पाकिस्तान के अधिकृत कश्मीर में उठती नई आवाजों ने प्रशासनिक अधिकार और स्वायत्तता के लिए जोरदार आंदोलन शुरू किया है, जिससे क्षेत्रीय विमर्श में बदलाव आया है।
अनुराग तागड़े
इतिहास में ऐसे क्षण आते हैं जब वास्तविकता, प्रचार से अधिक शक्तिशाली हो जाती है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में हाल के वर्षों में उभरते जनांदोलन ऐसे ही एक ऐतिहासिक परिवर्तन के संकेतक हैं। दशकों तक जिस कश्मीर प्रश्न को पाकिस्तान ने अपनी कूटनीति, राजनीति और सैन्य प्रतिष्ठान के अस्तित्व का आधार बनाया, आज उसी कश्मीर के एक हिस्से से उठ रही आवाजें उसके आधिकारिक आख्यान को चुनौती दे रही हैं।
भारत के लिए कश्मीर केवल भूगोल का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता, संवैधानिक अधिकार और ऐतिहासिक न्याय का प्रश्न है। यही कारण है कि 22 फरवरी 1994 को भारतीय संसद ने सर्वसम्मति से एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित कर स्पष्ट घोषणा की थी कि सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर, जिसमें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान भी सम्मिलित हैं, भारत का अभिन्न अंग हैं तथा पाकिस्तान को इन क्षेत्रों पर अपना अवैध कब्जा समाप्त करना चाहिए। यह प्रस्ताव किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र की सामूहिक राष्ट्रीय चेतना का प्रतिनिधित्व करता है।
विगत सात दशकों से पाकिस्तान विश्व समुदाय को यह विश्वास दिलाने का प्रयास करता रहा है कि वह कश्मीरियों के आत्मनिर्णय के अधिकार का सबसे बड़ा समर्थक है। किंतु आज पीओके की सड़कों पर जो स्वर सुनाई दे रहे हैं, वे इस दावे की वास्तविकता को उजागर कर रहे हैं। वर्ष 2024 और 2025 के दौरान पीओके में हुए व्यापक जनप्रदर्शनों ने केवल आर्थिक संकट, महंगाई और बिजली दरों के विरुद्ध असंतोष व्यक्त नहीं किया, बल्कि राजनीतिक अधिकारों, प्रशासनिक स्वायत्तता और स्थानीय संसाधनों पर स्वामित्व की मांग को भी मुखर किया। अनेक स्थानों पर प्रदर्शन इतने व्यापक हुए कि पाकिस्तान को सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती करनी पड़ी और हिंसक झड़पों की घटनाएँ भी सामने आईं।सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ये आंदोलन अब केवल रोटी, बिजली और पानी तक सीमित नहीं हैं। आंदोलनकारी संगठनों द्वारा पाकिस्तान की सैन्य भूमिका पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं। स्थानीय नेतृत्व यह पूछ रहा है कि यदि पाकिस्तान वास्तव में आत्मनिर्णय का समर्थक है, तो पीओके के नागरिकों को अपने भविष्य के संबंध में स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार क्यों नहीं है? वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों, जलविद्युत परियोजनाओं और प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर अंतिम नियंत्रण इस्लामाबाद और रावलपिंडी के हाथों में क्यों है?यही वह प्रश्न है जिसने पाकिस्तान के दशकों पुराने कश्मीर नैरेटिव की बुनियाद को हिला दिया है।
वास्तविकता यह है कि पीओके की संवैधानिक संरचना कभी भी पूर्ण स्वायत्त नहीं रही। रक्षा, विदेश नीति, संचार और अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर अंतिम अधिकार पाकिस्तान के पास रहा है। यही कारण है कि आज वहाँ की नई पीढ़ी केवल आर्थिक राहत नहीं, बल्कि सम्मानजनक राजनीतिक भागीदारी की मांग कर रही है। कुछ आंदोलनकारी नेताओं द्वारा भारत के साथ व्यापारिक संपर्कों और आर्थिक मार्गों की संभावनाओं का उल्लेख इस बात का संकेत है कि पीओके का विमर्श तेजी से बदल रहा है। यह परिवर्तन भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। पहली बार ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पीओके का प्रश्न केवल भारत और पाकिस्तान के बीच सीमित विवाद नहीं रह गया है, बल्कि वहाँ के निवासियों के अधिकारों और आकांक्षाओं का प्रश्न बनता जा रहा है। जब किसी क्षेत्र की जनता स्वयं यह पूछने लगे कि उसके नाम पर बोलने वाले उसके वास्तविक प्रतिनिधि हैं भी या नहीं, तब राजनीतिक आख्यानों की विश्वसनीयता स्वतः कमजोर होने लगती है।
इसी परिप्रेक्ष्य में पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की भूमिका का भी मूल्यांकन आवश्यक है। पाकिस्तान की राजनीति में सेना लंबे समय से वास्तविक शक्ति केंद्र रही है और कश्मीर नीति भी मुख्यतः सैन्य प्रतिष्ठान द्वारा संचालित होती रही है। किंतु आज पाकिस्तान अभूतपूर्व आर्थिक संकट, बढ़ते विदेशी ऋण, राजनीतिक अस्थिरता, आतंकवाद और सामाजिक असंतोष से जूझ रहा है। ऐसे समय में कश्मीर का पुराना भावनात्मक विमर्श जनता की वास्तविक समस्याओं को ढंकने में पहले जैसा प्रभावी नहीं दिखाई देता।
कुछ विश्लेषक यह तर्क देते हैं कि अमेरिकी राजनीति में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी और आसिम मुनीर के साथ उनके संभावित संबंध पाकिस्तान को कश्मीर प्रश्न पर नई कूटनीतिक ऊर्जा प्रदान कर सकते हैं। किंतु अंतरराष्ट्रीय राजनीति व्यक्तिगत संबंधों के बजाय राष्ट्रीय हितों से संचालित होती है। आज भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर है, वैश्विक निवेश का प्रमुख केंद्र है और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की रणनीतिक संरचना का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। अमेरिका सहित अधिकांश वैश्विक शक्तियों के लिए भारत का आर्थिक और सामरिक महत्व पाकिस्तान की तुलना में कहीं अधिक है। इसलिए केवल व्यक्तिगत समीकरणों के आधार पर कश्मीर प्रश्न पर पाकिस्तान को कोई असाधारण लाभ मिलने की संभावना अत्यंत सीमित है।
वास्तव में पाकिस्तान की सबसे बड़ी चुनौती आज नई दिल्ली नहीं, बल्कि मुजफ्फराबाद, मीरपुर और गिलगित से उठ रही वे आवाजें हैं जो अधिकार, सम्मान और स्वायत्तता की मांग कर रही हैं। इतिहास साक्षी है कि किसी भी राजनीतिक व्यवस्था की स्थिरता केवल प्रचार से नहीं, बल्कि जनस्वीकृति से सुनिश्चित होती है। जब जनता स्वयं प्रश्न पूछना प्रारंभ कर देती है, तब सबसे सुदृढ़ प्रतीत होने वाले आख्यान भी धीरे-धीरे ध्वस्त होने लगते हैं।भारत में करोड़ों नागरिकों के लिए पीओके केवल मानचित्र का एक भूभाग नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान का विषय है। यह भावना किसी विस्तारवादी महत्वाकांक्षा से नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक अन्याय को समाप्त करने की आकांक्षा से प्रेरित है जिसकी शुरुआत 1947 में पाकिस्तान समर्थित कबायली आक्रमण से हुई थी।आज पीओके की धरती से उठ रही आवाजें यह संकेत दे रही हैं कि इतिहास का पहिया एक नए मोड़ पर पहुँच चुका है। पाकिस्तान के लिए यह केवल राजनीतिक संकट नहीं, बल्कि वैचारिक संकट भी है। जिस भूमि को वह अपने कश्मीर नैरेटिव की सबसे बड़ी शक्ति मानता था, वहीं से अब उसके दावों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
संभव है कि आने वाले वर्षों में दक्षिण एशिया की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह न हो कि कश्मीर पर पाकिस्तान क्या कहता है, बल्कि यह हो कि पीओके की जनता स्वयं क्या चाहती है। और यदि इतिहास का यह प्रवाह इसी दिशा में आगे बढ़ता है, तो वह दिन दूर नहीं जब पाकिस्तान का कश्मीर आख्यान अपने ही अंतर्विरोधों के भार से ढहता हुआ दिखाई देकभी-कभी इतिहास युद्धभूमियों में नहीं, बल्कि जनचेतना में लिखा जाता है। पीओके में उठती आवाजें शायद उसी नए इतिहास की प्रस्तावना हैं।