हरिद्वार में 5210 किलो वजनी पारद शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा हुई। 3333 किलो शुद्ध पारे से बने इस शिवलिंग को तैयार करने में 10 साल की रिसर्च लगी।
हरिद्वार। धर्मनगरी हरिद्वार में बुधवार को एक विशाल पारद शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा की गई। आयोजकों के अनुसार 5210 किलोग्राम वजनी इस शिवलिंग को ‘पारद ध्यान लिंगम’ नाम दिया है और इसे एशिया के सबसे बड़े पारद शिवलिंगों में से एक बताया जा रहा है। यह शिवलिंग हरिद्वार-दिल्ली हाईवे पर भादराबाद टोल प्लाजा के निकट स्थित श्री साई शिव गंगा धाम, शिर्डी साई बाबा मंदिर परिसर में स्थापित किया गया है।
3333 किलो शुद्ध पारे से तैयार किया गया शिवलिंग
ट्रस्ट के अनुसार शिवलिंग का कुल वजन 5210 किलो है, जिसमें 3333 किलो शुद्ध पारे का उपयोग किया गया है। इसकी ऊंचाई करीब 4.5 फीट और चौड़ाई लगभग 1.5 फीट बताई गई है। पारा सामान्यतः तरल धातु माना जाता है। ऐसे में उसे स्थिर और ठोस स्वरूप में परिवर्तित करना इस परियोजना की सबसे बड़ी चुनौती रही। आयोजकों का दावा है कि निर्माण प्रक्रिया में किसी प्रकार के हानिकारक रसायन या कृत्रिम मिलावट का उपयोग नहीं किया गया।
10 वर्षों तक चली रिसर्च और प्रयोग
इस पारद शिवलिंग का निर्माण पुणे के ध्यान गुरु Raghunath Yemul के मार्गदर्शन में किया गया। ट्रस्ट के अनुसार पारे को इस स्वरूप में ढालने के लिए लगभग 10 वर्षों तक शोध और प्रयोग किए गए। इस परियोजना में Vijay Bhatkar सहित कई विशेषज्ञों का मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। आयोजकों का कहना है कि यह स्थापना प्राचीन भारतीय रसायन विज्ञान और आध्यात्मिक परंपराओं के समन्वय का उदाहरण है।
वैदिक मंत्रों के बीच हुई प्राण प्रतिष्ठा
बुधवार सुबह सूर्योदय के शुभ मुहूर्त में वैदिक मंत्रोच्चार और विधि-विधान के साथ प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुई। समारोह में देशभर से संत, महंत, श्रद्धालु और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े गणमान्य लोग शामिल हुए। कार्यक्रम में प्रमुख रूप से Swami Sadanand Saraswati, Ravindra Puri, Avdheshanand Giri, Kailashanand Giri, Sadhvi Ritambhara उपस्थित रहे।
गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड के लिए प्रक्रिया शुरू
ट्रस्ट का दावा है कि इस पारद शिवलिंग को पहले ही इंडिया वर्ल्ड रिकॉर्ड और एशिया वर्ल्ड रिकॉर्ड में स्थान मिल चुका है। अब इसे दुनिया के सबसे बड़े पारद शिवलिंग के रूप में दर्ज कराने के लिए गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में आवेदन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। आयोजकों का मानना है कि प्राण प्रतिष्ठा के बाद यह स्थल शिव भक्तों, साधकों और ध्यान करने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित हो सकता है।