कांग्रेस के चरित्र व नीतियों पर उठते सवाल

अपनी विचारधारा को लेकर कांग्रेस गंभीर सवालों के घेरे में है।

Update: 2026-02-07 09:22 GMT

संसद के बजट सत्र की चर्चा में जिस तरह से कांग्रेस विरोध का रवैया अपना रही है, उससे उसी की बदनामी हो रही है। लोकसभा में जिस तरह से राष्ट्रपति के धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री को बोलने से रोका गया, उससे न केवल संवैधानिक परंपराएं तार-तार हुईं, बल्कि कांग्रेस की विचारधारा को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। अपनी विचारधारा को लेकर कांग्रेस गंभीर सवालों के घेरे में है।

राजनीति में राजनीतिक दलों का एक-दूसरे के प्रति विरोध समझ में आता है, लेकिन क्या विरोध के नाम पर देश को अस्थिर करना सही है? सभापति ने जो खुलासा किया है, उससे तो कांग्रेस के चरित्र और उसकी नीतियों पर भी सवाल उठने लगे हैं। सभापति का कहना है कि उन्हें जानकारी मिली थी कि कांग्रेस सांसद प्रधानमंत्री के साथ ‘मिसहैप’ (कोई अप्रिय घटना) करने की फिराक में थे।

सभापति ने खुद अपनी आंखों से सांसदों को प्रधानमंत्री की कुर्सी की ओर हिंसक तरीके से बढ़ते देखा, जिसके बाद उन्होंने सुरक्षा के लिहाज से प्रधानमंत्री को सदन में न आने की सलाह दी। इससे साबित होता है कि क्या कांग्रेस का एजेंडा अब विदेशों से तय हो रहा है? क्या राहुल गांधी के इशारे पर प्रधानमंत्री को शारीरिक नुकसान पहुंचाने की साजिश रची जा रही है?

सभापति के इस खुलासे के बाद सोशल मीडिया से लेकर सत्ता के गलियारों तक एक ही चर्चा है कि क्या राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस अब ‘अर्बन नक्सलियों’ का नया अड्डा बन चुकी है? राहुल गांधी के हालिया बयानों और कांग्रेस की नई रणनीतियों ने जनता के मन में यह खौफ पैदा कर दिया है कि क्या सत्ता की लालच में देश को गृहयुद्ध की ओर धकेला जा रहा है?

कांग्रेस का नैरेटिव किस तरह देशविरोधी ताकतों से मेल खा रहा है, यह सवाल भी खड़ा हो रहा है। प्रधानमंत्री को सदन में बोलने से रोकना लोकतंत्र नहीं, बल्कि अराजकता है। अर्बन नक्सल का पहला काम होता है देश की संवैधानिक संस्थाओं से जनता का भरोसा उठाना। राहुल गांधी आज वही कर रहे हैं। कभी चुनाव आयोग, कभी सुप्रीम कोर्ट, तो कभी भारतीय सेना पर सवाल उठाकर वे सिस्टम को पंगु बनाना चाहते हैं। यह वही अराजकता की थ्योरी है, जो नक्सली जंगलों में इस्तेमाल करते हैं और अर्बन नक्सल शहरों में।

जानकारों का कहना है कि जब कोई राष्ट्रीय नेता विदेशी धरती पर जाकर भारत की छवि खराब करता है, तो वह सीधे तौर पर उसी नक्सली विचारधारा को बढ़ावा देता है। राहुल गांधी की ‘बांटो और राज करो’ वाली नीति का असली चेहरा अब बेनकाब हो रहा है। महिला सांसदों को ढाल बनाकर प्रधानमंत्री पर हमला करने की कोशिश? क्या कांग्रेस अब प्रोफेशनल नक्सलियों की तरह ट्रेनिंग ले रही है? राहुल गांधी के सुर अचानक विदेशों में जाकर क्यों बदल जाते हैं? क्या भारत की अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाने के लिए किसी ‘इंटरनेशनल टूलकिट’ का इस्तेमाल हो रहा है?

अडानी-हिंडनबर्ग जैसे मुद्दों पर देश में आग लगाने की कोशिश करना इसी बड़ी साजिश का हिस्सा लगता है। जनता अब जागरूक हो चुकी है। राहुल गांधी जिसे ‘मोहब्बत की दुकान’ कहते हैं, आलोचक उसे अर्बन नक्सलवाद का शोरूम बता रहे हैं। जाति के नाम पर समाज को तोड़ना और माओवादी भाषा का इस्तेमाल करना सीधे तौर पर देश की अखंडता के लिए खतरा है। यह लड़ाई अब सिर्फ दो पार्टियों की नहीं, बल्कि भारत की एकता बनाम ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ की है।

दरअसल विपक्ष की यह बौखलाहट इसलिए है क्योंकि वे इस बात को पचा नहीं पा रहे हैं कि एक गरीब का बेटा इतने लंबे समय से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर कैसे बैठा है। कांग्रेस यह बयानबाजी इसलिए कर रही है क्योंकि गांधी परिवार को लगता है कि प्रधानमंत्री की कुर्सी उनकी पारिवारिक संपत्ति है। कांग्रेस ने दशकों तक सिर्फ ‘गरीबी हटाओ’ का खोखला नारा दिया, लेकिन केंद्र की मोदी सरकार ने पिछले 10 वर्षों में 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है। करोड़ों गरीबों को पक्के घर, गैस, पानी और शौचालय की सुविधा दी गई है।

कांग्रेस के समय चहेतों को लोन मिलते थे, जिससे एनपीए का पहाड़ खड़ा हो गया था। आज बैंकिंग सेक्टर स्वस्थ है और एनपीए एक प्रतिशत से भी कम है। बहरहाल, कांग्रेस को मोदी सरकार के खिलाफ अनर्गल प्रलाप बंद करना होगा, अन्यथा आज जो कांग्रेस की दुर्गति हो रही है, उससे कहीं अधिक दुर्गति आने वाले समय में होगी।

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