भोपाल के चिकित्सकों ने एक मासूम की जान बचाई जब उसकी श्वास नली में खेलते समय फंसे पत्थर को विशेष तकनीक से सफलतापूर्वक निकाला गया।
एक महीने तक खांसी और सांस लेने में तकलीफ से जूझता रहा था बच्चा
भोपाल के चिकित्सकों ने एक बेहद जटिल और जीवनरक्षक प्रक्रिया को सफलतापूर्वक अंजाम देते हुए साढ़े चार वर्षीय मासूम की जान बचा ली। खेल-खेल में निगला गया करीब 1 से 1.5 सेंटीमीटर का पत्थर बच्चे की श्वास नली में गहराई तक फंस गया था, जिससे वह पिछले एक महीने से लगातार खांसी, सांस लेने में तकलीफ और बार-बार छाती के संक्रमण से जूझ रहा था। डॉक्टरों ने बिना किसी बड़ी सर्जरी के रिजिड ब्रोंकोस्कोपी तकनीक से पत्थर निकालकर बच्चे को नया जीवन दिया।
यह था मामला
टीकमगढ़ निवासी मासूम का स्थानीय स्तर पर लगातार इलाज चल रहा था, लेकिन बीमारी की सही वजह सामने नहीं आ सकी। तबीयत बिगड़ने पर परिजन उसे भोपाल लेकर पहुंचे। यहां एक्स-रे जांच में श्वास नली में किसी विदेशी वस्तु के फंसे होने की आशंका सामने आई। इसके बाद ब्रोंकोस्कोपी से पुष्टि हुई कि काले रंग का पत्थर बच्चे के बाएं फेफड़े की मुख्य श्वासनली (लेफ्ट ब्रोंकस) के अंतिम हिस्से में फंसा हुआ है।पारुल हॉस्पिटल के पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. प्रखर अग्रवाल और उनकी सहयोगी डॉ. कीर्ति ने जनरल एनेस्थीसिया के तहत रिजिड ब्रोंकोस्कोपी की मदद से पत्थर को सावधानीपूर्वक बाहर निकाला। डॉक्टरों के अनुसार, यह तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया थी, क्योंकि पत्थर श्वास नली के गहरे हिस्से में फंसा हुआ था।सफल प्रक्रिया के बाद बच्चे की श्वास नली पूरी तरह खुल गई और उसकी सांस लेने की समस्या तत्काल दूर हो गई।
समय पर इलाज मिलने से बची जान
विशेषज्ञों ने बताया कि यदि समय पर सही जांच और उपचार नहीं मिलता, तो बच्चे को गंभीर संक्रमण, फेफड़ों में सूजन या सांस रुकने जैसी जानलेवा स्थिति का सामना करना पड़ सकता था।डॉ. प्रखर अग्रवाल ने अभिभावकों को सलाह दी कि छोटे बच्चों पर विशेष नजर रखें। यदि किसी बच्चे को लगातार खांसी, सांस लेने में दिक्कत, सीटी जैसी आवाज या बार-बार छाती में संक्रमण हो रहा हो, तो इसे सामान्य बीमारी मानकर नजरअंदाज न करें, बल्कि तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक से जांच कराएं। कई बार खेल-खेल में निगली गई छोटी वस्तुएं श्वास नली में फंसकर गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं।