छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने MBBS सेवा बॉन्ड मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि 6 महीने में नियुक्ति न होने पर बॉन्ड खत्म माना जाएगा। कोर्ट ने सरकार को डॉक्टरों के पक्ष में तत्काल NOC जारी करने के निर्दे
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने MBBS सेवा बॉन्ड से जुड़े एक अहम मामले में राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए डॉक्टरों के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है। बिलासपुर के चार डॉक्टरों से जुड़े इस केस में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि इंटर्नशिप के बाद छह महीने के भीतर नियुक्ति नहीं दी जाती है, तो सेवा बॉन्ड स्वतः समाप्त माना जाएगा।
अदालत ने यह भी कहा कि प्रशासनिक देरी का खामियाजा डॉक्टरों पर नहीं डाला जा सकता और राज्य सरकार को उनके पक्ष में तुरंत नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) जारी करना होगा।
छह महीने की सीमा पर अदालत का सख्त रुख
न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि छत्तीसगढ़ मेडिकल, डेंटल एवं फिजियोथेरेपी अंडरग्रेजुएट एडमिशन नियम 2025 के तहत MBBS और इंटर्नशिप पूरी होने के बाद छह महीने के भीतर नियुक्ति देना सरकार की कानूनी जिम्मेदारी है। कोर्ट ने माना कि इस अवधि में नियुक्ति आदेश जारी न होना पूरी तरह प्रशासनिक विफलता है, जिसका असर छात्रों पर नहीं पड़ना चाहिए।
डॉक्टरों को मिली बड़ी राहत
यह मामला वर्ष 2024 में CIMS बिलासपुर से MBBS पूरा करने वाले चार डॉक्टरों से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि समय पर नियुक्ति न मिलने के बावजूद बाद में काउंसलिंग के जरिए आदेश जारी किए गए, जिससे उनकी स्थिति अस्पष्ट हो गई। कोर्ट ने माना कि समय सीमा समाप्त होने के बाद दिए गए नियुक्ति आदेश कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं रह जाते।
20 से 25 लाख के बॉन्ड पर भी राहत
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि डॉक्टरों पर 20 से 25 लाख रुपये की सेवा बॉन्ड राशि वसूलने का कोई आधार नहीं बनता। अदालत ने कहा कि जब सरकार अपनी निर्धारित समयसीमा में नियुक्ति नहीं कर पाई, तो बॉन्ड की शर्तें लागू नहीं की जा सकतीं। इस फैसले से डॉक्टरों को वित्तीय रूप से बड़ी राहत मिली है।
सरकार का पक्ष और कोर्ट की असहमति
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने दलील दी कि डॉक्टरों ने पहले से बॉन्ड भरा था और काउंसलिंग प्रक्रिया में भाग लिया था, इसलिए वे शर्तों से पीछे नहीं हट सकते। सरकार ने यह भी कहा कि नियुक्ति आदेश जारी किए गए थे, लेकिन डॉक्टरों ने ज्वाइनिंग नहीं की। हालांकि कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि देरी की जिम्मेदारी प्रशासन की है, न कि अभ्यर्थियों की।
तत्काल NOC और डिग्री जारी करने के निर्देश
अदालत ने आदेश दिया कि राज्य सरकार याचिकाकर्ताओं के पक्ष में तुरंत NOC जारी करे। साथ ही संबंधित विश्वविद्यालय को आवश्यक होने पर MBBS डिग्री जारी करने का निर्देश भी दिया गया। कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए यह स्पष्ट किया कि प्रशासनिक लापरवाही का असर छात्रों के करियर पर नहीं पड़ सकता।
शिक्षा और मेडिकल सिस्टम पर बड़ा संदेश
यह फैसला मेडिकल शिक्षा व्यवस्था और सरकारी भर्ती प्रक्रिया पर भी बड़ा संदेश देता है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि तय समयसीमा का पालन करना अनिवार्य है और देरी होने पर छात्र कानूनी रूप से बाध्य नहीं रहेंगे। इस फैसले को भविष्य में MBBS सेवा बॉन्ड मामलों के लिए एक अहम नजीर माना जा रहा है।