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जीजाबाई का व्यक्तित्व और योगदान

राजमाता जीजाबाई : जीवन, व्यक्तित्व और राष्ट्रनिर्माण में योगदान

जीजाबाई का जीवन संघर्षों से भरा रहा। उन्होंने अपने परिवार और बेटे शिवाजी को स्वतंत्र राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित किया।


राजमाता जीजाबाई  जीवन व्यक्तित्व और राष्ट्रनिर्माण में योगदान

गिरीश जोशी

जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

जीजाबाई का जन्म लगभग 1598 ई. में सिंदखेड़ में हुआ था। उनके पिता लखुजी जाधवराव तत्कालीन दक्कन के प्रमुख मराठा सरदारों में गिने जाते थे। 17वीं शताब्दी का दक्कन राजनीतिक अस्थिरता से भरा हुआ था। मुगल साम्राज्य दक्षिण की ओर विस्तार कर रहा था। लखुजी जाधवराव निजामशाह के विश्वसनीय सरदार थे। जीजाबाई का विवाह शाहजी राजे के साथ हुआ।सन 1629 में निजामशाह ने राजद्रोह के संदेह में लखुजी जाधवराव तथा उनके तीन पुत्रों अचलोजी, रघुजी और यशवंतराव—की हत्या करवा दी। इस घटना से पूरा हिंदुस्तान दहल उठा। शाहजी राजे भी इससे अत्यंत उद्वेलित हुए और उन्होंने निजामशाह की सेवा छोड़कर विद्रोह का मार्ग अपना लिया।

जीजाबाई ने अपने जीवन में सत्ता संघर्ष, विश्वासघात, युद्ध और पारिवारिक त्रासदियों को निकट से देखा। उनके पिता लखुजी जाधव की हत्या ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला। इसी अनुभव ने उनमें स्वतंत्र राज्य की आवश्यकता का भाव और अधिक प्रबल किया। उस समय जब स्वराज स्थापित करने का विचार भी बहुत कम लोगों के मन में आता था, तब शाहजी राजे और जीजामाता ने स्वराज का स्वप्न देखा। इस स्वराज के निर्माण के लिए उन्होंने अपना जीवन दांव पर लगाकर प्रयास भी किए।

मालोजी राजे के समय से ही पुणे की जागीर उनके पास थी। शाहजी राजे की बड़ी-बड़ी हवेलियाँ पुणे में थीं। शाहजी राजे ने पुणे और उसके आसपास के क्षेत्र को अपने आधिपत्य में लेकर स्वतंत्र करने का प्रयास किया, लेकिन उनका यह विद्रोह अधिक समय तक टिक नहीं सका। आदिलशाह ने शाहजी राजे की हवेलियाँ जलाकर राख कर दीं और उनके अनेक लोगों का वध कर पुणे को वीरान बना दिया। इस प्रकार स्वराज निर्माण का शाहजी राजे का पहला प्रयास असफल रहा।

जब लखुजी जाधवराव की हत्या हुई, तब जीजाबाई गर्भवती थीं और शाहजी राजे के साथ थीं। उस अनिश्चितता के दौर में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना शाहजी राजे के सामने बड़ी चुनौती थी। परिस्थितियाँ अनुकूल देखकर शाहजी राजे ने जीजामाता को शिवनेरी किले में रखा। यहीं जीजाबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम शिवाजी रखा गया।

पुणे जागीर का पुनर्निर्माण

जब शाहजी राजे दक्षिण भारत में व्यस्त थे, तब जीजाबाई ने पुणे क्षेत्र की जागीर का प्रबंधन संभाला। उन्होंने पुणे में लाल महल के निर्माण का मार्गदर्शन किया। इसी लाल महल में शिवाजी का बाल्यकाल बीता और स्वराज्य की प्रारंभिक योजनाएँ बनीं। उनके प्रशासनिक कौशल के कारण युद्धों से उजड़े क्षेत्र में पुनः कृषि, ग्राम व्यवस्था और राजस्व प्रणाली को सुदृढ़ किया गया।

शिवाजी महाराज के व्यक्तित्व निर्माण में भूमिका

इस माँ के दो पुत्र थे। एक पुत्र को शत्रुओं ने धोखे से मार दिया था और अब उनके पास केवल एक ही पुत्र बचा था। जिस माँ ने अपने परिजनों का बिछोह सहन किया हो, अपने पिता, भाइयों और पुत्र की हत्या होते देखी हो, वह अपने बेटे की सुरक्षा को लेकर कितनी चिंतित होगी, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है।लेकिन उस माँ ने अपने एकमात्र पुत्र को भी देश, धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए तैयार करने का संकल्प लिया।

इतिहास में जीजाबाई का सबसे बड़ा योगदान छत्रपति शिवाजी महाराज के चरित्र निर्माण में माना जाता है। उन्होंने बालक शिवाजी को बचपन से संस्कारित करने के लिए रामायण और महाभारत की कथाएँ सुनाईं। धर्म, न्याय और प्रजा-कल्याण के आदर्श सिखाए। विदेशी एवं अत्याचारी शासन के प्रति प्रतिरोध की भावना जगाई। स्त्रियों के सम्मान और धार्मिक सहिष्णुता के संस्कार दिए तथा स्वराज्य के स्वप्न से प्रेरित किया।

यह मान्यता है कि "शिवाजी के भीतर का स्वराज्य पहले जीजाऊ के मन में जन्मा था।"

हिंदवी स्वराज्य की प्रेरणा

इतिहासकारों के अनुसार हिंदवी स्वराज्य की अवधारणा के पीछे जीजाबाई की प्रेरणा अत्यंत महत्वपूर्ण थी। उन्होंने शिवाजी राजे को केवल सत्ता प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि प्रजा की रक्षा, धर्म और संस्कृति के संरक्षण, न्यायपूर्ण शासन तथा स्वाभिमानी राज्य निर्माण के लिए प्रेरित किया।इसी कारण अनेक इतिहासकार उन्हें "हिंदवी स्वराज्य की आध्यात्मिक जननी" भी कहते हैं।

हर माँ को अपनी संतान की चिंता होना स्वाभाविक है, लेकिन उस चिंता के बावजूद देश को सर्वोपरि रखने का कार्य जब पन्नाधाय और जीजामाता जैसी माताएँ करती हैं, तब किसी राष्ट्र का इतिहास गढ़ा जाता है।राजमाता जीजाबाई भारतीय इतिहास की उन महान महिलाओं में से हैं जिन्होंने केवल एक पुत्र का पालन-पोषण नहीं किया, बल्कि एक युगपुरुष का निर्माण किया। मराठा इतिहास में उनका स्थान केवल शिवाजी महाराज की माता के रूप में नहीं, बल्कि हिंदवी स्वराज्य की प्रथम प्रेरक, राष्ट्रचेतना की संवाहिका तथा आदर्श प्रशासिका के रूप में है। उन्होंने शिवाजी राजे को धर्मपालन, नैतिक शासन, न्याय और लोककल्याण को केंद्र में रखकर योजनाएँ एवं नीतियाँ बनाने की शिक्षा और संस्कार दिए।

महाराज का राज्याभिषेक और अंतिम समय

6 जून 1674 को छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक संपन्न हुआ। यह वह क्षण था, जिसका स्वप्न जीजाबाई ने दशकों तक देखा था। राज्याभिषेक के कुछ ही दिनों बाद, 17 जून 1674 को उनका निधन हो गया। ऐसा माना जाता है कि स्वराज्य को विधिवत स्थापित होते देखने के बाद उनका जीवन-ध्येय पूर्ण हो चुका था।

जीजाबाई के महत्व को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है

1. राष्ट्रनिर्माता माता- उन्होंने ऐसे नेतृत्व का निर्माण किया जिसने भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी।

2. कुशल मार्गदर्शक- वे केवल माता नहीं थीं, बल्कि स्वराज्य आंदोलन की वैचारिक प्रेरक भी थीं।

3. आदर्श प्रशासिका- पुणे जागीर के संचालन में उनकी प्रशासनिक दक्षता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

राजमाता जीजाबाई का जीवन भारतीय इतिहास में मातृत्व, राष्ट्रचेतना, नेतृत्व और सांस्कृतिक आत्मसम्मान का अद्वितीय उदाहरण है। यदि शिवाजी Maharaj हिंदवी स्वराज्य के निर्माता थे, तो जीजाबाई उस स्वराज्य की प्रथम प्रेरणा, वैचारिक आधारशिला और नैतिक शक्ति थीं। मराठा इतिहास में उनका स्थान केवल "शिवाजी की माता" तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वयं एक युगनिर्माता व्यक्तित्व हैं।

जीजामाता के सबक

जो माताएँ अपने बच्चों को हमेशा सुरक्षा के खोल में रखती हैं और उन्हें परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार नहीं करतीं, उनके बच्चे जीवन में बड़े मुकाम हासिल नहीं कर पाते। जरा-सी कठिनाई या थोड़ी-सी विपरीत परिस्थिति आने पर वे विचलित हो जाते हैं और कई बार गलत रास्ते पर भी चल पड़ते हैं।

माता को चाहिए कि वह अपने बच्चों के करियर की चिंता अवश्य करे, लेकिन साथ ही उन्हें अच्छे संस्कार दे, जीवन में किसी बड़े उद्देश्य के लिए जीना सिखाए, उनके सामने बड़ा लक्ष्य रखे और यह सुनिश्चित करे कि उस लक्ष्य तक पहुँचने का मार्ग नैतिकता का हो।

हर बच्चे के भीतर एक उज्ज्वल संभावना का बीज छिपा होता है। माँ की भूमिका उस बीज को पहचानने की होती है। इसके बाद उसे ऐसा वातावरण देना चाहिए, जिसमें वह बीज अच्छी तरह अंकुरित हो सके, पुष्पित-पल्लवित हो सके और एक विशाल वटवृक्ष का रूप लेकर अपने परिवार के साथ-साथ समाज, देश और दुनिया के लिए भी उपयोगी सिद्ध हो सके।

 

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