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अमेरिका-ईरान का अंतरिम शांति समझौता

अमेरिका-ईरान समझौताः युद्धविराम से स्थिरता की ओर?

अमेरिका और ईरान ने जी-7 सम्मेलन में अंतरिम शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता वैश्विक आर्थिक स्थिरता और युद्धविराम की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।


अमेरिका-ईरान समझौताः युद्धविराम से स्थिरता की ओर

मेजर सरस त्रिपाठी

फ्रांस के एवियन-ले-बैं में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिका और ईरान के बीच जिस अंतरिम शांति समझौते की घोषणा हुई, उसे 2026 की सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक घटनाओं में से एक माना जा रहा है। लगभग 100 दिनों से अधिक समय तक चले संघर्ष, विध्वंस-विनाश, तेल आपूर्ति संकट और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के बाद यह समझौता सामने आया है। जी-7 देशों ने भी इस समझौते का स्वागत किया है।

समझौते की प्रमुख शर्तें

उपलब्ध मसौदे, विभिन्न समाचार-पत्रों और अमेरिकी अधिकारियों द्वारा जारी विवरण के अनुसार समझौते की मुख्य शर्तें निम्न हैं

  • अमेरिका और ईरान तत्काल तथा स्थायी युद्धविराम लागू करेंगे तथा एक-दूसरे के विरुद्ध नई सैन्य कार्रवाई नहीं करेंगे।

  • दोनों देश एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करेंगे।

  • होर्मुज जलडमरूमध्य को पुनः अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों के लिए खोला जाएगा।

  • ईरान कम-से-कम 60 दिनों तक व्यापारिक जहाजों के सुरक्षित आवागमन को सुनिश्चित करेगा।

  • ईरान परमाणु हथियार विकसित न करने की प्रतिबद्धता दोहराएगा।

  • ईरान के परमाणु कार्यक्रम की निगरानी के लिए अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की भूमिका बढ़ाई जाएगी।

  • अमेरिका चरणबद्ध तरीके से आर्थिक प्रतिबंधों में ढील देगा।

  • ईरान की विदेशों में जमी हुई संपत्तियों को क्रमिक रूप से मुक्त किया जाएगा।

  • ईरान के तेल निर्यात को फिर से अनुमति दी जाएगी।

  • युद्ध से प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्निर्माण के लिए एक बड़े वित्तीय पैकेज और पुनर्निर्माण व्यवस्था पर सहमति बनी है।

  • 60 दिनों के भीतर एक व्यापक और अंतिम समझौते पर बातचीत जारी रहेगी।

विश्व के लगभग पांचवें हिस्से का तेल व्यापार होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। इसके बंद होने से वैश्विक ऊर्जा संकट पैदा हो गया था। समझौते से यह मार्ग पुनः खुल गया है। ऊर्जा बाजार में स्थिरता आने से अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के साथ-साथ भारत सहित अनेक देशों में महंगाई का दबाव कम हो सकता है। अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि इस समझौते ने वैश्विक आर्थिक मंदी के खतरे को टालने में मदद की है।

प्रतिबंधों में ढील और तेल निर्यात की बहाली से ईरान की अर्थव्यवस्था को राहत मिल सकती है, क्योंकि वह काफी हद तक तेल निर्यात पर निर्भर है। निर्यात पुनः शुरू होने से उसे अरबों डॉलर की आय प्राप्त हो सकती है। ईरान की जमी हुई संपत्तियों तक उसकी पहुंच बहाल हो सकती है, क्योंकि विदेशों में फंसी ईरानी संपत्तियों को चरणबद्ध तरीके से मुक्त किया जा सकता है।

युद्ध समाप्त होने से ईरानी नेतृत्व को घरेलू आर्थिक समस्याओं और पुनर्निर्माण पर ध्यान देने का अवसर मिलेगा। लेकिन ईरान की कुछ संभावित हानियां भी हैं। लाभों के साथ उसे कुछ महत्वपूर्ण समझौते भी करने पड़े हैं। जैसे— परमाणु कार्यक्रम पर अधिक अंतरराष्ट्रीय निगरानी स्वीकार करनी होगी, परमाणु हथियार विकल्प को औपचारिक रूप से त्यागना पड़ सकता है, और कट्टरपंथी समूह तथा कुछ सैन्य गुट इस समझौते को राष्ट्रीय हितों से समझौता मान सकते हैं। इस कारण ईरान में घरेलू अशांति की संभावना बढ़ सकती है।

इजराइल पर प्रभाव इस समझौते के कारण सर्वाधिक चिंता इजराइल को हो रही है। इजराइल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपने अस्तित्व के लिए खतरा बताता रहा है। हालांकि समझौते में ईरान ने परमाणु हथियार न बनाने का वादा किया है, फिर भी इजराइली नेतृत्व को आशंका है कि प्रतिबंधों में ढील मिलने से ईरान आर्थिक रूप से अधिक मजबूत हो जाएगा और गुप्त रूप से परमाणु कार्यक्रम को जारी रख सकता है।

दूसरी ओर, यदि समझौता सफल रहता है तो इजराइल को प्रत्यक्ष सैन्य टकराव के खतरे में कमी दिखाई दे सकती है। लेकिन यह भी संभव है कि इजराइल भविष्य में अमेरिका पर अधिक कठोर रुख अपनाने का दबाव बनाए रखे। इजराइल के अतिरिक्त पश्चिम एशिया में व्यापक युद्ध की आशंका कम होगी, तो अन्य देशों में विकास कार्य आगे बढ़ सकेंगे।अमेरिकी राष्ट्रपति ने स्वयं संकेत दिया है कि असफल वार्ता की स्थिति में सैन्य कार्रवाई फिर शुरू हो सकती है। लेकिन इस समझौते का सबसे व्यापक प्रभाव विश्व अर्थव्यवस्था पर होगा और वैश्विक अर्थव्यवस्था इसकी सबसे बड़ी लाभार्थी हो सकती है, क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता आने से विश्व उत्पादन और व्यापार में अवश्य वृद्धि होगी।

संपूर्ण विश्व के लिए समुद्री परिवहन लागत कम होगी, जो विकास को गति देगी। ऊर्जा आयातक देशों, विशेषकर भारत, जापान और यूरोपीय देशों को राहत मिल सकती है। वैश्विक शेयर बाजारों में निवेशकों का विश्वास बढ़ सकता है। भारत जैसे देशों के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनकी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है।संक्षेप में कहा जा सकता है कि जी-7 सम्मेलन के दौरान हुआ अमेरिका-ईरान समझौता पूर्ण शांति संधि नहीं, बल्कि युद्धविराम और आगे की वार्ताओं का एक ढांचा है। इसके माध्यम से अमेरिका को परमाणु नियंत्रण और ऊर्जा स्थिरता का लाभ मिल सकता है, जबकि ईरान को आर्थिक राहत और अंतरराष्ट्रीय अलगाव से बाहर निकलने का अवसर प्राप्त हो सकता है।

हालांकि इजराइल की चिंताओं, समझौते की अस्थायी प्रकृति और दोनों पक्षों के बीच गहरे अविश्वास को देखते हुए इसकी सफलता अभी सुनिश्चित नहीं कही जा सकती। फिर भी यह समझौता पश्चिम एशिया में युद्ध की आग को सीमित करने और वैश्विक अर्थव्यवस्था को राहत देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि माना जा सकता है।

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