हम जाति-वर्ग विहीन, समतापूर्वक समाज की कल्पना करते हैं, पर व्यवहार में जातिगत पहचान को और गाढ़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। जहां कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी ‘जितनी आबादी, उतना हक’ की बात करते हैं, वहीं ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ (यूजीसी) ‘समता विनियम 2026’ के रूप में ऐसे नियम लेकर आता है, जिससे जातिगत वैमनस्य बढ़ने की संभावना प्रबल होती है। भारत में जाति एक सच है, परंतु जातिगत विद्वेष भारतीय परंपरा का हिस्सा नहीं है। इसका बीजारोपण पांच सहस्ताब्दी पहले तब हुआ, जब यूरोपीय आक्रांताओं और ईसाई मिशनरियों ने भारत में अपनी जड़ें जमाना प्रारंभ किया।
यह निर्विवाद सत्य है कि हिंदू समाज में सदियों तक अस्पृश्यता जैसी सामाजिक विकृति विद्यमान रही। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि इसे समाप्त करने हेतु समाज के भीतर से निरंतर सुधार आंदोलनों की आवाजें उठती रहीं। सिख गुरुओं से लेकर स्वामी विवेकानंद, दयानंद सरस्वती, स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती, गांधीजी, वीर सावरकर, डॉ. अंबेडकर और डॉ. हेडगेवार आदि ने अस्पृश्यता रूपी सामाजिक व्याधि के विरुद्ध सफलतापूर्वक आंदोलन चलाए। यह परिवर्तन किसी बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना से संभव हुआ। इन्हीं सतत प्रयासों का परिणाम है कि स्वतंत्र भारत ने आरक्षण व्यवस्था को स्वीकार किया और बौद्धिक जगत में आज अस्पृश्यता के पक्ष में कोई वैचारिक समर्थन शेष नहीं है। यह परिवर्तन इसलिए भी संभव हो सका, क्योंकि इन कुरीतियों का कोई वेद-शास्त्रीय आधार नहीं है।
भारत को अनेक खांचों में विभाजित करने की प्रवृत्ति बाहरी शक्तियों की दीर्घकालिक रणनीति रही है। इसी का एक रूप हिंदू समाज, विशेषकर सवर्णों (ब्राह्मण सहित), के दानवीकरण की सुनियोजित रणनीति है, जिसका उद्देश्य समाज के वैचारिक और सांस्कृतिक नेतृत्व को संदेह के घेरे में लाकर हिंदू चेतना और स्वाभिमान को समाप्त करना था। इन साजिशों की जड़ें सोलहवीं शताब्दी तक जाती हैं। दक्षिण भारत में जेसुइट मिशनरी फ्रांसिस जेवियर ने अपने पत्राचार में ब्राह्मणों को ईसाई मतांतरण के मार्ग की मुख्य बाधा बताया था। इसके उपरांत ‘गोवा इनक्विजिशन’ का कठोर अध्याय प्रारंभ हुआ, जहां मजहबी असहमति को अपराध की दृष्टि से देखा गया। बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर ने भी इस कालखंड की क्रूरता का संज्ञान लिया था।
फिर 18वीं शताब्दी में प्लासी के युद्ध के पश्चात अंग्रेजों ने मजहबी और शैक्षिक हस्तक्षेप के माध्यम से मतांतरण और ब्राह्मण-विरोध को संस्थागत रूप दिया। वर्ष 1813 के चार्टर एक्ट के साथ मिशनरी गतिविधियों को वैधानिक संरक्षण मिला।
इसी चिंतन के संगठित प्रतिपादन हेतु लॉर्ड मैकॉले ने 1835 में शिक्षा नीति का खाका प्रस्तुत किया, जिसका स्पष्ट उद्देश्य उनके निजी पत्राचार में मिलता है। उन्होंने 1836 में अपने पिता को लिखा था, “यदि हमारी शिक्षा नीति सफल रही, तो तीस वर्षों के भीतर बंगाल में एक भी मूर्तिपूजक नहीं बचेगा।” इसी कालखंड में यूरोपीय विद्वान फ्रेडरिक मैक्समूलर ने वेदों, उपनिषदों और अन्य संस्कृत ग्रंथों का दुर्भावनापूर्ण अंग्रेजी अनुवाद किया। इसकी मंशा का उल्लेख मैक्समूलर ने अपनी पत्नी को 1867 में लिखे पत्र में किया था “मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे द्वारा तैयार किया गया अनुवाद भविष्य में भारत के भाग्य पर गहरा प्रभाव डालेगा। पिछले तीन हजार वर्षों में उससे जो कुछ भी उत्पन्न हुआ है, उसे जड़ से उखाड़ फेंकने का यही एकमात्र उपाय है।” ऐसे पत्रों की भरमार है। कालांतर में इसी मानसिकता के गर्भ से ‘आर्य आक्रमण सिद्धांत’ का जन्म, ‘जस्टिस पार्टी’ का गठन और ‘द्रविड़ आंदोलन’ का उदय हुआ।
अस्पृश्यता निस्संदेह एक गंभीर अपराध है, किंतु इसे केवल कथित रूप से ब्राह्मणों की देन बताना इतिहास की बहुस्तरीयता को नकारना है। प्रायः इस संदर्भ में ‘मनुस्मृति’ को लांछित किया जाता है। पहली बात, मनु स्वयं ब्राह्मण नहीं थे और दूसरी बात यह कि हिंदू परंपरा किसी एक ग्रंथ, एक पैगंबर या संहिताबद्ध सिद्धांत से बंधी नहीं है। इसकी विशेषता निरंतर परिवर्तन और आत्मसमीक्षा है। डॉ. अंबेडकर के अनुसार, “मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि मनु ने जाति कानून नहीं बनाया… यह वर्ण-व्यवस्था मनु से बहुत पहले से अस्तित्व में थी।” उन्होंने इसके लिए ब्राह्मणों को दोषी नहीं ठहराते हुए लिखा, “ब्राह्मण कई दूसरे विषयों के दोषी हो सकते हैं, किंतु गैर-ब्राह्मण आबादी को जाति व्यवस्था में बांधना उनके स्वभाव के प्रतिकूल था।” यही नहीं, डॉ. अंबेडकर ‘आर्य आक्रमणकारी सिद्धांत’ को ब्रिटिशों की मनगढ़ंत कहानी तक बता चुके थे।
बाबासाहेब ने यह भी स्पष्ट किया था, “शूद्र सूर्यवंशी आर्य समुदायों में से एक थे। एक समय ऐसा था, जब आर्य समाज केवल तीन वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को ही मान्यता देता था। शूद्र कोई पृथक वर्ण नहीं थे, वे क्षत्रिय वर्ण का ही अंग माने जाते थे। शूद्र राजाओं और ब्राह्मणों के बीच निरंतर संघर्ष चलता रहता था, जिसमें ब्राह्मणों को अनेक अत्याचारों और अपमानों का सामना करना पड़ा।” डॉ. अंबेडकर आगे लिखते हैं, “शूद्रों द्वारा किए गए अत्याचारों और उत्पीड़नों से अपमानित ब्राह्मणों ने शूद्रों का उपनयन (जनेऊ संस्कार) करना अस्वीकार कर दिया। इससे वंचित किए जाने के कारण, जो शूद्र मूलतः क्षत्रिय थे, वे सामाजिक रूप से बहिष्कृत हो गए, वैश्य वर्ण से भी नीचे चले गए और इस प्रकार चौथे वर्ण के रूप में स्थापित हो गए।”
यह जाति-प्रथा की विकृति का ही परिणाम है कि यदुकुल में जन्मे और भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण वर्तमान नैरेटिव में ओबीसी कहलाएंगे, जिनकी उपासना अनादिकाल से असंख्य हिंदू करते आ रहे हैं। वेदों और महाभारत का संकलन करने वाले कृष्णद्वैपायन महर्षि वेदव्यास का जन्म मछुआरिन सत्यवती की कोख से हुआ था। ‘श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण’ के रचयिता आदिकवि महर्षि वाल्मीकि के नाम पर अलंकृत समुदाय आज दलित के रूप में वर्गीकृत है। साथ ही रामायण के सबसे कष्टमय काल में श्रीराम ने जिन लोगों हनुमानजी, सुग्रीव, केवट, निषाद, भील आदि को अपना सहयोगी और सलाहकार बनाया, उन्हें आज की भाषा में वनवासी, आदिवासी, पिछड़ा या अति-पिछड़ा कहा जाएगा।
‘सामाजिक न्याय’ अनिवार्य है और प्रत्येक व्यक्ति को समान अवसर प्राप्त होने चाहिए। किंतु ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर हिंदू समाज को जातियों के आधार पर विभाजित करना और वैमनस्य को बढ़ावा देना अंततः किसके हित में होगा? यदि भारत आने वाले वर्षों में औपनिवेशिक नैरेटिव से मुक्त नहीं हो पाता, तो क्या वह वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य साकार कर सकेगा?