इन इंडिया’ उत्पादों पर कम टैरिफ का समर्थन शामिल है, जबकि रूसी तेल खरीद से जुड़े हर अमेरिकी दावे का सार्वजनिक समर्थन करने से परहेज किया गया नियंत्रित संदेश और मुद्दा-आधारित रणनीति को दर्शाती है। साथ ही भारत खुद को ऐसे भागीदार के रूप में स्थापित कर रहा है, जो एक क्षेत्र में सहयोग करते हुए अन्य क्षेत्रों में अपनी स्वायत्तता बनाए रख सकता है। यूरोपीय संघ, खाड़ी देशों और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ समानांतर बातचीत भारत की किसी एक गुट पर अत्यधिक निर्भरता को कम करती है।
ओवरलैपिंग व्यापार और रणनीतिक प्रतिबद्धताओं के इस जटिल होते जाल का प्रभावी प्रबंधन भारत को केवल पुनः सरेखण नहीं, बल्कि वास्तविक रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने में सक्षम बनाता है। भारत ने दंडात्मक शुल्कों और ऊर्जा दबावों से भरे एक चुनौतीपूर्ण सौदेबाजी माहौल को एक संतुलित और अच्छी तरह से बातचीत किए गए समझौते में बदल दिया है, जो उसकी बहु-संरेखण विदेश नीति के अनुरूप है। संकल्प की शक्ति कैसे कूटनीतिक सफलता में बदलती है, यह भारत ने इस सप्ताह पूरी दुनिया को दिखा दिया है।