Breaking News
  • मेसी के फुटबॉल वर्ल्डकप में सबसे ज्यादा 18 गोल, जर्मनी के क्लोजा का रिकॉर्ड तोड़ा
  • मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र की मशहूर सर्दियों की डिश गराड़ू और रतलाम के बालम खीरा को GI टैग मिला
  • अन्ना हजारे ने दी भूख हड़ताल की चेतावनी, RTI नियमों के खिलाफ खोला मोर्चा
  • तेजप्रताप के आवास में चोरी, 20 लाख कैश-पार्टी फंड गायब...PA पर FIR
  • दिल्ली की बाल्मीकि बस्ती में भीषण आग, चपेट में आईं कई झुग्गियां
  • टाइटैनिक के मलबे से निकले सामानों की नीलामी पर अमेरिकी सरकार ने लगाई रोक
  • भारत आ रहे फर्टिलाइजर के जहाज ने होर्मुज पार किया

होम > प्रदेश > मध्य प्रदेश

जंगली भालुओं की अनोखी आदत

आरती की घंटियां सुनकर मंदिर पहुंच जाते हैं जंगली भालू, प्रसाद लेकर लौट जाते हैं जंगल

छत्तीसगढ़ के राजामाड़ा में जंगली भालू मंदिर की आरती की घंटियों की आवाज सुनकर प्रसाद ग्रहण करने पहुंचते हैं और बिना किसी नुकसान के जंगल वापस लौट जाते हैं।


आरती की घंटियां सुनकर मंदिर पहुंच जाते हैं जंगली भालू प्रसाद लेकर लौट जाते हैं जंगल

AI |

अनूपपुर से लगे छत्तीसगढ़ के राजामाड़ा में दिखता है अनोखा नजारा

मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले से सटे छत्तीसगढ़ के एमसीबी जिले के जनकपुर क्षेत्र स्थित ग्राम पंचायत उचेहरा का राजामाड़ा (रामवन) इन दिनों एक अनोखी घटना को लेकर चर्चा में है। यहां मंदिर में होने वाली सुबह-शाम की आरती और घंटियों की आवाज सुनकर जंगली भालू जंगल से निकलकर मंदिर परिसर तक पहुंच जाते हैं। प्रसाद ग्रहण करने के बाद ये भालू बिना किसी नुकसान या उपद्रव के वापस जंगल की ओर लौट जाते हैं।

आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित यह स्थान धार्मिक आस्था और प्रकृति के अनोखे संगम के रूप में पहचान बना रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार यह सिलसिला वर्ष 2013 से लगातार जारी है। जैसे ही मंदिर में आरती शुरू होती है और घंटियों की ध्वनि गूंजती है, जंगल से भालुओं का समूह कुटी परिसर में पहुंच जाता है।

एक साथ पहुंचते हैं कई भालू

बताया जाता है कि कई बार एक दर्जन से अधिक भालू एक साथ मंदिर पहुंचते हैं और पुजारी के हाथों से प्रसाद ग्रहण कर शांतिपूर्वक जंगल की ओर लौट जाते हैं। खास बात यह है कि इस दौरान उन्होंने कभी किसी ग्रामीण या श्रद्धालु को नुकसान नहीं पहुंचाया।

2013 से जारी है सिलसिला

कुटी में रहने वाले पुजारी सीताराम बाबा ने बताया कि वर्ष 2013 से पहले वे माहोरा पहाड़ क्षेत्र में रहते थे। बाद में जब वे राजामाड़ा (रामवन) पहुंचे, तो कुछ समय बाद यहां भालुओं का आना शुरू हो गया। धीरे-धीरे यह उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया और अब हर दिन सुबह-शाम आरती के समय भालू मंदिर पहुंचते हैं।

"ये सिर्फ भालू नहीं, जामवंत हैं"

पुजारी सीताराम बाबा का कहना है कि, "ये सिर्फ भालू नहीं हैं, ये जामवंत हैं। अगर आप इन्हें प्यार देंगे तो ये भी आपको प्यार देंगे।" जब उनसे पूछा गया कि इतने करीब आने वाले भालुओं से डर नहीं लगता, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "मुझे भालुओं से नहीं, इंसानों से डर लगता है।"

लोगों के आकर्षण का केंद्र बना राजामाड़ा

स्थानीय ग्रामीण इस घटना को बाबा की कृपा और भगवान का चमत्कार मानते हैं, वहीं कुछ लोग इसे वर्षों से बने आपसी विश्वास और भालुओं की स्वाभाविक आदत बताते हैं। वजह चाहे जो भी हो, लेकिन जंगल के इन वन्य जीवों का मंदिर पहुंचकर प्रसाद ग्रहण करना लोगों के लिए कौतूहल और आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।इस अनोखे दृश्य को देखने के लिए दूर-दराज से लोग राजामाड़ा पहुंच रहे हैं। धार्मिक आस्था और वन्य जीवन का यह अद्भुत मेल क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।

Related to this topic: