छत्रपति संभाजी महाराज की पुण्यतिथि पर उनके जीवन, संघर्ष और मुगल साम्राज्य के खिलाफ लड़े गए युद्धों को याद किया जा रहा है।
डॉ. राघवेंद्र शर्मा
11 मार्च का वह पावन दिवस मात्र कैलेंडर की एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय स्वाभिमान के उस प्रखर सूर्य के महाप्रयाण का दिन है, जिसने अपने रक्त की अंतिम बूंद से राष्ट्र की अस्मिता को सींचा था। धर्मवीर छत्रपति संभाजी महाराज का जीवन उस धधकती ज्वाला के समान है, जिसने औरंगजेब के अहंकार को राख में मिला दिया और हिंदवी साम्राज्य की नींव को वज्र जैसी अडिगता प्रदान की।शिवाजी महाराज के स्वर्गारोहण के पश्चात जब चारों ओर से संकट के बादल मंडरा रहे थे और मुगलिया सल्तनत की गिद्ध जैसी दृष्टि दक्षिण भारत को निगलने के लिए आतुर थी, तब शंभू राजा ने उस प्रलयंकारी तूफान के विरुद्ध अकेले खड़े होकर वह शौर्यगाथा लिखी, जिसे सुनकर आज भी कायरों की रूह कांप जाती है।
उनका संघर्ष केवल राज्य की सीमाओं को बचाने का नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा का महायज्ञ था। अपने नौ वर्षों के संक्षिप्त किंतु अत्यंत तेजस्वी शासनकाल में उन्होंने मुगलों, सिद्दियों, पुर्तगालियों और अंग्रेजों जैसे शत्रुओं को एक साथ धूल चटाकर यह सिद्ध कर दिया कि शेर का शावक कभी झुकना नहीं जानता।संभाजी महाराज का जीवन प्रतिकूलताओं की उस कसौटी पर कसा गया था, जहां साधारण मनुष्य टूट जाता है, परंतु वे निखरकर कुंदन बन गए। एक ओर औरंगजेब अपनी पूरी शक्ति, अपार धन और विशाल सेना के साथ दक्षिण को रौंदने आया था, तो दूसरी ओर स्वराज के भीतर छिपे गद्दारों और षड्यंत्रकारियों का जाल बिछा हुआ था।उन्हें अपनों के विश्वासघात और शत्रुओं के क्रूर आक्रमणों के बीच एक साथ युद्ध लड़ना पड़ा। आर्थिक तंगी, किलों की घेराबंदी और निरंतर सैन्य अभियानों के बावजूद उन्होंने एक भी किला मुगलों के हाथ नहीं लगने दिया।
संभाजी महाराज ने युद्ध के मैदान में बिजली की गति से प्रहार किया और मुगलों की रसद काट दी, जिससे औरंगजेब जैसा क्रूर शासक भी वर्षों तक भटकने के लिए विवश हो गया।उनके जीवन का अंतिम अध्याय तो मनुष्यता के इतिहास में वीरता की पराकाष्ठा है। जब संगमेश्वर में विश्वासघात के कारण वे पकड़े गए, तो औरंगजेब ने उन्हें अपमानित करने और धर्म परिवर्तन कराने के लिए अमानवीय प्रताड़नाओं का सहारा लिया। उनकी आंखें निकाल ली गईं, जीभ काट दी गई और खाल तक उधेड़ दी गई, किंतु उस महामानव के मुख से केवल ‘नमो नमः शिवाय’ और स्वधर्म के प्रति निष्ठा ही प्रकट हुई।उन्होंने मृत्यु को तो गले लगाया, लेकिन अपने स्वाभिमान और पूर्वजों के धर्म को आंच नहीं आने दी। उनकी शहादत ने पूरे महाराष्ट्र में वह ज्वाला प्रज्ज्वलित की, जिसने अंततः मुगल साम्राज्य के अंत की नींव रख दी।संभाजी महाराज ने भारतीय इतिहास के समक्ष वह आदर्श स्थापित किया, जो सिखाता है कि राष्ट्र के लिए बलिदान होना किसी पराजय का नाम नहीं, बल्कि अमरता का मार्ग है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि जब सिद्धांत और प्राणों के बीच चुनाव करना हो, तो सिद्धांतों के लिए प्राणों की आहुति देना ही श्रेष्ठ है।
उनके जीवन दर्शन से हमें यह सीख मिलती है कि शत्रु चाहे कितना भी बलवान क्यों न हो, यदि मन में दृढ़ निश्चय और धर्म के प्रति अटूट आस्था हो, तो उसे घुटने टेकने पर मजबूर किया जा सकता है। वे केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि संस्कृत के प्रकांड विद्वान और प्रजावत्सल शासक भी थे।