भारत का संविधान लोकतंत्र और सामाजिक व्यवस्था की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है, लेकिन उसकी व्याख्या और दुरुपयोग दोनों चुनौतिपूर्ण बनी हुई हैं।
गिरीश्वर मिश्र
भारत का संविधान कई दृष्टियों से विश्व का एक अनोखा दस्तावेज है, जिसमें लोकतंत्र की सुरक्षा ही नहीं, बल्कि उसे कार्यान्वित करने की व्यवस्था भी एक स्वायत्त प्रणाली के रूप में की गई है। एक जीवित प्राणी की तरह यह संविधान अपने ऊपर भी लागू होता है और आवश्यकतानुसार स्वयं में बदलाव करने में भी सक्षम है। यह सुनम्यता या लचीलापन सोद्देश्य है। यह देश, काल और परिस्थितियों की जरूरतों के अनुसार आवश्यक कदम उठाने की छूट देता है।
देश के संविधान-निर्माताओं ने बड़े पैमाने पर सोच-विचार और लंबी खुली बहस के बीच आम सहमति बनाते हुए इसे अंतिम रूप दिया था। भारत की पृष्ठभूमि और तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए यह निश्चय ही एक बड़ी उपलब्धि थी। अंग्रेजों के उपनिवेश से स्वतंत्र हो रहे भारतवर्ष की स्थिति 1947 में तत्कालीन जनसंख्या, शिक्षा के सीमित विस्तार, उद्योग-धंधों की कमी, सांस्कृतिक विविधता और आर्थिक विपन्नता आदि को देखते हुए संतोषजनक नहीं थी। स्वतंत्रता मिली थी, पर वह विभाजित हो रहे देश की स्वतंत्रता थी और विभाजन एक बड़ी तथा स्थायी त्रासदी बन गया।
उक्त पृष्ठभूमि में यह कहा जा सकता है कि भारतीय संविधान समग्र देश की आकांक्षाओं को मूर्त रूप में स्थापित करने की एक सफल कोशिश थी। संविधान को एक महास्वप्न के रूप में रचा गया था। इसके लिए संविधान-निर्माताओं के प्रति देश सदैव कृतज्ञ रहेगा। इस संविधान के साथ देश ने समाज की व्यवस्था के संचालन के लिए सरकार को भरपूर समर्थन भी दिया। संवैधानिक संस्थाएँ स्थापित की गईं और एक स्वतंत्र देश की जीवन-यात्रा आरंभ हुई।
इस विशाल देश की जमीनी चुनौतियों के बीच नेतृत्व, सत्ता, लोकतांत्रिक प्रणाली और परंपरागत मूल्यों का संतुलन किसी भी तरह सरल नहीं था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जिस ‘सर्वहित’ की भावना को सर्वोपरि माना था, अर्थात समाज के हर वर्ग की आवाज सुनना और उसे समझना, वह एक कठिन जिम्मेदारी थी। उसे समझकर व्यवहार में लागू कर पाना और भी कठिन था। पर धैर्य और संवेदना के साथ देश के राजनेताओं ने परिस्थितियों को संभाला और संविधान की परिधि में रहकर अनेक कदम उठाए। उद्योग-धंधे स्थापित होने लगे और नागरिक सुविधाओं के विस्तार का कार्य भी शुरू हुआ। प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की आधुनिक दृष्टि के साथ देश ने आगे बढ़ने के लिए कदम बढ़ाए, हालांकि उस दृष्टि की कुछ अपनी सीमाएँ भी थीं।
इतिहास पर नजर डालें तो सन् 1950 से 1975 तक की एक चौथाई सदी अनेक चुनौतियों से भरी रही। देश संघर्ष करता हुआ उन पर काफी हद तक काबू पाने में सफल भी रहा। कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य ही नहीं, युद्ध जैसी चुनौतियाँ भी सामने आईं और उनसे निपटने में सफलता मिली। अधिक विस्तार में न जाकर यह कहना पर्याप्त होगा कि भारत के लोगों ने श्रीमती इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में हृदय से स्वीकार किया था।
परंतु परिस्थितियों ने करवट ली। श्रीमती गांधी की राजनीतिक सोच और दृष्टि में गंभीर परिवर्तन हुआ। उनके निकट सहयोगियों की सलाह और राजनीतिक परिस्थितियों ने 25 जून 1975 को लोकतंत्र के इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना को जन्म दिया। लोकतंत्र की सामान्य व्यवस्था के स्थान पर आपातकाल की घोषणा कर दी गई और प्रचलित व्यवस्था एक आदेश से स्थगित हो गई। इमरजेंसी लागू कर पूरे विपक्ष को कठघरे में खड़ा कर दिया गया। देशभर में अनेक निर्दोष लोगों को जेल में डाल दिया गया और असहमति की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई। संविधान की उद्देशिका में भी अपनी पसंद के अनुसार परिवर्तन किए गए। उस दौर में नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर पाबंदी लगी और विभिन्न प्रकार के अत्याचार हुए। राजनीतिक लाभ के लिए समाज और लोकतंत्र की आत्मा के हनन का यह अध्याय लोकस्मृति में स्थायी रूप से अंकित हो गया।
लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्थगित करने वाले आपातकाल की स्मृति भारतीय लोकतंत्र की कथा में एक दुखद घटना के रूप में सदा के लिए दर्ज हो गई। तत्कालीन घटनाक्रम और उसके बाद हुए परिवर्तनों ने यह सिद्ध किया कि इस कदम के कारण देश के राजनीतिक परिदृश्य में निर्णायक मोड़ आया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के ‘संपूर्ण क्रांति’ के आह्वान के बाद देशभर में राजनीति में जन-संवाद और जन-भागीदारी नए उत्साह के साथ सक्रिय हुई। उसके बाद कई नए समीकरण उभरे और जोड़-तोड़ की राजनीति के अनेक स्थायी तथा अस्थायी स्वर मुखर हुए।
कुल मिलाकर अभिजात्य वर्चस्व की जगह सामाजिक बहुलता वाली राजनीति को प्रमुखता मिली। एक प्रकार से इस बदलाव ने भारतीय राजनीति के आचरण में केंद्रीकृत सत्ता के स्थान पर विकेंद्रीकरण की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया। गौरतलब है कि तब से लेकर विगत आधी सदी तक देश की राजनीतिक यात्रा वैचारिक और नीतिगत स्तर पर काफी उथल-पुथल भरी रही है।इसका एक दुखद पक्ष यह रहा कि देशहित को पीछे छोड़कर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की गतिविधियाँ वैचारिक या नीतिगत प्रश्नों से हटकर निजी, सामुदायिक या क्षेत्रीय स्वार्थों की पूर्ति की दिशा में बढ़ने लगीं। जायज हो या नाजायज, हर प्रकार की महत्वाकांक्षा को आकार देना राजनीति का सामान्य स्वभाव बनता गया।
राजनीति का नैतिक मूल्यों से संबंध कमजोर होने की स्थिति में यदि राजनेता रास्ता भटक रहे हैं, तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। आज वैचारिक या नीतिगत प्रतिबद्धता से अधिक छोटे-छोटे स्वार्थों के कारण असंतुष्ट नेता नए-नए दल बनाने में जुट जाते हैं। दलों का यह दलदल अनेक राज्यों में सक्रिय दिखाई देता है। प्रदेश और नेताओं के लिए देश की प्रगति या विकास का मुद्दा तभी प्रासंगिक बनता है, जब वह उनके सीमित और निहित स्वार्थों से जुड़ता हो।
ऐसे माहौल में संविधान को लोग गंभीरता से नहीं लेते और उसकी रक्षा जटिल सिद्ध होती जा रही है। उल्लेखनीय है कि अब तक उसमें सवा सौ से अधिक संविधान संशोधन संसद द्वारा स्वीकृत कर लागू किए जा चुके हैं। साथ ही संविधान की समग्र संरचना की समीक्षा और उसमें व्यापक परिवर्तन लाने की कवायद की चर्चा भी समय-समय पर होती रही है।
वर्तमान संविधान की व्यवस्था व्यापक है, परंतु उसकी व्याख्या और दुरुपयोग दोनों होते रहते हैं। मोटे तौर पर संविधान लागू है और विधि-विधान उसी के अनुरूप संचालित हैं। कम से कम सैद्धांतिक रूप से सरकार के संचालन और कानून-व्यवस्था को उसी के अनुसार चलाने पर जोर दिया जाता है, परंतु संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के प्रत्यक्ष और परोक्ष उल्लंघन की घटनाएँ भी समय-समय पर सामने आती रहती हैं।विगत बारह वर्षों से केंद्र की सरकार में स्थिरता है और देश को आगे रखकर विकास की नीति पर गंभीरता से कार्य किया जा रहा है। समाज के पिछड़े वर्गों की स्थिति में सुधार के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में लोगों को अति गरीबी से मुक्ति मिली है। यातायात सुविधाओं में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन के प्रयास जारी हैं। कानूनी व्यवस्था में भी सुधार लाया जा रहा है।
एक समर्थ और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए प्रतिबद्धता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, पर उसे साकार करने के लिए सत्यनिष्ठा और आत्मनियंत्रण भी उतने ही आवश्यक हैं। एक श्रेष्ठ कार्य-संस्कृति की स्थापना भी जरूरी है। भ्रष्टाचार और अपराध की घटनाओं को देखते हुए यह कहना कठिन है कि संविधान अपना कार्य पूरी तरह ठीक ढंग से कर रहा है या उसे करने दिया जा रहा है।संविधान नीति-नियामक है, लेकिन उसे उचित सम्मान भी मिलना चाहिए। उसे लागू करना और उसके दुरुपयोग को रोकना भी आवश्यक है। संविधान के प्रावधानों की अवहेलना और कुव्याख्या के मामले समय-समय पर सामने आते रहते हैं। ऐसे में आचरण की चुनौती व्यापक स्तर पर सचेत होकर कार्य करने की चेतावनी देती है।
संविधान लोकतंत्र और समाज के हित में प्रभावी ढंग से कार्य करता रहे, इसके लिए सरकार और जनता दोनों की समान रूप से प्रतिबद्धता आवश्यक है।