अनुराग तागड़े
दांबुला में भारत-ए और श्रीलंका-ए के बीच हुए रोमांचक मुकाबले के बाद जो घटनाएँ सामने आईं, उन्होंने भारतीय क्रिकेट जगत को सोचने पर मजबूर कर दिया है। मैच टाई हुआ, सुपर ओवर तक पहुँचा, अंपायरिंग पर सवाल उठे, खिलाड़ियों के बीच बहस हुई और अंततः युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी विवाद के केंद्र में आ गए।
लेकिन इस पूरे प्रकरण को केवल "विवाद" या "अनुशासनहीनता" के चश्मे से देखना शायद सबसे बड़ी भूल होगी।हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस खिलाड़ी पर आज पूरा देश चर्चा कर रहा है, उसकी उम्र केवल 15 वर्ष है। जिस उम्र में अधिकांश बच्चे स्कूल क्रिकेट खेल रहे होते हैं, उस उम्र में वैभव अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों के खिलाफ भारत-ए की जर्सी पहनकर खेल रहे हैं।भारत को खिलाड़ी नहीं, भविष्य का चेहरा दिखाई दे रहा है
भारतीय क्रिकेट में प्रतिभा की कभी कमी नहीं रही।
हर साल हजारों खिलाड़ी रणजी, अंडर-19 और आईपीएल तक पहुँचने का सपना देखते हैं। लेकिन उनमें से बहुत कम खिलाड़ी ऐसे होते हैं जिनके बारे में विशेषज्ञ कहते हैं कि "यह लड़का भारतीय क्रिकेट का भविष्य बदल सकता है।"वैभव उन्हीं चुनिंदा खिलाड़ियों में से एक हैं।कम उम्र में आईपीएल में धमाकेदार बल्लेबाजी, अंडर-19 स्तर पर रिकॉर्ड प्रदर्शन और विपक्षी गेंदबाजों पर उनका निडर हमला यह दिखाता है कि उनके पास असाधारण क्षमता है। क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना है कि उनके शॉट चयन, बैट स्पीड और मानसिक साहस उनकी उम्र के खिलाड़ियों से कई वर्ष आगे हैं।लेकिन इतिहास गवाह है कि केवल प्रतिभा कभी महानता की गारंटी नहीं देती।
भारतीय क्रिकेट के इतिहास से सीखभारतीय क्रिकेट में ऐसे कई खिलाड़ी आए जिनके पास असाधारण प्रतिभा थी।कुछ ने इतिहास बनाया।कुछ इतिहास बनते-बनते रह गए।अंतर केवल प्रतिभा का नहीं था, बल्कि मानसिक मजबूती, अनुशासन और सही मार्गदर्शन का था।जब 16 वर्ष की आयु में सचिन तेंदुलकर ने पाकिस्तान के खिलाफ पदार्पण किया था, तब उनके सामने वसीम अकरम, वकार यूनुस और इमरान खान जैसे गेंदबाज थे।उन पर भी उतना ही दबाव था जितना आज वैभव पर है।
लेकिन सचिन के आसपास एक ऐसी व्यवस्था थी जिसने उन्हें जमीन से जुड़े रहने दिया।कोच रमाकांत आचरेकर ने उन्हें सिखाया कि रन बनाने से बड़ा काम अच्छा इंसान बनना है।यही कारण है कि 24 वर्षों के करियर में सचिन कभी विवादों के लिए नहीं, बल्कि अपने खेल और विनम्रता के लिए याद किए गए।
राहुल द्रविड़ मॉडल क्यों जरूरी है?
अगर भारतीय क्रिकेट में किसी व्यक्ति ने युवा प्रतिभाओं को सबसे बेहतर ढंग से विकसित किया है तो वह राहुल द्रविड़ हैं।द्रविड़ ने केवल बल्लेबाजी नहीं सिखाई। उन्होंने खिलाड़ियों को सिखाया हार को स्वीकार करनादबाव में शांत रहनासफलता को सिर पर न चढ़ने देना सोशल मीडिया और बाहरी शोर से दूर रहना
टीम को स्वयं से ऊपर रखना।आज शुभमन गिल, ऋषभ पंत, यशस्वी जायसवाल और कई युवा खिलाड़ी जिस मानसिक मजबूती के साथ खेलते हैं, उसमें द्रविड़ की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। वैभव को भी इसी प्रकार के मार्गदर्शन की आवश्यकता है।
धोनी की सबसे बड़ी सीख
महेंद्र सिंह धोनी ने भारतीय क्रिकेट को एक अनमोल सिद्धांत दिया "भावनाओं से नहीं, निर्णयों से मैच जीते जाते हैं।" 2007 विश्व कप की आलोचना हो या 2011 विश्व कप का दबाव, धोनी ने कभी अपनी भावनाओं को सार्वजनिक रूप से अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया।
आज जब युवा खिलाड़ी सोशल मीडिया, कैमरों और करोड़ों दर्शकों की निगाहों में रहते हैं, तब धोनी जैसा संतुलन पहले से अधिक आवश्यक हो गया है। यदि वैभव को किसी चीज की सबसे ज्यादा जरूरत है तो वह तकनीक नहीं, बल्कि भावनात्मक नियंत्रण है।
दांबुला की घटना से क्या सीख मिलती है?मैच के दौरान अंपायरिंग को लेकर विवाद हुआ।सुपर ओवर कराने के निर्णय पर भी बहस हुई।
फिर मैच हारने के बाद खिलाड़ियों के बीच तीखी नोकझोंक हुई। रिपोर्टों के अनुसार कुछ टिप्पणियों के बाद मामला और गरम हो गया तथा खिलाड़ियों को बीच-बचाव करना पड़ा।यहाँ प्रश्न केवल इतना नहीं है कि गलती किसकी थी।प्रश्न यह है कि ऐसी स्थिति में 15 वर्षीय खिलाड़ी की प्रतिक्रिया कैसी होनी चाहिए?महान खिलाड़ी वही होता है जो उकसावे के बाद भी स्वयं पर नियंत्रण रखे।क्रिकेट में स्लेजिंग नई बात नहीं है।लेकिन जवाब शब्दों से नहीं, प्रदर्शन से दिया जाता है।
आंकड़ों की भाषा में दबाव
खेल मनोविज्ञान के अनेक अध्ययन बताते हैं कि किशोर खिलाड़ियों में भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ वरिष्ठ खिलाड़ियों की तुलना में अधिक तीव्र होती हैं।
कारण स्पष्ट है
मस्तिष्क का निर्णय लेने वाला भाग अभी विकसित हो रहा होता है।अचानक मिली प्रसिद्धि दबाव बढ़ाती है।सोशल मीडिया आलोचना और प्रशंसा दोनों को कई गुना बढ़ा देता है।अपेक्षाओं का बोझ आत्म-नियंत्रण को प्रभावित कर सकता है।वैभव इन सभी परिस्थितियों का सामना एक साथ कर रहे हैं।इसलिए केवल आलोचना पर्याप्त नहीं है।संरक्षण और मार्गदर्शन भी उतना ही आवश्यक है।
बीसीसीआई की जिम्मेदारी
इस घटना को एक चेतावनी के रूप में देखना चाहिए।
1. व्यक्तिगत मेंटर नियुक्त करना
हर बड़ी प्रतिभा के साथ एक वरिष्ठ क्रिकेटर जोड़ा जाना चाहिए।
2. स्पोर्ट्स साइकोलॉजिस्ट
जितना महत्व बल्लेबाजी कोच का है, उतना ही महत्व मानसिक प्रशिक्षक का भी होना चाहिए।
3. मीडिया एक्सपोजर नियंत्रित करना
बहुत अधिक प्रचार कई बार खिलाड़ी के विकास को प्रभावित कर सकता है।
4. दीर्घकालिक योजना
वैभव को अगले सचिन, अगले कोहली या अगले युवराज कहने की जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए।
उन्हें केवल वैभव सूर्यवंशी बनने दिया जाए।
सबसे बड़ा खतरा: जल्दबाजी
भारतीय क्रिकेट और मीडिया अक्सर युवा खिलाड़ियों को बहुत जल्दी सुपरस्टार बना देते हैं।एक शानदार पारी के बाद उन्हें महान घोषित कर दिया जाता है। एक गलती के बाद उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है।दोनों ही स्थितियाँ खतरनाक हैं।क्योंकि महान खिलाड़ी बनने की प्रक्रिया वर्षों में पूरी होती है, दिनों में नहीं।
हीरे को तराशना होगा
वैभव सूर्यवंशी की प्रतिभा पर कोई संदेह नहीं हैलेकिन आज भारतीय क्रिकेट के सामने चुनौती केवल एक महान बल्लेबाज बनाने की नहीं है। चुनौती एक महान व्यक्तित्व बनाने की है।सचिन की विनम्रता, द्रविड़ का धैर्य, धोनी का संतुलन और कोहली की प्रतिस्पर्धात्मक भावना यदि इन गुणों का सही मिश्रण वैभव के व्यक्तित्व में विकसित किया गया, तो आने वाले दशक में भारतीय क्रिकेट को एक ऐसा सितारा मिलेगा जो केवल रिकॉर्ड नहीं बनाएगा, बल्कि पीढ़ियों को प्रेरित करेगा।दांबुला की घटना को विवाद नहीं, एक सबक की तरह देखना चाहिए।क्योंकि कभी-कभी एक छोटी गलती ही महान खिलाड़ी के निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण शुरुआत बन जाती है।