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Odisha Bank Skeleton Case: What Happened?

ओडिशा में बहन का कंकाल लेकर बैंक पहुंचा भाई, जाने क्या है पूरा मामला

ओडिशा के क्योंझर में एक आदिवासी युवक बहन का कंकाल लेकर बैंक पहुंच गया। पैसे निकालने में आई दिक्कत ने उठाए सिस्टम पर सवाल, जानिए पूरा मामला।


ओडिशा में बहन का कंकाल लेकर बैंक पहुंचा भाई जाने क्या है पूरा मामला 

ओडिशा के क्योंझर जिले से एक चौंकाने वाली और संवेदनशील घटना सामने आई है, जिसने सरकारी सिस्टम और बैंकिंग प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक आदिवासी युवक अपनी मृत बहन का कंकाल कंधे पर रखकर बैंक पहुंच गया।बताया जा रहा है कि युवक कई दिनों से बैंक के चक्कर लगा रहा था, लेकिन उसे पैसे निकालने की प्रक्रिया नहीं समझाई गई। मजबूरी में उसने अपनी बहन का कंकाल कब्र से निकालकर बैंक में पेश कर दिया।

3 किमी तक कंधे पर कंकाल लेकर चला भाई

यह मामला क्योंझर के मल्लिपसी स्थित ओडिशा ग्रामीण बैंक शाखा का है। डियानाली गांव का रहने वाला जीतू मुंडा अपनी बहन कालरा मुंडा का कंकाल कंधे पर रखकर करीब 3 किलोमीटर पैदल चला।बैंक पहुंचकर उसने कंकाल को बरामदे में रख दिया। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद लोग और कर्मचारी हैरान रह गए और तुरंत अफरा-तफरी मच गई।

बैंक कर्मचारियों ने कहा था-खाता धारक को लाओ

जानकारी के मुताबिक, जीतू मुंडा अपनी बहन के खाते से 20 हजार रुपए निकालना चाहता था। वह पहले भी कई बार बैंक गया था और बहन की मौत की जानकारी दे चुका था।इसके बावजूद बैंक कर्मचारियों ने उसे बार-बार खाता धारक को साथ लाने के लिए कहा। कानूनी प्रक्रिया की जानकारी न होने के कारण वह इस शर्त को समझ नहीं पाया और आखिरकार यह कदम उठा लिया।

पुलिस ने मदद का दिया भरोसा

कंकाल देखकर बैंक कर्मचारियों ने तुरंत पुलिस को सूचना दी। पुलिस मौके पर पहुंची और पूरे मामले को संभाला।जांच के दौरान सामने आया कि जीतू मुंडा अनपढ़ है और उसे नॉमिनी या कानूनी वारिस जैसी प्रक्रियाओं की जानकारी नहीं थी। अधिकारियों ने उसे नियम समझाए और आश्वासन दिया कि उसके पैसे दिलाने में मदद की जाएगी।इसके बाद पुलिस की मौजूदगी में कंकाल को दोबारा कब्रिस्तान में दफना दिया गया।

क्यों चाहिए थे पैसे?

जीतू मुंडा की बहन कालरा मुंडा की मौत 26 जनवरी 2026 को हो गई थी। उसके खाते में जमा राशि ही परिवार के लिए एकमात्र सहारा थी.बताया गया कि खाते में दर्ज नॉमिनी पति और बेटे की भी पहले ही मौत हो चुकी है। ऐसे में जीतू ही एकमात्र दावेदार बचा था। आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण यह 20 हजार रुपए उसके लिए बेहद जरूरी थे।

सिस्टम पर सवाल

यह घटना सिर्फ एक व्यक्तिगत मामला नहीं है, बल्कि यह बताती है कि ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में बैंकिंग जागरूकता और सिस्टम की संवेदनशीलता कितनी सीमित है।क्या बैंक कर्मचारियों को प्रक्रिया समझानी चाहिए थी?, क्या गरीब और अनपढ़ लोगों के लिए अलग सहायता तंत्र जरूरी है?,क्या ऐसी घटनाएं प्रशासनिक खामियों की ओर इशारा करती हैं?

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