नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में मिली सफलता के बाद भारत सरकार ने नारकोटिक्स की तस्करी और उपयोग को रोकने के लिए व्यापक अभियान शुरू किया है।
आलोक मेहता
सीमा पर आतंकी गतिविधियों पर नियंत्रण और माओवादी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता के बाद भारत सरकार अब मादक पदार्थों (नारकोटिक्स) की तस्करी तथा उसके जहर को समाज में फैलने से रोकने के लिए व्यापक अभियान चला रही है। पिछले दिनों एक अनौपचारिक बातचीत में मैंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से इस विषय पर प्रश्न किया तो उन्होंने स्पष्ट कहा, "हम पिछले वर्षों से इस समस्या से निपटने के लिए लगातार कदम उठा रहे हैं और अब नारकोटिक्स पर नियंत्रण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रयास तेज करेंगे। यह आतंकवाद की तरह पूरी दुनिया और विशेष रूप से भावी पीढ़ी की सुरक्षा से जुड़ा प्राथमिकता का विषय है।"
इसी उद्देश्य से गृहमंत्री अमित शाह ने हाल ही में भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर से मुलाकात की। बैठक में आतंकवाद-रोधी सहयोग, सीमा सुरक्षा और मादक पदार्थों की तस्करी के विरुद्ध संयुक्त प्रयासों पर विशेष चर्चा हुई। दोनों देशों ने माना कि नशीले पदार्थों का अवैध व्यापार अब केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता और युवाओं के भविष्य का गंभीर प्रश्न बन चुका है। यह मुलाकात बढ़ती वैश्विक चिंता का प्रतीक भी है, क्योंकि ड्रग्स तस्करी, संगठित अपराध और आतंकवाद अब परस्पर जुड़े हुए खतरे बन चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के साथ नारकोटिक्स के मुद्दे को लगातार उठाते रहे हैं। भारत पंजाब, राजस्थान, गुजरात तथा समुद्री मार्गों से होने वाली तस्करी की चुनौती का सामना कर रहा है। गृहमंत्री अमित शाह पहले भी चेतावनी दे चुके हैं कि नार्को टेररिज्म भारत की दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। जनवरी 2026 में भारत और अमेरिका ने संयुक्त ड्रग नीति कार्य समूह की बैठक में मादक पदार्थों तथा उनके उत्पादन में प्रयुक्त रसायनों की तस्करी रोकने के लिए सहयोग बढ़ाने का संकल्प भी लिया था।
मादक पदार्थों की तस्करी को केवल आपराधिक गतिविधि नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के संकट के रूप में देखा जाना चाहिए। ड्रग्स का अवैध कारोबार अब हथियारों की तस्करी, धन शोधन और आतंकवादी संगठनों के वित्तपोषण से भी जुड़ता जा रहा है। इसलिए केवल सीमाओं पर निगरानी पर्याप्त नहीं है, बल्कि संदिग्ध वित्तीय लेन-देन पर नजर रखने, खुफिया सूचनाओं के त्वरित आदान-प्रदान, साइबर माध्यमों से होने वाली अवैध खरीद-फरोख्त पर नियंत्रण और आधुनिक तकनीक के उपयोग को भी समान महत्व देना होगा। भारत का मानना है कि इस चुनौती का प्रभावी समाधान केवल अंतरराष्ट्रीय सहयोग और साझा रणनीति से ही संभव है।
भारत आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी उसकी ताकत है, तो दूसरी ओर यही वर्ग ड्रग्स माफिया का सबसे बड़ा लक्ष्य बनता जा रहा है। सीमा पार से ड्रोन के माध्यम से नशीले पदार्थों की आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय अपराध सिंडिकेट और नार्को टेरर नेटवर्क देश के सामने गंभीर चुनौती हैं। अमित शाह ने हाल ही में कहा था कि ड्रग्स का खतरा सीमाहीन है और इससे निपटने के लिए वैश्विक गठबंधन, वास्तविक समय की खुफिया साझेदारी, वित्तीय निगरानी, समुद्री सुरक्षा और प्रभावी सीमा प्रबंधन अनिवार्य हैं। भारत का भी मानना है कि कोई एक देश अकेले इस चुनौती का सामना नहीं कर सकता। वर्ष 2020 से 2025 के दौरान नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, बीएसएफ, भारतीय नौसेना, तटरक्षक बल और राज्य पुलिस ने बड़े पैमाने पर अभियान चलाए हैं। 2025 में गुजरात तट के निकट 1,800 करोड़ रुपये मूल्य की मेथामफेटामाइन जब्त की गई, जबकि पश्चिमी हिंद महासागर में भारतीय नौसेना ने 2.5 टन से अधिक मादक पदार्थ पकड़े। इन कार्रवाइयों से स्पष्ट है कि तस्करों ने भूमि सीमा के साथ समुद्री मार्गों को भी प्रमुख माध्यम बना लिया है और सुरक्षा एजेंसियों को अब समुद्र में भी उतनी ही सतर्कता से लड़ाई लड़नी पड़ रही है।
ड्रग्स की समस्या अब केवल सीमावर्ती राज्यों या अपराध जगत तक सीमित नहीं है। स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, हॉस्टलों तथा महानगरों की नाइटलाइफ तक इसकी पहुंच चिंता का विषय बन चुकी है। विभिन्न अध्ययनों से संकेत मिलता है कि नशीले पदार्थों का प्रयोग कम उम्र में शुरू हो रहा है। एम्स के एक अध्ययन के अनुसार कुछ बच्चों में इसकी शुरुआत 12 से 13 वर्ष की आयु में और कुछ मामलों में 11 वर्ष तक देखी गई। लगभग 15 प्रतिशत विद्यार्थियों ने किसी न किसी मनःप्रभावी पदार्थ का प्रयोग करने की बात स्वीकार की। एक अन्य सर्वेक्षण में कक्षा 8 से 12 तक के दस प्रतिशत से अधिक विद्यार्थियों द्वारा पिछले वर्ष पदार्थ सेवन की जानकारी सामने आई।
विशेषज्ञ इसके पीछे साथियों का दबाव, सोशल मीडिया का प्रभाव, पारिवारिक तनाव, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, जिज्ञासा और नशीले पदार्थों की आसान उपलब्धता को प्रमुख कारण मानते हैं। कॉलेजों में अधिक स्वतंत्रता, हॉस्टल जीवन और पार्टी संस्कृति के कारण जोखिम और बढ़ जाता है। कई राज्यों में पुलिस ने कॉलेज परिसरों के आसपास विशेष अभियान चलाकर युवाओं के नशीले पदार्थों के संपर्क में आने की पुष्टि की है। महानगरों में समय-समय पर होटल, पब, फार्महाउस और निजी पार्टियों पर छापों के दौरान एमडीएमए, एलएसडी, मेफेड्रोन और मेथाम्फेटामिन जैसे सिंथेटिक ड्रग्स की बरामदगी बढ़ी है। इससे स्पष्ट है कि अब समस्या केवल हेरोइन या अफीम तक सीमित नहीं रही।
पंजाब में 2025-26 के दौरान 90 हजार से अधिक लोगों का नशामुक्ति कार्यक्रमों के तहत उपचार किया गया। कश्मीर और गोवा सहित अनेक क्षेत्रों में भी युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति को गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते हस्तक्षेप न किया जाए तो प्रयोग धीरे-धीरे निर्भरता और फिर लत में बदल जाता है। इसके दुष्परिणाम पढ़ाई में गिरावट, मानसिक अवसाद, हिंसक व्यवहार, सड़क दुर्घटनाओं, अपराध और पारिवारिक विघटन के रूप में सामने आते हैं। केवल कानून का भय इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं बन सकता। समाज को भी यह समझना होगा कि नशे की शुरुआत अक्सर जिज्ञासा या साथियों के दबाव से होती है, लेकिन धीरे-धीरे यह व्यक्ति, परिवार और समाज तीनों को अपनी चपेट में ले लेती है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में नियमित जागरूकता अभियान, अभिभावकों और शिक्षकों का सतत संवाद, खेल एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा तथा नशामुक्ति केंद्रों तक आसान पहुंच इस लड़ाई के महत्वपूर्ण आयाम हैं। मीडिया, सामाजिक संगठनों और स्थानीय समुदायों की भी जिम्मेदारी है कि वे नशे को आकर्षण नहीं, बल्कि सामाजिक विनाश के रूप में प्रस्तुत करें।
भारत अभी अमेरिका या कनाडा जैसी ओपिऑयड महामारी की स्थिति में नहीं पहुंचा है, लेकिन चेतावनी के संकेत स्पष्ट हैं। नशे की शुरुआत की आयु घट रही है, सिंथेटिक ड्रग्स का प्रसार बढ़ रहा है और मानसिक स्वास्थ्य तथा नशे की समस्या एक-दूसरे से गहराई से जुड़ती जा रही है। इसलिए स्कूल स्तर पर जागरूकता, कॉलेजों में प्रभावी काउंसलिंग, परिवारों की सक्रिय भागीदारी, नशामुक्ति केंद्रों का विस्तार और तस्करी नेटवर्क पर कठोर कार्रवाई समय की आवश्यकता है।भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल ड्रग्स की तस्करी रोकना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को नशे की गिरफ्त में जाने से बचाना है। यदि सरकार, सुरक्षा एजेंसियां, शैक्षणिक संस्थान, परिवार और समाज मिलकर समन्वित प्रयास करें तो भारत उस सामाजिक संकट से बच सकता है, जिसका सामना कई पश्चिमी देशों को करना पड़ा है। नक्सलवाद और आतंकवाद के विरुद्ध मिली सफलताओं के बाद अब नशामुक्त भारत का अभियान राष्ट्रीय संकल्प बनना चाहिए।