विश्व शरणार्थी दिवस पर भारत की उदार शरणार्थी नीतियों का विश्लेषण। सरदार पटेल की पहल और विभिन्न समुदायों के योगदान को उजागर किया गया।
विवेक शुक्ला
सरदार पटेल की पहल पर पंजाब, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान में बड़े-बड़े राहत शिविर स्थापित किए गए। कुरुक्षेत्र में एशिया का सबसे बड़ा शरणार्थी शिविर बना, जहां लाखों लोग ठहरे। उन्हीं की दूरदर्शी कोशिशों से 1948 में भारत की पहली शरणार्थी कॉलोनी ओल्ड राजेंद्र नगर बसी। सरदार पटेल ने केवल आवास तक ही सीमित नहीं रखा। उन्होंने शरणार्थियों की शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास पर विशेष जोर दिया।
हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला की शांत पहाड़ियों पर तिब्बती बच्चे बौद्ध मठों में प्रार्थना कर रहे हैं, दिल्ली के चहल-पहल वाले बाजारों में अफगानी रेस्टोरेंट अपनी सुगंध बिखेर रहे हैं, तमिलनाडु के शिविरों में श्रीलंकाई तमिल माताएं अपने बच्चों के भविष्य की चिंता में डूबी हैं और हैदराबाद व जम्मू की बस्तियों में रोहिंग्या परिवार अनिश्चित कल की राह देख रहे हैं। विश्व शरणार्थी दिवस पर ये जीवंत दृश्य भारत की सदियों पुरानी उदार परंपरा को फिर से याद दिलाते हैं, जहां विभिन्न देशों के शरणार्थियों को हमेशा आश्रय मिलता रहा है।
भारत ने कभी शरणार्थियों को अपने द्वार पर खड़ा नहीं रखा। युद्ध, उत्पीड़न और अत्याचार से बचकर आने वाले लाखों लोगों को न सिर्फ जगह दी, बल्कि उन्हें अपना हिस्सा समझकर अपनाया भी। यह उदारता भारत की सभ्यतागत विरासत का अभिन्न अंग रही है।
विभाजन की त्रासदी और सरदार पटेल की भूमिका
1947 के विभाजन के समय यह उदारता सबसे कठिन परीक्षा से गुजरी। पाकिस्तान से भारत आए लाखों हिंदू और सिख शरणार्थी मानव इतिहास की सबसे बड़ी विस्थापन घटनाओं में से एक थे। उस समय गृह मंत्री और उप-प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने इन शरणार्थियों के पुनर्वास और सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाली। उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति, प्रशासनिक कुशलता और मानवीय संवेदनशीलता ने लाखों जीवन बचाए और उन्हें नई जिंदगी दी।शरणार्थियों की सबसे बड़ी चुनौतियां आवास, भोजन और रोजगार की थीं। सरदार पटेल की पहल पर पंजाब, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान में बड़े-बड़े राहत शिविर स्थापित किए गए। कुरुक्षेत्र में एशिया का सबसे बड़ा शरणार्थी शिविर बना, जहां लाखों लोग ठहरे। उन्हीं की दूरदर्शी कोशिशों से 1948 में भारत की पहली शरणार्थी कॉलोनी ओल्ड राजेंद्र नगर बसी।
सरदार पटेल ने केवल आवास तक ही सीमित नहीं रखा। उन्होंने शरणार्थियों की शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास पर विशेष जोर दिया। स्कूल, अस्पताल और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र खोले गए। महिलाओं और बच्चों के लिए अलग कार्यक्रम चलाए गए। उन्होंने नेहरू सरकार पर लगातार दबाव बनाया कि शरणार्थी पुनर्वास को राष्ट्रीय प्राथमिकता दी जाए।
विरासत जो आज भी जीवित है
सरदार पटेल की इन नीतियों का परिणाम आज स्पष्ट दिखाई देता है। पंजाबी और सिंधी समुदाय के अनेक शरणार्थी परिवार मेहनत और लगन से सफल उद्यमी बने। दिल्ली, पंजाब और देश के अन्य हिस्सों में आज भी कई बाजार और इलाके इन शरणार्थियों की मेहनत और उद्यमशीलता से चमक रहे हैं।लौह पुरुष सरदार पटेल को यह नाम विभाजन की विभीषिका के बीच राष्ट्र को एकजुट रखने के लिए मिला, लेकिन उनके योगदान का एक और महत्वपूर्ण आयाम शरणार्थी पुनर्वास का था। उन्होंने न सिर्फ तत्काल संकट का समाधान किया, बल्कि इन परिवारों को आत्मनिर्भर और राष्ट्रनिर्माण का हिस्सा बनाने की नींव रखी।
आज भी भारत सरदार पटेल की उसी उदार नीति पर चल रहा है। भारत ने शरणार्थियों को मानवीय आधार पर सहारा दिया है। विश्व शरणार्थी दिवस पर यह याद रखना जरूरी है कि शरणार्थी कोई बोझ नहीं, बल्कि नई ऊर्जा, संस्कृति और मेहनत लेकर आने वाले लोग हैं, जिन्हें सही अवसर देने पर वे राष्ट्र की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
1959 का तिब्बती संकट
चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया। दलाई लामा और उनके हजारों अनुयायी भारत पहुंचे। जवाहरलाल नेहरू ने खुले दिल से उनका स्वागत किया और कहा, "वे हमारे मेहमान हैं।"आज भी हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला, कर्नाटक के बायलाकुप्पे, उत्तराखंड और दिल्ली-एनसीआर में 70,000 से अधिक तिब्बती शरणार्थी बस चुके हैं। वे स्कूल चलाते हैं, व्यापार करते हैं और बौद्ध मठों का संचालन करते हैं। भारत ने उन्हें जमीन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराईं।
1960 के दशक में चकमा-हाजोंग और 1971 का बांग्लादेश संकट
बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) से बौद्ध समुदाय के चकमा-हाजोंग लोग धार्मिक और जातीय दबाव के कारण भागकर अरुणाचल प्रदेश और असम पहुंचे।इसके बाद 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान करीब 94 लाख शरणार्थी भारत पहुंचे। यह उस समय दुनिया का सबसे बड़ा शरणार्थी संकट था। भारत सरकार ने उन्हें भोजन, आश्रय और चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराईं। युद्ध के बाद अधिकांश लोग वापस लौट गए, लेकिन कई परिवार भारत में बस गए और सफल जीवन जी रहे हैं।
1980 के दशक से श्रीलंकाई तमिल
श्रीलंका के गृहयुद्ध में तमिलों पर अत्याचार हुआ तो भारत ने उन्हें तमिलनाडु और ओडिशा के शिविरों में आश्रय दिया। आज भी करीब 58,000 से अधिक श्रीलंकाई शरणार्थी विभिन्न शिविरों में रह रहे हैं। सरकार ने उन्हें शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराईं। कई लोग वापस लौट गए, लेकिन जो यहां रहे, वे भारतीय समाज का अभिन्न हिस्सा बन गए।
अफगानिस्तान से आए शरणार्थी
सोवियत आक्रमण (1980 के दशक), तालिबान शासन और 2021 में अमेरिकी वापसी के बाद बड़ी संख्या में अफगान शरणार्थी भारत आए। इनमें सिख, हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग शामिल थे। वे दिल्ली, जम्मू और हैदराबाद जैसे शहरों में बसे।भारत ने उन्हें दीर्घकालिक वीजा (लॉन्ग टर्म वीजा) उपलब्ध कराया और कुछ को नागरिकता प्राप्त करने का अवसर भी दिया, विशेषकर धार्मिक अल्पसंख्यकों को। नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) जैसे प्रावधानों ने भी उन्हें राहत प्रदान की।
रोहिंग्या संकट
म्यांमार में 2017 की हिंसा के बाद हजारों रोहिंग्या भारत पहुंचे। हालांकि सुरक्षा और अवैध घुसपैठ से जुड़े मुद्दों के कारण सरकार की नीति इस मामले में अपेक्षाकृत सख्त रही। कुछ लोगों को डिटेंशन केंद्रों में भी रखा गया।इसके अलावा ईरान, सूडान, सोमालिया और कांगो जैसे देशों से भी छोटे समूहों में शरणार्थी भारत आए हैं।1959 में भारत सरकार ने स्पष्ट किया था कि शरणार्थियों का स्वागत मानवीय आधार पर किया जाएगा, लेकिन सामान्य स्थिति लौटने पर उन्हें अपने देश वापस जाना होगा।
विश्व में सबसे अधिक शरणार्थी कहां हैं?
संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (यूएनएचसीआर) के अनुसार, दुनिया में सबसे अधिक शरणार्थियों की मेजबानी करने वाले प्रमुख देशों में कोलंबिया, जर्मनी, तुर्किये (तुर्की), युगांडा और ईरान शामिल हैं। ये पांच देश दुनिया के लगभग एक-तिहाई शरणार्थियों को आश्रय देते हैं।कल्पना कीजिए कि आप अपना घर, गांव और मिट्टी छोड़कर हजारों किलोमीटर दूर किसी अनजान देश में पहुंचते हैं। वहां नई भाषा, नई संस्कृति और नए लोगों के बीच रहना पड़ता है। भारत में फिलहाल लाखों शरणार्थी रह रहे हैं। यूएनएचसीआर और भारत सरकार मिलकर उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।
भारत की शरणार्थी नीति हमेशा एक जैसी नहीं रही, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार विकसित होती रही है। बहरहाल, भारत को शरणार्थी मुद्दे पर एक व्यापक कानून की आवश्यकता है, जो इंसानियत और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के बीच संतुलन स्थापित कर सके।इतिहास गवाह है कि भारत ने शरणार्थियों को कभी पीठ नहीं दिखाई। शरणार्थी बोझ नहीं होते, वे अपने साथ संस्कृति, मेहनत और नई कहानियां लेकर आते हैं। हमने उन्हें अपनाया और उन्होंने भारत को अपना माना। आजादी के बाद की यह नीति हमें गर्व का अनुभव कराती है। भविष्य में भी हमें इसी मानवीय दृष्टिकोण को बनाए रखना होगा, ताकि दुनिया कहे कि भारत न सिर्फ एक बड़ा देश है, बल्कि बड़े दिल वाला देश भी है।