मध्य प्रदेश में 13.38% भू-भाग मरुस्थलीकरण से प्रभावित है। इसके चलते खेती और पर्यावरण संरक्षण में बढ़ती चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
राजदेव पांडेय
मरुस्थलीकरण और सूखे से निपटने का विश्व दिवस
प्रदेश के औसत तापमान में लगातार इजाफा हो रहा है। सूखे के दिनों की संख्या भी बढ़ रही है। ऐसे में प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में मरुस्थलीकरण और सूखे का खतरा बढ़ना तय है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि प्रदेश के लिए बढ़ता मरुस्थलीकरण अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
भारत सरकार की प्रतिष्ठित एजेंसी इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) की मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण एटलस-2021 रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदेश के कुल भू-क्षेत्र का 12.52 प्रतिशत (करीब 38.5 लाख हेक्टेयर) हिस्सा मरुस्थलीकरण से प्रभावित है। इसे एक प्रकार का अर्थ मरुस्थल कहा जा सकता है।
यह आंकड़ा चिंताजनक है, क्योंकि बढ़ती आबादी के भोजन की आवश्यकता पूरी करने के लिए खेती पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। साथ ही बेहतर पर्यावरण और जलवायु संतुलन बनाए रखने की भी चुनौती है। यह पूरी कवायद भूमि को हरियाली की चादर ओढ़ाए बिना संभव नहीं है। ऐसे में मरुस्थलीकरण और सूखे पर नियंत्रण के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।इसरो के अलावा हालिया एक अन्य आधिकारिक रिपोर्ट में बताया गया है कि मध्य प्रदेश के 13.38 प्रतिशत भू-भाग में अर्ध-मरुस्थलीय स्थिति है। वहीं पूरे भारत की बात करें तो कुल क्षेत्रफल का लगभग 35 से 41 प्रतिशत हिस्सा मरुस्थलीकरण, अर्थ-मरुस्थलीकरण और वनस्पति शून्यता से प्रभावित है।
बात साफ है कि जैसे-जैसे हरियाली घट रही है, वैसे-वैसे मिट्टी अपना स्वाभाविक गुण खोकर अनुपजाऊ होती जा रही है। ऐसे में पोषक तत्वों से भरपूर मिट्टी को बचाने की जरूरत है। यदि मिट्टी के कटाव को नहीं रोका गया, तो जलवायु परिवर्तन के इस दौर में मरुस्थलीकरण जैसी आपदा और बड़े रूप में सामने आ सकती है।
अर्ध-मरुस्थलीकरण से प्रभावित जिले और क्षेत्र
चंबल क्षेत्र
यहां बीहड़, मृदा अपरदन और जल की कमी मरुस्थलीकरण के प्रमुख कारण हैं।
बुंदेलखंड क्षेत्र
- टीकमगढ़
- छतरपुर
- पन्ना
- दतिया
- सागर
कम वर्षा, बार-बार पड़ने वाला सूखा और अत्यधिक भूजल दोहन इस क्षेत्र को मरुस्थलीकरण की ओर धकेल रहे हैं।
मिट्टी में बढ़ रही क्षारीयता
प्रदेश की मिट्टी में लवणता और क्षारीयता की मात्रा भी लगातार बढ़ रही है। इसके चलते खेतों की मिट्टी अनुपजाऊ होती जा रही है। उपज बढ़ाने के लिए उर्वरकों का अंधाधुंध उपयोग भी एक कारण माना जा रहा है।मध्य प्रदेश में लगभग 2.24 लाख हेक्टेयर भूमि गंभीर रूप से लवणता से प्रभावित है। मिट्टी में नमक (लवणता) और क्षारीय तत्वों की मात्रा बढ़ने से उसकी उर्वरता कम होती जा रही है। परिणामस्वरूप फसलें ठीक से नहीं उग पातीं या उनकी पैदावार काफी कम हो जाती है।
मुर्गी को मारने के बराबर है अनदेखी
मध्य प्रदेश के संदर्भ में क्षारीय तत्व अलग पदार्थों के रूप में नहीं, बल्कि मिट्टी में मौजूद क्षारीय लवणों के रूप में पाए जाते हैं। राज्य के कुछ क्षेत्रों, विशेषकर बुंदेलखंड, नर्मदा घाटी के कुछ हिस्सों और जलभराव वाले इलाकों में इनकी मात्रा अधिक है।विशेषज्ञों का मानना है कि मिट्टी की अनदेखी करना उस मुर्गी को मारने के समान है, जो हर दिन सोने का अंडा देती है।
मप्र के ये जिले सबसे अधिक प्रभावित
यदि सबसे अधिक प्रभावित जिलों की बात करें तो मुरैना, भिंड, श्योपुर, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, झाबुआ और रतलाम अर्ध-मरुस्थलीकरण की दृष्टि से सबसे संवेदनशील जिलों में शामिल हैं।
पश्चिमी मध्य प्रदेश
- रतलाम
- झाबुआ
- अलीराजपुर
- धार
- बड़वानी
- गुना
इन जिलों में वनस्पति क्षरण, जल अपरदन और भूमि की उत्पादकता में लगातार गिरावट दर्ज की गई है।
पर्यावरण संरक्षण है थीम का मुख्य उद्देश्य
'मरुस्थलीकरण और सूखे से निपटने का विश्व दिवस' हर वर्ष 17 जून को मनाया जाता है।
वर्ष 2026 की थीम "भूमि को पुनर्स्थापित करो, अवसरों को खोलो" रखी गई है। इस थीम का उद्देश्य यह संदेश देना है कि क्षतिग्रस्त और बंजर भूमि को पुनः उपजाऊ बनाकर न केवल पर्यावरण को बचाया जा सकता है, बल्कि रोजगार, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक विकास के नए अवसर भी सृजित किए जा सकते हैं।