लखनऊ अग्निकांड में 15 लोगों की मौत के बाद जांच तेज हो गई है। SIT मौके पर पहुंची है, जबकि अवैध निर्माण और फायर सेफ्टी में लापरवाही को लेकर कई बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।
कुछ घंटे पहले तक जिन परिवारों के बच्चे भविष्य संवारने के लिए कोचिंग और ट्रेनिंग सेंटरों में मौजूद थे। अब उनके घरों में मातम पसरा है। लखनऊ के अलीगंज में हुई भीषण आग ने 15 लोगों की जान ले ली। पोस्टमॉर्टम हाउस के बाहर अपनों का इंतजार कर रहे परिजनों की आंखों में सिर्फ एक सवाल है कि आखिर ऐसी मौतों का जिम्मेदार कौन है।
हालांकि हादसे के एक दिन बाद जांच का दायरा लगातार बढ़ रहा है। मंगलवार सुबह SIT और फोरेंसिक टीम घटनास्थल पर पहुंची और पूरे परिसर का निरीक्षण किया। शुरुआती जांच में सामने आए तथ्य केवल एक अग्निकांड की कहानी नहीं बता रहे, बल्कि सुरक्षा नियमों, अवैध निर्माण और प्रशासनिक निगरानी पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
जांच एजेंसियों ने संभाला मोर्चा
हादसे की तह तक पहुंचने के लिए गठित SIT ने मौके पर पहुंचकर बिल्डिंग की संरचना और आग फैलने के कारणों की जांच शुरू कर दी है। टीम में IPS प्रवीण कुमार और IAS अमृत अभिजात शामिल हैं। फोरेंसिक विशेषज्ञ भी तकनीकी साक्ष्य जुटा रहे हैं ताकि यह स्पष्ट हो सके कि आग किस तरह तेजी से पूरे परिसर में फैली और लोगों के बाहर निकलने के रास्ते क्यों बंद हो गए।
अवैध निर्माण पर बढ़ा शिकंजा
जांच में सामने आया है कि जिस बिल्डिंग में आग लगी वह लंबे समय से विवादों में रही है। जानकारी के मुताबिक वर्ष 2016 में इसे गिराने का आदेश जारी हुआ था, हालांकि बाद में यह आदेश निरस्त कर दिया गया। अब लखनऊ विकास प्राधिकरण ने बिल्डिंग मालिक को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। प्राधिकरण का कहना है कि नियमानुसार कार्रवाई करते हुए अवैध निर्माण को ध्वस्त किया जाएगा। इस खुलासे के बाद प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर भी बहस तेज हो गई है।
बंद रास्तों ने छीनी बचने की उम्मीद
पुलिस जांच में सबसे चिंताजनक तथ्य यह सामने आया कि इमारत में पर्याप्त फायर सेफ्टी व्यवस्था मौजूद नहीं थी। इमरजेंसी एग्जिट का अभाव था और छत की ओर जाने वाला दरवाजा भी बंद मिला। ऐसे में आग और धुएं के बीच फंसे लोगों के पास बाहर निकलने का विकल्प बेहद सीमित रह गया। विशेषज्ञ मानते हैं कि आपातकालीन निकास और सुरक्षा मानकों का पालन होता तो कई जानें बचाई जा सकती थीं।
गिरफ्तारियों से बढ़ी जवाबदेही की बहस
पुलिस ने बिल्डिंग मालिक वीरेंद्र शुक्ला समेत चार लोगों के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया है। जॉइंट सीपी बबलू कुमार के अनुसार पूछताछ के दौरान सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे भी कार्रवाई की जाएगी। दूसरी ओर LDA के छह अधिकारियों को निलंबित किया जा चुका है, जबकि कई अन्य अधिकारियों पर भी कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है। इससे यह मामला केवल एक हादसा नहीं बल्कि प्रशासनिक जिम्मेदारी की जांच का विषय भी बन गया है।
मलबे से अस्पताल तक जारी है संघर्ष
आग लगने के बाद इमारत से जान बचाने के लिए कूदे जयंत गुप्ता का इलाज जारी है। उनकी MRI कराई गई है और रिपोर्ट के आधार पर आगे की चिकित्सा प्रक्रिया तय होगी। वहीं मृतकों के शव परिजनों को सौंप दिए गए हैं। पश्चिम बंगाल की रहने वाली अनामिका का शव देखकर उनकी मां का बेहोश हो जाना इस त्रासदी की गहराई को बयां करता है। यूपी, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और हरियाणा से जुड़े परिवार इस हादसे के बाद शोक में डूबे हैं।
40 मिनट की देरी पर भी उठ रहे सवाल
सोमवार दोपहर करीब 2:30 बजे एसी में ब्लास्ट के बाद आग लगने की बात सामने आई है। प्रत्यक्ष जानकारी के अनुसार दमकल टीम को मौके तक पहुंचने में करीब 40 मिनट का समय लगा। इसके बाद SDRF और NDRF की टीमों ने घंटों तक रेस्क्यू अभियान चलाकर दीवारें तोड़ीं और अंदर फंसे लोगों को बाहर निकाला। अब जांच का एक अहम पहलू यह भी होगा कि क्या राहत और बचाव अभियान तक पहुंचने में हुई देरी ने मौतों का आंकड़ा बढ़ाने में भूमिका निभाई। यही सवाल आने वाले दिनों में जांच का सबसे संवेदनशील बिंदु बन सकता है।