अमेरिका और ईरान के बीच हालिया युद्ध-विराम समझौते की गहन समीक्षा। क्या यह समझौता स्थायी शांति ला पाएगा या यह सिर्फ एक अस्थायी विराम है?
जब कोई देश शांति की बात करता है, परंतु साथ-साथ युद्ध की भी तैयारी करता है, तो उसकी शांति वार्ता पर प्रश्नचिह्न अवश्य लग जाता है। मध्य-पूर्व में महीनों से चले आ रहे तनाव के बाद जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध-विराम समझौते की खबरें आईं, तो विश्व ने राहत की सांस ली। किंतु प्रश्न वही पुराना है क्या कागज पर हुई शांति वास्तव में मैदान में टिक पाएगी? क्या यह समझौता क्षेत्रीय स्थिरता की नींव रखेगा या फिर अगली बमबारी से पहले का केवल एक विराम साबित होगा?
ट्रंप की चेतावनी : ‘शर्तें टूटीं तो फिर होगी बमबारी’
समझौते के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट कहा कि यदि ईरान ने शर्तों का उल्लंघन किया तो अमेरिका पहले से अधिक ताकत के साथ फिर बमबारी करेगा। यह वक्तव्य स्वयं इस समझौते की प्रकृति को स्पष्ट करता है। यह स्थायी शांति संधि नहीं, बल्कि शर्तों पर आधारित युद्ध-विराम है।अमेरिका की रणनीति साफ है दबाव बनाए रखो ताकि ईरान कोई भी कदम उठाने से पहले कई बार सोचे। आलोचक इसे “शांति के नाम पर धमकी” कहते हैं, जबकि समर्थक इसे व्यावहारिक कूटनीति मानते हैं। सच यही है कि जब तक नेताओं की भाषा में ‘बमबारी’ जैसे शब्द बने रहेंगे, तब तक स्थायी विश्वास स्थापित होना कठिन रहेगा।
परमाणु कार्यक्रम : शर्तों की जंजीर
समझौते का सबसे महत्वपूर्ण भाग ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ा है। ईरान को यूरेनियम संवर्धन 3.67 प्रतिशत तक सीमित रखना होगा, सेंट्रीफ्यूज की संख्या घटानी होगी तथा आईएईए निरीक्षकों को फोर्डो और नतांज परमाणु स्थलों तक पूर्ण पहुंच देनी होगी। इसके बदले अमेरिका और उसके सहयोगी देश आर्थिक प्रतिबंधों में चरणबद्ध ढील देंगे।किंतु यहीं सबसे बड़ी समस्या भी है। ईरान को आशंका है कि वह अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी करेगा, लेकिन प्रतिबंध हटाने में अमेरिका टालमटोल कर सकता है। वहीं अमेरिका को भय है कि प्रतिबंध हटते ही ईरान फिर पुराने रास्ते पर लौट सकता है। इसलिए यही प्रावधान इस समझौते की सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे कमजोर कड़ी भी।
व्यावहारिकता की जीत : मिसाइल कार्यक्रम पर नरमी
पहले अमेरिका की मांग थी कि ईरान अपना बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पूरी तरह समाप्त करे। नए समझौते में इस रुख में परिवर्तन दिखाई देता है। अब केवल लंबी दूरी की उन मिसाइलों को सीमित करने पर जोर है, जिनका उपयोग सीमा पार हमलों में हो सकता है, जबकि आत्मरक्षा संबंधी मिसाइलों पर कुछ छूट दी गई है।यह बदलाव महत्वपूर्ण है। अमेरिका समझ चुका है कि ईरान अपनी सुरक्षा से जुड़ी क्षमताओं पर पूरी तरह समझौता नहीं करेगा। इसलिए पूर्ण निरस्त्रीकरण के स्थान पर नियंत्रित संतुलन की नीति अपनाई गई है। हालांकि मिसाइलों की परिभाषा और उनकी सीमा को लेकर भविष्य में विवाद की संभावना बनी रहेगी।
युद्ध से विकास की ओर : पुनर्निर्माण का बड़ा प्रस्ताव
समझौते का एक सकारात्मक पक्ष आर्थिक पुनर्निर्माण भी है। अमेरिका, यूरोपीय संघ और खाड़ी देशों ने मिलकर मध्य-पूर्व पुनर्निर्माण कोष बनाने की घोषणा की है। अनुमान है कि इसमें 200 अरब डॉलर से अधिक की राशि उपलब्ध कराई जाएगी।इस राशि का एक हिस्सा ईरान के बुनियादी ढांचे, अस्पतालों और ऊर्जा क्षेत्र के विकास में लगाया जाएगा, बशर्ते वह परमाणु समझौते की शर्तों का पालन करे। इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि युद्ध से प्रभावित ईरान को आर्थिक राहत मिलेगी और क्षेत्रीय स्थिरता बढ़ेगी। लेकिन नकारात्मक पक्ष यह है कि पूरा फंड राजनीतिक शर्तों से जुड़ा हुआ है। यदि अमेरिका-ईरान संबंध फिर बिगड़ते हैं, तो विकास परियोजनाएं भी रुक सकती हैं।
गले की फांस : होर्मुज जलडमरूमध्य
सबसे संवेदनशील मुद्दा होर्मुज जलडमरूमध्य का है, जहां से विश्व के लगभग 20 प्रतिशत तेल का परिवहन होता है। समझौते के अनुसार ईरान नौवहन की स्वतंत्रता में बाधा नहीं डालेगा और अमेरिका अपनी नौसैनिक गतिविधियों को सीमित करेगा।यह वैश्विक व्यापार के लिए राहत का विषय है, लेकिन वास्तविक चुनौती विश्वास की है। ईरान इसे अपनी संप्रभुता का विषय मानता है, जबकि अमेरिका इसे अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग मानता है। यदि यहां कोई छोटी-सी नौसैनिक झड़प भी होती है, तो पूरा समझौता खतरे में पड़ सकता है।
कितना सार्थक, कितना निरर्थक?
सार्थक पक्ष
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फिलहाल युद्ध थम गया है और संवाद का रास्ता खुला है।
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परमाणु कार्यक्रम की निगरानी से इजराइल और खाड़ी देशों की सुरक्षा संबंधी चिंताएं कुछ हद तक कम हुई हैं।
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आर्थिक प्रतिबंधों में ढील और पुनर्निर्माण योजनाओं से ईरान की जनता को राहत मिलने की संभावना है।
निरर्थक पक्ष
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यह समझौता विश्वास नहीं, बल्कि शर्तों पर आधारित है, इसलिए इसकी स्थिरता संदिग्ध बनी हुई है।
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मिसाइल कार्यक्रम और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण विवादों का स्थायी समाधान अभी भी नहीं हुआ है।
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प्रतिबंधों से पूर्ण मुक्ति तत्काल नहीं, बल्कि चरणबद्ध है।
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यदि किसी भी पक्ष ने समझौते का उल्लंघन किया, तो पूरी प्रक्रिया फिर से संकट में पड़ सकती है।
निष्कर्ष
अमेरिका-ईरान का यह समझौता न तो पूर्ण शांति है और न ही पूरी तरह छलावा। यह युद्ध और शांति के बीच का एक संवेदनशील गलियारा है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष केवल कागजी शर्तों तक सीमित रहते हैं या वास्तविक राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देते हैं।यदि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम में पारदर्शिता बनाए रखता है और अमेरिका प्रतिबंधों में वास्तविक राहत देता है, तो यह समझौता मध्य-पूर्व में स्थायी शांति और विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हो सकता है। अन्यथा यह भी इतिहास के उन अनेक समझौतों की तरह केवल एक अस्थायी युद्ध-विराम बनकर रह जाएगा।