विश्व संगीत दिवस पर जानिए भारतीय शास्त्रीय संगीत की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विशेषताएं। क्यों इसे केवल कला नहीं बल्कि आत्मा की भाषा माना जाता है।
(अनुराग तागड़े)
मानव सभ्यता के इतिहास में कुछ ऐसी धरोहरें हैं जिनका मूल्य समय की कसौटी पर नहीं आंका जा सकता। वे न तो किसी युग विशेष की देन होती हैं और न ही किसी भौगोलिक सीमा में बंधी रहती हैं। वे मानव चेतना की सामूहिक उपलब्धियां होती हैं, जो काल के प्रवाह में और अधिक प्रासंगिक होती चली जाती हैं। संगीत ऐसी ही एक अनमोल धरोहर है। यदि साहित्य विचारों की अभिव्यक्ति है, चित्रकला कल्पना की अभिव्यक्ति है और स्थापत्य संस्कृति की अभिव्यक्ति है, तो संगीत स्वयं जीवन की अभिव्यक्ति है।
विश्व संगीत दिवस केवल कलाकारों का उत्सव नहीं है, बल्कि उस अदृश्य शक्ति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का अवसर है जिसने मानव जीवन को संवेदना, करुणा, सौंदर्य और आध्यात्मिकता से संपन्न बनाया है। आज जब पूरी दुनिया तीव्र तकनीकी परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आभासी संसार और उपभोक्तावादी जीवनशैली के दौर से गुजर रही है, तब संगीत की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। जितनी तेजी से मनुष्य बाहर की दुनिया में विस्तार कर रहा है, उतनी ही तेजी से वह अपने भीतर के संसार से दूर होता जा रहा है। ऐसे समय में संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मिक संतुलन की आवश्यकता बन जाता है।
भारतीय दर्शन ने हजारों वर्ष पूर्व एक अत्यंत गहन उद्घोष किया था "नाद ब्रह्म"। यह केवल धार्मिक अथवा आध्यात्मिक वाक्य नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के स्वरूप को समझने का एक वैज्ञानिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक प्रयास है। आधुनिक विज्ञान भी आज यह स्वीकार करता है कि ब्रह्मांड का प्रत्येक कण निरंतर कंपनशील है। प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक ग्रह, प्रत्येक तारा और प्रत्येक जीव किसी न किसी स्तर पर स्पंदित हो रहा है। भारतीय ऋषियों ने इस सत्य का अनुभव हजारों वर्ष पहले कर लिया था। उन्होंने कहा कि सम्पूर्ण सृष्टि मूलतः नादमय है। यही नाद जब चेतना को स्पर्श करता है तो संगीत का रूप धारण कर लेता है।
इसीलिए भारतीय परंपरा में संगीत को कभी मात्र मनोरंजन नहीं माना गया। यह साधना है, उपासना है और आत्मानुभूति का माध्यम है। भारतीय संगीत की यात्रा रंगमंच से नहीं, यज्ञशालाओं से प्रारंभ होती है। इसकी जड़ें सामवेद में हैं, जहां मंत्रों का गायन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था बल्कि चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाने की प्रक्रिया थी। यही कारण है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की आत्मा में आज भी अध्यात्म का स्पंदन स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है।
दुर्भाग्यवश आधुनिक समय में भारतीय शास्त्रीय संगीत को लेकर अनेक भ्रांतियां और पूर्वाग्रह निर्मित हो गए हैं। कुछ लोग इसे कठिन मानते हैं, कुछ इसे केवल अभिजात वर्ग का संगीत समझते हैं, जबकि कुछ लोग इसे आधुनिक जीवन से असंगत मान लेते हैं। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि यह हमारे सांस्कृतिक विमुखीकरण का संकेत है। वस्तुतः भारतीय शास्त्रीय संगीत को समझने के लिए संगीतज्ञ होना आवश्यक नहीं है। संगीत का आनंद ज्ञान से नहीं, संवेदना से प्राप्त होता है।
जब कोई शिशु अपनी माता की लोरी सुनकर शांत हो जाता है, तब वह संगीतशास्त्र नहीं समझ रहा होता। जब किसी सैनिक की आंखों में राष्ट्रगीत सुनकर आंसू आ जाते हैं, तब वह राग-विन्यास का विश्लेषण नहीं कर रहा होता। जब किसी वृद्ध व्यक्ति को दशकों पुराना कोई गीत सुनकर अपने जीवन की स्मृतियां लौट आती हैं, तब वह संगीत की तकनीक नहीं, उसके भावलोक को अनुभव कर रहा होता है। यही संगीत की वास्तविक शक्ति है। वह बुद्धि के दरवाजे से नहीं, हृदय के द्वार से प्रवेश करता है।
मानव मन की संरचना जितनी जटिल है, संगीत का प्रभाव उतना ही रहस्यमय है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि मनुष्य के अवचेतन में असंख्य स्मृतियां, अनुभूतियां और भावनाएं संग्रहित रहती हैं। संगीत इन गहन परतों तक पहुंचने की क्षमता रखता है। कई बार कोई धुन हमें अचानक वर्षों पीछे ले जाती है। कोई राग हमारे भीतर अनाम शांति का अनुभव जगाता है। कोई भजन हमारे भीतर श्रद्धा का संचार करता है और कोई लोकगीत हमें अपनी मिट्टी से जोड़ देता है। यह संगीत का जादू नहीं, बल्कि मन और सुरों के मध्य स्थापित वह सनातन संबंध है जिसकी व्याख्या केवल तर्क से नहीं की जा सकती।
भारतीय शास्त्रीय संगीत की सबसे बड़ी विशेषता उसकी गहराई है। यहां प्रत्येक राग केवल स्वरों का समूह नहीं, बल्कि एक जीवंत भावलोक है। प्रत्येक राग का अपना व्यक्तित्व है, अपना समय है, अपनी प्रकृति है और अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा है। प्रातःकालीन भैरव का गंभीर वैराग्य, यमन की दिव्य निर्मलता, दरबारी कान्हड़ा की गहनता, बागेश्री की कोमल करुणा और मालकौंस की ध्यानमय गंभीरता केवल संगीतात्मक संरचनाएं नहीं हैं, बल्कि मानव मन की विभिन्न अवस्थाओं की कलात्मक अभिव्यक्तियां हैं। यही कारण है कि भारतीय संगीत में समय का सिद्धांत विकसित हुआ। यह केवल परंपरा नहीं बल्कि मनोविज्ञान है। प्रकृति, मानव शरीर और चेतना के मध्य एक सूक्ष्म सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास है। संसार की बहुत कम संगीत परंपराओं में यह गहराई दिखाई देती है।यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि क्या भारतीय शास्त्रीय संगीत का भविष्य सुरक्षित है? क्या युवा पीढ़ी इसे अपनाएगी? क्या इलेक्ट्रॉनिक बीट्स, रील संस्कृति और त्वरित मनोरंजन के युग में इसकी प्रासंगिकता बनी रहेगी?
वास्तव में यह प्रश्न भारतीय शास्त्रीय संगीत से अधिक हमारी सांस्कृतिक दृष्टि पर प्रश्नचिह्न लगाता है। कोई भी परंपरा केवल इसलिए जीवित नहीं रहती कि उसे संस्थागत संरक्षण प्राप्त है। वह इसलिए जीवित रहती है क्योंकि उसमें मानव जीवन की किसी मूलभूत आवश्यकता का समाधान निहित होता है। भारतीय शास्त्रीय संगीत हजारों वर्षों से इसलिए जीवित है क्योंकि वह मनुष्य की आंतरिक शांति, सौंदर्यबोध और आत्मिक संतुलन की आवश्यकता को पूरा करता है।आज पूरी दुनिया में योग, ध्यान और माइंडफुलनेस के प्रति बढ़ती रुचि इसका प्रमाण है कि आधुनिक मनुष्य केवल भौतिक उपलब्धियों से संतुष्ट नहीं है। वह अपने भीतर लौटना चाहता है। वह मानसिक शांति चाहता है। वह स्वयं से जुड़ना चाहता है। और इस यात्रा में भारतीय संगीत एक महत्वपूर्ण सहयात्री बनकर उभर रहा है।
यह उल्लेखनीय है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत को वैश्विक मंच तक पहुंचाने वाले महान कलाकारों पंडित रविशंकर, उस्ताद अली अकबर खां, पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, उस्ताद जाकिर हुसैन और अनेक अन्य विभूतियों ने केवल संगीत प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक चेतना को विश्व के सामने रखा। आज यूरोप, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया में हजारों विद्यार्थी भारतीय संगीत की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। यह केवल कला के प्रति आकर्षण नहीं, बल्कि उस गहराई के प्रति सम्मान है जो भारतीय संगीत में निहित है।यह भी समझना आवश्यक है कि संगीत को लेकर श्रेष्ठ और निकृष्ट की बहस निरर्थक है। संगीत का उद्देश्य विभाजन नहीं, समन्वय है। कोई लोकगीत हमें भीतर तक छू सकता है, कोई फिल्मी गीत जीवन का साथी बन सकता है, कोई ग़ज़ल संवेदनाओं को स्वर दे सकती है और कोई शास्त्रीय राग आत्मा को शांति प्रदान कर सकता है।
संगीत का मूल्य उसकी शैली में नहीं, उसके प्रभाव में निहित है।विश्व संगीत दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि संगीत मानवता की साझा धरोहर है। यह वह भाषा है जिसे समझने के लिए अनुवाद की आवश्यकता नहीं होती। यह वह शक्ति है जो टूटे हुए मन को सहारा देती है, व्याकुल चेतना को संतुलन देती है और मनुष्य को उसकी मूल संवेदनशीलता से पुनः जोड़ती है।
भारतीय शास्त्रीय संगीत इस वैश्विक विरासत का वह शिखर है जहां कला, दर्शन, अध्यात्म और मनोविज्ञान का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यह केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता है। जिस संसार में शोर बढ़ता जाएगा, वहां शांति की खोज भी बढ़ेगी। जिस समाज में गति बढ़ेगी, वहां ठहराव की आवश्यकता भी बढ़ेगी। और जहां ठहराव की आवश्यकता होगी, वहां भारतीय शास्त्रीय संगीत अपनी समस्त गरिमा और प्रासंगिकता के साथ उपस्थित रहेगा। संगीत कोई बाहरी घटना नहीं है। वह मनुष्य के भीतर स्थित दिव्यता का जागरण है। वह आत्मा का वह स्पंदन है जो कभी समाप्त नहीं होता। सुर नश्वर नहीं होते, वे समय से परे होते हैं। वे उसी अनंत चेतना के अंश हैं जिससे यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड निर्मित हुआ है।शायद इसी कारण भारतीय परंपरा ने संगीत को कला नहीं, साधना कहा। क्योंकि जहां शब्द समाप्त हो जाते हैं, वहां से सुरों की यात्रा प्रारंभ होती है; और जहां सुरों की यात्रा समाप्त होती है, वहीं से परम सत्य का साक्षात्कार आरंभ होता है।