सोयाबीन खेती में कमी और बढ़ती लागत से भारतीय किसानों की चिंता बढ़ी है। मौसमी अनिश्चितता और ऊंची लागत के कारण किसान अन्य फसलों की ओर रुख कर रहे हैं।
देश में सोयाबीन की खेती कई चुनौतियों का सामना कर रही है। एक ओर बुवाई क्षेत्र में गिरावट दर्ज की जा रही है, वहीं दूसरी ओर खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। ऐसे समय में यह स्थिति चिंता बढ़ाने वाली है, जब केंद्र सरकार खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को लेकर तिलहन उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है।
केंद्रीय कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार 19 जून तक देश में सोयाबीन की बुवाई का रकबा पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 1.20 लाख हेक्टेयर कम दर्ज किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो इसका असर खाद्य तेल उत्पादन से लेकर किसानों की आय तक पर पड़ सकता है।
बढ़ती लागत ने बढ़ाई किसानों की चिंता
हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर सोयाबीन उत्पादन की लागत में बढ़ोतरी का अनुमान है। रिपोर्ट बताती है कि इस वर्ष सोयाबीन उत्पादन की औसत लागत में 4 प्रतिशत से अधिक वृद्धि हो सकती है, जबकि अगले वर्ष भी लागत बढ़ने की संभावना बनी हुई है।विशेषज्ञों के मुताबिक खेती में उपयोग होने वाले कई प्रमुख इनपुट महंगे हो रहे हैं।
लागत बढ़ाने वाले प्रमुख कारक
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उर्वरकों की कीमतों में वृद्धि
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डीजल और ऊर्जा लागत में बढ़ोतरी
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सिंचाई खर्च में इजाफा
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परिवहन और मशीनरी संचालन की लागत बढ़ना
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श्रम लागत में वृद्धि
हालांकि बीज और कुछ कृषि रसायनों की लागत में सीमित राहत मिलने की संभावना है, लेकिन कुल मिलाकर उत्पादन खर्च बढ़ने की आशंका बनी हुई है।
किसान क्यों छोड़ रहे हैं सोयाबीन?
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सीमित संसाधनों वाले किसान बढ़ती लागत के कारण वैकल्पिक फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। कई जिलों में किसान सोयाबीन की जगह अन्य कम लागत वाली फसलों की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं।
प्रमुख कारण
1. बढ़ता आर्थिक जोखिम
सोयाबीन की खेती में शुरुआती निवेश लगातार बढ़ रहा है। यदि मौसम अनुकूल न रहा तो किसानों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।
2. मानसून को लेकर अनिश्चितता
कई क्षेत्रों में किसानों को आशंका है कि यदि मानसून कमजोर रहा या बीच में लंबा अंतराल आया तो फसल प्रभावित हो सकती है।
3. मिट्टी में नमी की कमी
प्री-मानसून अवधि में पर्याप्त वर्षा नहीं होने के कारण कई इलाकों में मिट्टी की नमी कम रही, जिससे बुवाई प्रभावित हुई।
अल नीनो जैसी परिस्थितियों का असर
मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि समुद्री तापमान में बदलाव और अल नीनो जैसी परिस्थितियां मानसून की नियमितता को प्रभावित कर सकती हैं। इससे वर्षा का वितरण असंतुलित हो सकता है, जिसका सीधा असर सोयाबीन जैसी वर्षा आधारित फसलों पर पड़ता है।किसानों की चिंता यह है कि यदि बुवाई के बाद पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो उत्पादन में बड़ी गिरावट आ सकती है।
भारत पर क्या पड़ेगा असर?
भारत खाद्य तेलों की बड़ी खपत वाला देश है और सोया तेल इसकी जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सोयाबीन उत्पादन घटने से कई स्तरों पर प्रभाव पड़ सकता है।
खाद्य तेल पर दबाव
सोयाबीन उत्पादन में कमी आने पर सोया तेल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है, जिससे आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है।
पोल्ट्री उद्योग पर असर
सोयाबीन से बनने वाला सोयामील पोल्ट्री उद्योग का प्रमुख फीड घटक है। उत्पादन कम होने पर फीड लागत बढ़ सकती है।
किसानों की आय पर प्रभाव
यदि उत्पादन कम होता है और लागत बढ़ती है, तो किसानों का लाभ मार्जिन घट सकता है।
आत्मनिर्भरता की राह में चुनौती
सरकार तिलहन मिशन के माध्यम से खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने का प्रयास कर रही है। ऐसे में सोयाबीन क्षेत्र में गिरावट नीति निर्माताओं के लिए भी चिंता का विषय है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों को बेहतर मूल्य, तकनीकी सहायता, मौसम आधारित सलाह और लागत नियंत्रण उपाय उपलब्ध कराए बिना सोयाबीन उत्पादन बढ़ाना कठिन होगा।
आने वाले हफ्ते होंगे अहम
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार आगामी कुछ सप्ताह सोयाबीन फसल के लिए निर्णायक साबित होंगे। यदि मानसून सामान्य और संतुलित रहता है तो बुवाई क्षेत्र में कुछ सुधार देखने को मिल सकता है। लेकिन बारिश में देरी या असमान वितरण की स्थिति बनी रही तो सोयाबीन उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है।