25 जून को निर्जला एकादशी और 29 जून को वट पूर्णिमा व्रत मनाया जाएगा। जानिए दोनों व्रतों का धार्मिक महत्व, पूजा विधि, कथा और इनके पीछे छिपा जल संरक्षण व पर्यावरण का संदेश।
धर्म डेस्क। जून के अंतिम सप्ताह में दो महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व मनाए जाएंगे। 25 जून, गुरुवार को निर्जला एकादशी और 29 जून, सोमवार को वट पूर्णिमा व्रत रखा जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ये दोनों व्रत केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जल संरक्षण, सेवा, पर्यावरण संरक्षण और पारिवारिक सुख-समृद्धि का संदेश भी देते हैं। एक ओर निर्जला एकादशी में जल का त्याग कर संयम का पालन किया जाता है, वहीं दूसरी ओर वट पूर्णिमा पर बरगद के वृक्ष की पूजा कर प्रकृति और परिवार की दीर्घायु की कामना की जाती है।
निर्जला एकादशी: जल का महत्व समझाने वाला व्रत
ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को मनाई जाने वाली निर्जला एकादशी को वर्ष की सबसे कठिन एकादशियों में माना जाता है। इस दिन व्रती सूर्योदय से लेकर अगले दिन द्वादशी तक अन्न और जल का त्याग करते हैं। भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है और उन्हें तुलसी दल, पीले पुष्प, फल एवं मिठाई अर्पित की जाती है। श्रद्धालु "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करते हैं।
भीमसेन और वेदव्यास से जुड़ी है कथा
पुराणों के अनुसार महाबली भीमसेन नियमित एकादशी व्रत नहीं रख पाते थे। तब महर्षि वेदव्यास ने उन्हें ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का निर्जला व्रत करने का उपदेश दिया। मान्यता है कि इस एक व्रत के प्रभाव से सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त होता है। इसी कारण इसे भीमसेनी एकादशी और पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
दान और सेवा का विशेष महत्व
निर्जला एकादशी पर जल से भरा घड़ा, सत्तू, छाता, हाथ का पंखा, चप्पल और फल दान करने की परंपरा है। भीषण गर्मी के मौसम में राहगीरों के लिए प्याऊ लगाना, पक्षियों के लिए पानी रखना और जरूरतमंदों को शीतल पेय उपलब्ध कराना पुण्यदायी माना गया है।
निर्जला एकादशी का संदेश
- जल का महत्व समझना
- संयम और आत्मनियंत्रण का अभ्यास
- जरूरतमंदों की सेवा
- जल संरक्षण के प्रति जागरूकता
- पक्षियों और जीवों के लिए पानी की व्यवस्था
29 जून को वट पूर्णिमा व्रत
ज्येष्ठ पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला वट पूर्णिमा व्रत मुख्य रूप से विवाहित महिलाओं द्वारा रखा जाता है। इस दिन महिलाएं बरगद के वृक्ष की पूजा कर पति की दीर्घायु, परिवार की सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं। महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में यह व्रत विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
सावित्री-सत्यवान की कथा से जुड़ा है व्रत
महाभारत के वनपर्व में वर्णित कथा के अनुसार सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस प्राप्त किए थे। उनकी दृढ़ता, निष्ठा और बुद्धिमत्ता के कारण यह व्रत वैवाहिक सुख और परिवार की मंगलकामना का प्रतीक माना जाता है।
कैसे की जाती है वट पूर्णिमा की पूजा?
व्रत रखने वाली महिलाएं स्नान के बाद नए वस्त्र धारण करती हैं और बरगद के वृक्ष की पूजा करती हैं। पूजा में जल, रोली, अक्षत, पुष्प, कच्चा सूत, भीगे चने, फल और सुहाग सामग्री अर्पित की जाती है। इसके बाद वृक्ष के चारों ओर सूत लपेटकर परिक्रमा की जाती है तथा सावित्री-सत्यवान की कथा सुनी जाती है।
प्रकृति संरक्षण का भी संदेश देता है वट पूर्णिमा
बरगद का वृक्ष भारतीय संस्कृति में दीर्घायु, स्थिरता और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। इसकी घनी छाया गर्मी में इंसानों, पशुओं और पक्षियों को राहत देती है। वट पूर्णिमा का संदेश केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वृक्षों के संरक्षण, पौधारोपण और पर्यावरण संतुलन की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।
वट पूर्णिमा का संदेश
- वृक्षों का संरक्षण करें
- अधिक से अधिक पौधे लगाएं
- प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी निभाएं
- पशु-पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था करें
- परिवार और समाज में सकारात्मकता बढ़ाएं
जल और वृक्ष दोनों हैं जीवन का आधार
निर्जला एकादशी और वट पूर्णिमा, दोनों पर्व अलग-अलग परंपराओं से जुड़े होने के बावजूद एक समान संदेश देते हैं जल बचाइए, वृक्ष बचाइए और सेवा को जीवन का हिस्सा बनाइए। एक व्रत प्यास का महत्व समझाता है, तो दूसरा छाया देने वाले वृक्षों के संरक्षण की प्रेरणा देता है।