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US-Pakistan Relations Explained

आतंकवाद के आरोपों के बावजूद अमेरिका को पाकिस्तान की क्यों पड़ी जरूरत, नजदीकी की क्या है वजह?

आतंकवाद को लेकर लंबे समय से सवालों में घिरे पाकिस्तान के साथ अमेरिका की बढ़ती नजदीकियां चर्चा में हैं। आखिर वाशिंगटन की रणनीति में ऐसा क्या बदला कि इस्लामाबाद फिर से अहम साझेदार बनता दिख रहा है?


आतंकवाद के आरोपों के बावजूद अमेरिका को पाकिस्तान की क्यों पड़ी जरूरत नजदीकी की क्या है वजह

US-Pakistan Relationship |

अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में हैं। यह वही पाकिस्तान है जिस पर वर्षों से आतंकवाद को संरक्षण देने, आतंकी संगठनों को समर्थन देने और क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ाने के आरोप लगते रहे हैं। इसके बावजूद हाल के वर्षों में वाशिंगटन और इस्लामाबाद के बीच बढ़ती नजदीकियां कई सवाल खड़े कर रही हैं।

दक्षिण एशिया की बदलती रणनीतिक तस्वीर में अमेरिका का रुख पहले जैसा नहीं दिख रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल कूटनीतिक नहीं है, बल्कि इसके पीछे भारत, चीन और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन से जुड़े बड़े समीकरण काम कर रहे हैं।

अमेरिकी नीति में कब आया बदलाव

सामरिक मामलों के जानकार ब्रह्म चेलानी का मानना है कि पाकिस्तान को लेकर अमेरिकी सोच में बदलाव जो बाइडन प्रशासन के दौरान शुरू हुआ और बाद में डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में और स्पष्ट दिखाई देने लगा। उनके अनुसार वाशिंगटन ने पाकिस्तान को फिर से दक्षिण एशिया में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक खिलाड़ी के रूप में देखना शुरू किया। इसी परिप्रेक्ष्य में पाकिस्तान को आईएमएफ सहायता मिलने और उसके एफ-16 लड़ाकू बेड़े के आधुनिकीकरण जैसे कदमों को भी देखा जा रहा है, जिनसे उसकी सैन्य क्षमता मजबूत हुई।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बदला समीकरण

विशेषज्ञों के मुताबिक मई 2025 में भारत द्वारा शुरू किए गए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी अमेरिका का रुख चर्चा में रहा। उनका कहना है कि सीमा पार आतंकी हमले के बाद पैदा हुए तनाव के बीच वाशिंगटन ने हालात को तेजी से नियंत्रित करने की कोशिश की। इसी अवधि में पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता भी बढ़ी, जिसने पाकिस्तान की सत्ता संरचना को लेकर नई बहस छेड़ दी।

परमाणु मुद्दे पर अलग नजरिया

ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर लगातार सख्त रुख अपनाने वाले अमेरिका ने पाकिस्तान के परमाणु शस्त्रागार पर अपेक्षाकृत कम सार्वजनिक टिप्पणी की है। ब्रह्म चेलानी का तर्क है कि यह अंतर भी अमेरिकी रणनीति को समझने का एक महत्वपूर्ण संकेत है। पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम पहले भी वैश्विक स्तर पर विवादों और परमाणु प्रसार से जुड़े आरोपों के कारण सुर्खियों में रह चुका है।

ईरान कूटनीति में पाकिस्तान की भूमिका

विश्लेषकों का मानना है कि हालिया क्षेत्रीय घटनाक्रमों में पाकिस्तान ने खुद को केवल सुरक्षा साझेदार नहीं बल्कि कूटनीतिक मध्यस्थ के रूप में भी पेश करने की कोशिश की है। अमेरिका और ईरान के बीच संवाद की प्रक्रिया में इस्लामाबाद की संभावित भूमिका ने उसे वाशिंगटन के लिए एक उपयोगी सहयोगी के रूप में स्थापित करने में मदद की। इससे पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी प्रासंगिकता बढ़ाने का अवसर मिला।

भारत और चीन के बीच संतुलन की रणनीति

दक्षिण एशिया की राजनीति को समझने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की मौजूदा पाकिस्तान नीति में क्षेत्रीय शक्ति संतुलन की सोच साफ दिखाई देती है। उनका तर्क है कि जिस तरह चीन लंबे समय से पाकिस्तान को भारत के मुकाबले रणनीतिक संतुलन के साधन के रूप में देखता रहा है, उसी तरह वाशिंगटन भी अब इस्लामाबाद को अपने व्यापक भू-राजनीतिक समीकरणों में अहम स्थान देता नजर आ रहा है। यही कारण है कि आतंकवाद को लेकर पुराने सवाल बने रहने के बावजूद पाकिस्तान अमेरिकी रणनीति में फिर से महत्वपूर्ण होता दिखाई दे रहा है।

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