अमेरिका के साथ अंतरिम समझौते को लेकर ईरान में सत्ता और कट्टरपंथियों के बीच तनाव बढ़ गया है। खामेनेई और IRGC के सामने इस डील को लेकर बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है।
अमेरिका के साथ हुए अंतरिम समझौते को लेकर ईरान के भीतर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। सरकार इस डील को अपनी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश कर रही है। लेकिन देश के भीतर ही इसका विरोध खुलकर सामने आने लगा है। तेहरान में इस समझौते को लेकर सत्ता और कट्टरपंथी धड़ों के बीच तनाव बढ़ता दिख रहा है।
रिपोर्टों के मुताबिक, यह विवाद सिर्फ विदेश नीति तक सीमित नहीं है। यह ईरान के अंदरूनी सत्ता संतुलन को भी प्रभावित कर रहा है। जहां सर्वोच्च नेता अली खामेनेई और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के लिए नई चुनौती खड़ी हो गई है।
समझौते को लेकर सत्ता और कट्टरपंथियों में टकराव
अमेरिका के साथ हुए एमओयू को ईरान सरकार एक बड़ी उपलब्धि बता रही है। लेकिन कट्टरपंथी गुट इसे देश के हितों के खिलाफ मान रहे हैं। संसद से जुड़े कुछ प्रभावशाली नेताओं ने इसे 'अमेरिका की शर्तों पर झुकाव' तक कहा है। यही कारण है कि तेहरान में इसके खिलाफ सीमित विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिले हैं, जिससे राजनीतिक तापमान बढ़ गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह टकराव आने वाले समय में और गहरा हो सकता है, क्योंकि समझौते की व्याख्या को लेकर दोनों पक्षों के बीच भरोसे की कमी साफ नजर आ रही है।
कट्टरपंथी गुटों का जमीनी दबाव और बढ़ती चिंता
ईरान के भीतर मौजूद कट्टरपंथी धड़ा, जिसे कुछ विश्लेषक 'स्थिरता समर्थक समूह' भी कहते हैं। इस समझौते को कमजोर करने की कोशिश कर सकता है। यह गुट पहले भी सड़कों पर लामबंदी की क्षमता दिखा चुका है और इसका प्रभाव खासकर रूढ़िवादी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में माना जाता है। रिपोर्टों के अनुसार, यह वर्ग सरकार के लिए चुनौती बन सकता है, क्योंकि अगर समझौते के परिणाम जल्दी सामने नहीं आते, तो जनता में असंतोष बढ़ सकता है।
आर्थिक राहत पर टिकी समझौते की सफलता
विशेषज्ञों का कहना है कि इस पूरे समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या ईरान की अर्थव्यवस्था में वास्तविक सुधार दिखता है या नहीं। प्रतिबंधों से राहत और आर्थिक स्थिरता अगर जमीन पर महसूस नहीं होती, तो सरकार के लिए इसे बचाए रखना मुश्किल हो सकता है। चैथम हाउस जैसे थिंक टैंक की रिपोर्टों के अनुसार, सैन्य तनाव कम होने के बावजूद घरेलू आर्थिक और सामाजिक दबाव बने रहेंगे, जो सत्ता के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकते हैं।
तेहरान में स्थायी स्थिरता पर सवाल
हालांकि इस समझौते से ईरान पर बाहरी सैन्य दबाव कम होने की संभावना है, लेकिन अंदरूनी राजनीतिक और सामाजिक असंतोष अभी खत्म नहीं हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि जनता का समर्थन तभी टिकेगा जब रोजमर्रा की जिंदगी में सुधार दिखाई देगा। एक आम नागरिक की प्रतिक्रिया भी इस असमंजस को दर्शाती है कि समझौता कागज पर अच्छा लग सकता है, लेकिन असली असर जमीन पर दिखना जरूरी है, वरना स्थिति फिर से अस्थिर हो सकती है।